रविवार, 30 नवंबर 2008

'जय शिवानी' उपन्यास की भूमिका

मैँ प्रत्येक देव शक्ति, अवतार, ,पैगम्बर ,आदि का सम्मान करता हूँ लेकिन इन सब शक्तियोँ से ऊपर भी एक सुप्रीम पावर है.उससे जुड़ने का प्रत्यन हर व्यक्ति का होना चाहिए.समस्त देव अवतारी पैगम्बर शक्तियाँ सिर्फ सांसारिक जीवन को बेहतर बनाती हैँ लेकिन धर्म एवं अध्यात्म की यात्रा काफी लम्बी है,अन्तस्थ है.एक पौराणिक प्रसंग है-राम लक्ष्मण सीता जी की तलाश मेँ जंगल मेँ भटक रहे हैँ.शिव जी जब उनको प्रणाम करते है तो पार्वती जी को यह बर्दाश्त नहीँ होता.पार्वती को शिव जी राम लक्ष्मण की असलियत बताते हैँ लेकिन पर्वती जी तब भी सीता का स्वरुप धारण कर उनकी परीक्षा लेने निकल पड़ती है.लक्ष्मण जी उन्हेँ पहचान जाते हैँ. इस कथा के साथ ही शुरु होती है-हमारी कथा-'जय शिवानी' ! "नारायण! नारायण!"-नारद जी एक युवा सन्यासी के पास आ पहुँचते हैँ.नारद जी बोलते है कि आप निर्गुण साधक अपने पथ से भटक कर पत्थर को काट काट कर किस युवती की मूर्ति बनाने मेँ लग गये हैँ? "इस मूर्ति को मैने पार्वती मान कर......" "पार्वती ?मैँ तो समझता था कि यह अपनी प्रेमिका की मूर्ति बना रहे हो ." "शिवानी ?अब मेरी शिवानी मेरी पार्वती है.अब मेरे लिए शिवानी पार्वती का स्वरुप." "औह ,तो यह बात? लेकिन क्या अब आप मूर्ति उपासना को बल दोगे?" "नहीँ देव !यह तो एकाग्रता के लिए . अभी मन बालक की भाँति चलायमान है." "बालक की भाँति?" " अब तो बालक स्वभाव मेँ ही जीना चाहता हूँ.परमचेतना को माँ के रूप मेँ पूजना चाहता हूँ ." "मेरा आशीर्वाद साथ है-वत्स. लेकिन काम देव से सतर्क रहना." "काम देव से ?" "बुरा न मानना,कामनाएँ अभी और आक्रमण करेँगी आपके मन पर.नारायण - नारायण....!" शेष फिर.....

