मंगलवार, 30 नवंबर 2010

लघु कथा:शिक्षा के करी��

शिँक्षा नाम की एक युवती अपने परिवार व समाज मेँ अलग थलग पड़ गयी थी.दोष उसका इतना कि परिवार व समाज उससे जो उम्मीदेँ रखता , उस पर वह खरी नहीँ उतरती .बस,उसकी नजर मेँ था ग्रन्थोँ व महापुरुषोँ का दर्शन.



सन 2010ई0 की 19 नवम्बर,इन्दिरा गांधी जयन्ती ! दूसरी ओर एच टी लीडरशिप समिट कार्यक्रम ! जिसको सम्बोधित कर रहे थे -मानव संसाधन विकास मन्त्री कपिल सिब्बल.


कि-



" हमेँ यह तय करना होगा कि अपने संस्थान मेँ हम किस तरह के छात्र तैयार करना चाहते हैं.शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए पाठ्यक्रमोँ मेँ बदलाव के साथ शिक्षकोँ को भी प्रशिक्षित करना होगा . "



'शिक्षा' अब 'अकेला चल सिद्धान्त ' के आधार पर अपना जीवन जीने लगी थी.वह अब अपने सर आलोक वम्मा के मिशन को समझ चुकी थी.


कि-

"चाहें कोई कुछ भी कर रहा हो , हमे अपने लक्ष्य व कर्त्तव्योँ को नहीँ भूलना. "



मैँ शिक्षा के साथ बरेली महानगर स्थित एक शैक्षिक संस्थान 'बासवाणी अकादमी' के सेमीनार मेँ उपस्थित था.



रविवार,21 नवम्बर 2010 ई0 ! गुरु नानक जयन्ती व गंगा स्नान पर्व !




" मन चंगा तो कठौती मेँ गंगा. "



मानवीय प्रदूषण भी तीन तरह से है -मन,वचन व कर्म से.सिर्फ गंगा नहाने से क्या होता है?जब तक मन,वचन व कर्म से न नहाये अर्थात अपने मन,वचन व कर्म को पवित्र न किया?



ब्राहमणत्व का मैँ समर्थक हूँ लेकिन ब्राह्मणवाद का नहीँ जो कि चारोँ वेदोँ के खिलाफ मानता हूँ मैँ.



मैँ जिस कालेज मेँ कार्य कर रहा हूँ ,वहाँ कुछ व्यक्ति धर्म स्थलोँ की यात्रा पर काफी विश्वास रखते हैँ लेकिन.....


वे क्या आम आदमी से हट कर हो गये हैँ ? साधारण से असाधारण हो गये हैँ? वे धर्म मेँ हमेँ नजर नहीं आते,यहाँ तक कि वे ही क्या अन्य भी धर्म मेँ नजर नहीं आते . सब के सब सम्प्रदाय व उन्माद में नजर आते हैं.



शिक्षक होने के नाते हमारा क्या लक्ष्य व कर्त्तव्य होना चाहिए ? जब गृहस्थ व निरा भौतिक भोगवादी जीवन जीने वाले शिक्षक होवेंगे तो क्या होगा ? अब यह आचार्य(अपने आचरण से भी शिक्षित) न होंगे तो क्या होगा?ज्ञान ,शिक्षा व आदर्शोँ से इनका वास्तव मेँ कितना सम्बन्ध होता है?वैसे ही आज अभिभावक व विद्यार्थी है.शिक्षा को जीवन मेँ नहीँ उतारना ,बस रट कर या कैसे भी परीक्षा मेँ बेहतर अंक लाना है. युधिष्ठर जैसे विद्यार्थियोँ को अब भी अपना पाठ याद करने मेँ वक्त लगे लेकिन अब तो गुरु ही उनके खिलाफ माहौल बना देते है.



ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

नक्सली कहानी:गम छिपाते रहो

झारखण्ड का एक गाँव 'नवीराम कुर्मियात '.



