शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

होली:मानवता या शूद्रता

होली उल्लास एवं उमंगोँ का त्योहार है. जिसके सात रंग हैँ-प्यार, कर्म ,सद्भाव, परोपकार, ,समरसता, खुशी.जिसके बिना होली का पर्व मनाना निरर्थक है.निर्जीव वस्तुएँ कितना खुशी दे सकती हैँ? जब तक आन्तरिक खुशी मेँ मनुष्य नहीँ है अर्थात वह मन का राजा नहीँ है. अभी तक जीवन मेँ मैने देखा है कि रुपये पैसे की उधेड़बुन एवं निर्जीव वस्तुओँ के मोह मेँ पड़े लोग अपने जीवन मेँ कितने खुश हैँ?हमारा शरीर प्राकृतिक है जो प्रकृति के बिना स्वस्थ नहीँ रह सकता.निर्जीव वस्तुओँ की अपेक्षा पेँड़ पौधे पालतु पशु(पशुपालन)स्त्री पुरुष आदि प्रकृति अंगोँ एवं सामूहिकता मेँ भागिदारिता ,अपनी उपयोगिता, नम्रता ,आदि का प्रदर्शित करना आवश्यक है.हमेँ यह नहीँ भूलना चाहिए कि धर्म के बिना जीवन बेकार है. धर्म क्या है?धर्म है -पर हित एवं नम्रता.जिसे हम धर्म मानते है वे धर्म नहीँ सम्प्राय रीति रिवाज आदि होता हैँ.हम अपने अहंकार एवं भौतिक संसाधनोँ के सामने निस्वार्थ व्यवहार का प्रदर्शन पर सम्मान आदि को न भूलेँ.हमने धनाभाव मेँ भी लोगोँ को खुश तथा अनेक मित्रोँ के बीच देखा है और धनवान लोगोँ को निराश व एकान्त मेँ तन्हा या मनोरोगी देखा है.वास्तव मेँ मनुष्य वही है जो हर तरह के मनुष्य से मधुर व्यवहार बनाये रखने की कला से परचित है. होली पर्व से हमे प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम अपने जीवन को उत्सव मेँ कैसे परिणित करेँ?कैसे हम इन्सानियत एवं सामूहिकता को महत्व देने के लिए मतभेदी से भी मधुर व्यवहार रखेँ?जिसका उदाहरण महाभारत मेँ मिलता है-दिन मेँ युद्ध के मैदान मेँ जो एक दूसरे के खून के प्यासे रहते है वही रात्रि मेँ एक दूसरे के घर जा कर एक दूसरे को मदद करते भी नजर आते हैँ.....HAPPY HOLI...JAI HO ....OM...AAMEN.

चरित्र वम्मा की कलम स��

नक्सलवादी चरित्र वम्मा से सम्पर्क स्थापित करने लगे थे.उनके कुछ लीडर चाहते थे कि चरित्र वम्मा हमसे हाथ मिला ले. "जो जबाब मेरे चाचा आलोक वम्मा का था वही मेरा है.आपने बहुत कोशिस की उन्हेँ अपने से जोड़ऩे की लेकिन न जोड़ सके.हाँ,आपने उनकी हत्या जरुर करवा दी. " "ऐसा नहीँ है. हम लोग क्योँ आलोक वम्मा की हत्या करेँगे?वह हमारे हिँसक आन्दोलन का विरोधी जरूर था लेकिन उसकी वैचारिक क्रान्ति हमारे पक्ष मेँ थी.हम क्योँ उसका मर्डर करवाते.?" "आप माने या न माने आप लोगोँ मेँ से ही किसी ने उनकी हत्या की है.हम हाथ जोड़ते हैँ ,आप लोग हमसे न मिला करेँ.जानते हो यह देश....... " "हमसे कोई दुख पहुँचा हौ तो माफ करना.वैसे हम लोगो की कभी भी जरूरत पड़े तो हमेँ याद करना. " "देखा जाएगा. " " देखा नहीँ जाएगा.इस देश मेँ निर्दोषोँ को फाँसी पर लटकाया जा सकता है,अफजल को फाँसी से रोका जा सकता है. " " जानता हूँ,षड़यन्त्रकारी एवं दुष्ट व्यक्ति ऐसे खेल खेलने लिए स्वतन्त्र हैँ." " न्याय यहाँ पक्षपात जातितात सम्प्रदायवाद का शिकार हो जाता है. " "और फिर यहाँ कानून के रखवाले ही कानून की शपथ लेने वाले ही अपने जीवन मेँ 20प्रतिशत भी कानून का पलन नहीँ कर.वहीँ दूसरी ओर घिसी पिटी परम्पराएँ रीतिरिवाज, ,जातिवाद, पक्षपात, दबंगता, मनमानी आदि. " "हूँ!कानून का कोई भाई बान्धव नहीँ होता लेकिन यहाँ वकील एवं सिपाई के कानून का भाई.......? " " खैर छोड़ो." नक्सलवादी लीडर जो कि चार कमाण्डो के साथ था चरित्र वम्मा से मिल कर चला गया था.अभी वह चैन की श्वास ले ही पाया था कि- एक सिपाही ने आकर कहा कि आपको डीएम साहिबा ने बुलाया है. जब पुलिस की गाड़ी से चरित्र वम्मा डीएम आफिस पहुँचा तो -"ओह,तो आप हैँ साहिबा. " डीएम की कुर्सी पर बैठी मानसी कश्यप बोली कि कल शाम को ही तो ट्रांसफर होकर यहाँ आयी हूँ. " मैँ तो गया आने को ही करता रहा . " "आप न आ सके मेँ आगयी. बैठो,सब ठीक तो है? " कुर्सी पर बैठते हुए-" ठीक हूँ,लेकिन हमसे ज्यादा न मिलना.मेरी तरह आप भी विवादस्पद हो जायेँगी.हाँ, अपने सर जी की सुनाओ." मानसी कश्यप खामोश ही रही. "सब ठीक तो है न? " मानसी कश्यप न भावुक होगयी. "महेन्द्र सर ने हमारे लिए क्या क्या नहीँ सहा?मैँ जब अपने लक्ष्य को पा गयी तो............. " "तो ,तो क्या? " "मैँ जब उनसे मिलने आश्रम गयी तो......आश्रम मेँ बताया गया कि वह कहीँ अज्ञातबास मेँ चले गये हैँ. " लोगोँ का कहना था कि मानसी कश्यप के आफीसर बनने के बाद सर जी का सांसारिक लक्ष्य पूरा हो गया था.अब....आखिर अब कहाँ गये होँगे -सर जी?चरित्र वम्मा अब खामोश.....सर महेन्द्र मिश्रा की डायरी के पृष्ठ पलटने लगा था. HAPPY HOLI ! ....JAI HO....OM...AAMEEN.