शनिवार, 22 नवंबर 2008

मन मेँ चुभन और बेचैनी: कमबख्त ऐ लड़कियाँ

मैने एक कहानी संकलन लिख रखा है-"वे चाहती हैँ".जिसमेँ हमने दर्शाया है कि लड़कियाँ हम जैसोँ को पसन्द नहीँ करतीँ और लड़कियाँ जिसे पसन्द करती हैँ वे किस सोँच नियति के होते हैँ?दिल तड़फता है, बेचैन होता है ,दिल रोने को होता है,कमबख्त ये चाहते क्योँ पैदा होती हैँ दिल मेँ ?हमेँ दुनियाँ मेँ किससे नफरत थी ?जान बूझ कर हम किसे कष्ट पहुँचाना चाहते थे?हमेँ कौन जान सका है? जो दम्भ मेँ थे हमेँ जानने के वे भूल मेँ थे.वे शायद हमारे मनोविज्ञान से अपरचित थे?हमेँ अभी तक जब अपने परिजन नहीँ समझ पाये तो बाहर वालोँ का क्या?एक दूसरे को समझने के लिए एक दूसरे को विश्वास मेँ ले सहज सम्वाद जरुरी हैँ.हाँलाकि स्वपन की उस अदृश्य लड़की के लिए अपनी क्रीम एज गँवा चुका था लेकिन इससे पूर्व एवं बाद मेँ अनेक से शादी के रिश्ते की बात होती रहीँ लेकिन कुछ बातेँ हमेँ अशान्ति देने वाली घटित होती रहीँ.और किसी ने हमारे संकोची स्वभाव को जानने की कोशिस नहीँ की.मैँ सुखमय दम्पत्य जीवन के लिए स्वयंवर प्रथा तथा धर्म को महत्वपूर्ण मानता हूँ जो कि वैदिकता के खिलाफ नहीँ है सम्भवत: .मैँ ऐसा चाहता रहा हूँ कि चलो कोई बात नहीँ जिस जिस को हम ने चाहा वे हमेँ नहीँ मिल सके या हम से व्यवहार नहीँ रख सके लेकिन जो हमेँ मिलेँ या जो हम से व्यवहार रखे वह तो हम से प्रेम पूर्ण व्यवहार ही रखे.यदि ऐसा नहीँ तो फिर किसी को स्वीकार कर अपने व्यक्तिगत जीवन मेँ किसी का हस्तक्षेप क्योँ बर्दाश्त करेँ?अपने व्यक्तित को व्यक्तिगत रख अपने आत्मा पर पकड़ हेतु रास्ता सुगम कर सकते हैँ. जिससे शादी हो जाए वह ही क्या जीवन साथी है?क्योँ न वह हमारे लक्ष्य पथ पर कितना बड़ा भी अवरोधक हो ? **बनी बनायी बात बिगड़ जाये*** हमारा संकोची स्वभाव , लोगोँ के द्वारा हमेँ न समझ पाना ,लोगोँ के भ्रम आदि के कारण बनी बनायी बातेँ बिगड़ती रहीँ.अनेक आये रिश्तोँ मेँ मैने कभी लड़की के पिता से मना नहीँ किया लेकिन हमेँ दुख ही पहुँचा.कारण समाज के अन्य व्यक्ति थे.हम भी चाहते है रिश्ता वे भी चाहते है हम से रिश्ता लेकिन कार्यवाही आगे नहीँ बढ़ती,हम इन्तजार कर रहे है यहाँ तक कि हम उनको लेकर ख्वाव भी देख लेते है.एक रिश्ते पर राम किशोर राठौर नाम का शख्स एक लड़की वाले से कहता है कि बिन्दु जी से चाहे कोई बात करना शादी की बात न करना,एक गिरिजा शंकर मिश्रा, आदि शख्स कहते फिरते हैँ कि अरे बिन्दु के लिए कोई अपनी लड़की पन्द्रह दिन के लिए छोड़ जाए पहले,एक हमसे कहते रहते कि अरे बिन्दु जी तुम्हेँ नहीँ करनी शादी, आदि आदि.एक ओर से मैँ डेढ साल के इन्तजार मेँ रहता हूँ,उधर से एक लड़की से काफी उम्मीदे रखने लगता हूँ,हमारे मिलने वाले उधर के एक व्यक्ति से कहते भी रहते हैँ लेकिन.....?! ऐसे मेँ मेरा मन चिड़चिड़ा हो गया है.किसी ने कहा है दुख का कारण है चाहतोँ का पूरा न होना. मैँ सोचता हूँ हममे ऐसा क्या नहीँ था जो कि हमेँ पसन्द करना तो दूर हमसे बात करना तक पसन्द नहीँ करती थीँ लड़कियाँ ?कभी कभी तो मन मेँ आता है कि औरत जाति से ही बगाबत कर बैठूँ.औरत जाति से ही क्योँ प्रेम को तो बचपन से तरसता रहा हूँ. मिलने वाले कहते कभी अपनी शक्ल भी देखी .हूँ!हमेँ क्या गोरी चिट्टी चाहिए? तुम ही सोँचो वे रमापुर वाली क्या गोरी चिट्टी हैँ?या वो ,कल जो तुम्हेँ दिखायी थी उसे देख तुम मुँह बनाने लगे थे.उसका बाप तो एक कौड़ी रूपया भी नहीँ देने वाला.और दो दर्जन शर्ते.......कोई नहीँ शर्त मेरी.शर्त तो यह है कोई हमे चाहने वाली मिल जाए. आज के ही दिन 30नवम्बर को एक लड़की देखने जाना है. मुझे देखे बिना उनकी शादी की हाँ.हमेँ तो दाल मेँ कुछ काला नजर आ रहा है.दूसरी ओर....चाहतेँ कहीँ और तरफ.....!? पसन्द न पसन्द की कोई बात नहीँ......कमबख्त ये लड़कियाँ! मेरे प्रेम के लिए कोई नहीँ . खैर छोड़ो बुद्ध ने कहा है कि दुख का कारण तृष्णा है. JAI HO ....,OM...AAMEEN.