आसपड़ोस व गाँव के अन्दर सैन्य बलोँ की गस्त तेज हो गयी थी. कुछ नक्सलियोँ ने गाँव के एक मकान मेँ आश्रय ले रखा था.


सभी नक्सली एक कमरे मेँ बैठे वीडियो देख रहे थे,जहाँ राजेन्द्र भी उपस्थित था.



"जिन्दगी गीत है उसको गाते रहो


गम छिपाते रहो,मुस्कुराते रहो. "


जब यह गाना प्ले हुआ तो एक नक्सली उठ बैठा.

राजेन्द्र बोला-" कहां चले ,महतो ?"


" बाहर बरामडे मेँ आराम करता हूँ."



महतो कमरे के बाहर आ कर बरामडे मेँ पड़ी चारपाई पर लेट गया.उसका मन अन्तर्द्वन्द से ग्रस्त हो चुका था.

"गम छिपाते रहो ,
मुस्कुराते रहो."
-गाना अब भी सुनाई दे रहा था.


महतो का दिल दिमाग डिस्टर्व हो चुका था.


कैसे मुस्कुराएं?कब तक मुस्कुराएं?हूँ!गम को छिपाते चलेँ?फिर छिप छिप कर यह गम भड़ास बन जाएँ?
भड़ास भी अब......... आक्रोश ....खिन्नता....चिड़चिड़ापन....हिँसा ..... जबरदस्ती....हूँ!


काश! कोई हमको चाहता, हम भी चाहते किसी को.
हम भी कहते दिल की,
मरहम हमको मिलते.
आंसू न बहे तो क्या,

हमारे खिलखिलाने के पीछे,

मेरे'पीछे' को कौन समझे?


कोई तो 'नम आंख 'को समझते.



हूँ!सामाजिकता के दंश ! परिवार के दंश!
और न जाने क्या क्या दंश....?मैँ आज परिवार समाज कुप्रबन्धन के खिलाफ खड़ा हूँ लेकिन खुद क्या कर रहा हूँ?


पहली पाठशाला है परिवार,बालक दर्पण है परिवार का!! हूँ, जानते हैँ लेकिन ....?!एक यह भी परिवार है,दूसरा मेरा परिवार था.बाप ने अपने बड़े भाई से भी सीख नहीँ ली.
रुपया ही नहीँ,शान्ति सुकून व प्रेम भी चाहिए.इस परिवार मेँ कुल चार व्यक्ति हैँ.एक अधेड़ दम्पत्ति व दो बच्चे.एक बीस वर्ष का युवक राजेन्द्र दूसरा सात वर्षीय दीपेश.कितना प्रेम है इन लोगोँ मेँ! यहाँ तक की अन्जान मजबूर ,गरीबोँ, भिखरियोँ,आदि पर भी अपना प्यार लुटाते फिरते हैँ.और अच्छे इन्सान की पहचान भी क्या है? 'लोगोँ ' को भी कमाना.तन व जन से बढ़कर और क्या धन ?



जब परिवार का नेतृत्व परिजनोँ दुख दर्द मेँ संवेदनाएँ न बांट अपनी धुन मनमानी व स्वार्थ मेँ जिए तथा परिवार मेँ शान्तिपूर्ण व सौहार्द पूर्ण वातावरण न दे सके तो परिवार की कब तरक्की ?