लघु कथा:कहाँ गये सर जी?

नक्सलवादी चरित्र वम्मा से सम्पर्क स्थापित करने लगे थे.उनके कुछ लीडर चाहते थे कि चरित्र वम्मा हमसे हाथ मिला ले. "जो जबाब मेरे चाचा आलोक वम्मा का था वही मेरा है.आपने बहुत कोशिस की उन्हेँ अपने से जोड़ऩे की लेकिन न जोड़ सके.हाँ,आपने उनकी हत्या जरुर करवा दी. " "ऐसा नहीँ है. हम लोग क्योँ आलोक वम्मा की हत्या करेँगे?वह हमारे हिँसक आन्दोलन का विरोधी जरूर था लेकिन उसकी वैचारिक क्रान्ति हमारे पक्ष मेँ थी.हम क्योँ उसका मर्डर करवाते.?" "आप माने या न माने आप लोगोँ मेँ से ही किसी ने उनकी हत्या की है.हम हाथ जोड़ते हैँ ,आप लोग हमसे न मिला करेँ.जानते हो यह देश....... " "हमसे कोई दुख पहुँचा हौ तो माफ करना.वैसे हम लोगो की कभी भी जरूरत पड़े तो हमेँ याद करना. " "देखा जाएगा. " " देखा नहीँ जाएगा.इस देश मेँ निर्दोषोँ को फाँसी पर लटकाया जा सकता है,अफजल को फाँसी से रोका जा सकता है. " " जानता हूँ,षड़यन्त्रकारी एवं दुष्ट व्यक्ति ऐसे खेल खेलने लिए स्वतन्त्र हैँ." " न्याय यहाँ पक्षपात जातितात सम्प्रदायवाद का शिकार हो जाता है. " "और फिर यहाँ कानून के रखवाले ही कानून की शपथ लेने वाले ही अपने जीवन मेँ 20प्रतिशत भी कानून का पलन नहीँ कर.वहीँ दूसरी ओर घिसी पिटी परम्पराएँ रीतिरिवाज, ,जातिवाद, पक्षपात, दबंगता, मनमानी आदि. " "हूँ!कानून का कोई भाई बान्धव नहीँ होता लेकिन यहाँ वकील एवं सिपाई के कानून का भाई.......? " " खैर छोड़ो." नक्सलवादी लीडर जो कि चार कमाण्डो के साथ था चरित्र वम्मा से मिल कर चला गया था.अभी वह चैन की श्वास ले ही पाया था कि- एक सिपाही ने आकर कहा कि आपको डीएम साहिबा ने बुलाया है. जब पुलिस की गाड़ी से चरित्र वम्मा डीएम आफिस पहुँचा तो -"ओह,तो आप हैँ साहिबा. " डीएम की कुर्सी पर बैठी मानसी कश्यप बोली कि कल शाम को ही तो ट्रांसफर होकर यहाँ आयी हूँ. " मैँ तो गया आने को ही करता रहा . " "आप न आ सके मेँ आगयी. बैठो,सब ठीक तो है? " कुर्सी पर बैठते हुए-" ठीक हूँ,लेकिन हमसे ज्यादा न मिलना.मेरी तरह आप भी विवादस्पद हो जायेँगी.हाँ, अपने सर जी की सुनाओ." मानसी कश्यप खामोश ही रही. "सब ठीक तो है न? " मानसी कश्यप न भावुक होगयी. "महेन्द्र सर ने हमारे लिए क्या क्या नहीँ सहा?मैँ जब अपने लक्ष्य को पा गयी तो............. " "तो ,तो क्या? " "मैँ जब उनसे मिलने आश्रम गयी तो......आश्रम मेँ बताया गया कि वह कहीँ अज्ञातबास मेँ चले गये हैँ. " लोगोँ का कहना था कि मानसी कश्यप के आफीसर बनने के बाद सर जी का सांसारिक लक्ष्य पूरा हो गया था.अब....आखिर अब कहाँ गये होँगे -सर जी?चरित्र वम्मा अब खामोश.....सर महेन्द्र मिश्रा की डायरी के पृष्ठ पलटने लगा था. HAPPY HOLI ! ....JAI HO....OM...AAMEEN.