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

21.10.2010:आजाद हिन्द फौज का 67वां स्थापना दिवस


विभिन्न जनपदोँ मेँ भारतीय सुभाष सेना ने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस
की आजाद हिन्द फौज का 67वां स्थापना दिवस समारोह का आयोजन किया
गया.भारतीय सुभाष सेना के पीलीभीत जिलाध्यक्ष कन्हई लाल प्रजापति की
अध्यक्षता मेँ समारोह का आयोजन नरायनपुर सिरसा चौराहा पूरनपुर मेँ
सम्पन्न हुआ.समारोह का संचालन जिलाध्यक्ष राकेश कुमार सुभाष ने किया .
सेना के वरिष्ठ प्रान्तीय महासचिव प्रवक्ता श्री पातीराम वर्मा सुभाष ने
अपने सम्बोधन मेँ कहा कि नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी आजाद हिन्द
फौज की स्थापना 21अक्टूबर1943ई0को सिँगापुर मेँ की थी.भारतीय सुभाष सेना
पीलीभीत जिलाध्यक्ष कन्हई लाल प्रजापति सुभाष ने कहा कि नेता जी सुभाष
चन्द्र बोस आज भी जीवित हैँ.पूर्ण रुप स्वस्थ हैँ और निकट भविष्य कुछ
ही दिनोँ के बाद उनका भारत मेँ खुलेआम प्रकटीकरण होगा.महान सन्त सम्राट
सुभाष जी का कहना है कि तृतीय विश्व युद्ध सुनिश्चित है और वह सुभाष पर
निर्भर करता है . यदि भारत की जनता सुभाष का साथ देती है तो युद्ध टल
सकता है.

इस उपलक्ष्य पर हमने भी मीरानपुर कटरा स्थित आदर्श बाल विद्यालय
इण्टर कालेज मेँ एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया जिसमेँ मैँने बताया कि
जिस तथाकथित विमान दुर्घटना मेँ उनकी मृत्यु बतायी जाती है,वह फर्जी
सिद्ध हो चुकी है.जांच हेतु जब मुखर्जी आयोग रुस गया तो उसे फोन पर
धमकियां भी मिलीँ.भारत के एक गृह सचिव का कहना है कि नेता जी सम्बन्धी
दस्तावेज सार्वजनिक करने का मतलब है एक देश को नाराज करना.सबसे बड़ी बात
यह है कि विदेश मन्त्रालय, गृह मन्त्रालय व अन्य कार्यालयोँ से सम्बन्धित
दस्तावेज गायब क्योँ कर दिये गये?इस मामले मेँ कांग्रेस का चरित्र
संदिग्ध नहीँ लगता क्या ?

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

02 अक्टूबर:मेरा जन्म दिन भी.



मैँ ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'.... इत्तफाक से मेरा जन्मदिन भी है-02अक्टूबर.मेरे लिए यह सदयता दिवस है.


मन प्रबन्धन के अन्तर्गत मैँ मन ही मन अपने अन्दर करुणा व संयम को हर वक्त स्वागत के लिए हालात बनाता रहा हूँ ,जिसके लिए कल्पनाओँ ,विचारोँ,स्वाध्याय ,इण्डोर अभिनय व अन्य उपाय करता रहा हूँ.वास्तव मेँ अहिँसा के पथ पर चलने के लिए करुणा व संयम के लिए हर वक्त मन के द्वार खोले रखना आवश्यक है.इस अवसर पर मैँ 'प्रेम 'पर भी कुछ कहना चाहुँगा.वे सभी जरा ध्यान से सुनेँ जो किसी से प्रेम मेँ दिवाने हैँ.प्रेम पर न जाने कितनी फिल्मेँ बन चुकी हैँ,किताबेँ लिख चुकी है.कहाँ प्रेम है ?प्रेम जिसमेँ जागता है,उसकी दिशा दशा ही बदल जाती है.प्रेम जिसमे जाग जाता है,उसके मन से हिँसा गायब हो जाती है,स्वेच्छा की भावना समाप्त हो जाती है. 'मैँ' समाप्त हो जाता है.


"दिल ही टूट गया तो जी कर क्या करेँ?"


यह सब भ्रम है.


प्रेम मेँ दिल नहीँ टूटता. हाँ,काम मेँ दिल टूट सकता है.कहीँ न कहीँ प्रेम दिवानोँ या प्रेम दिवानीयोँ से सामना हो जाता है,सब के सब भ्रम मेँ होते हैँ. प्रेम मेँ तो अपनी इच्छाएं खत्म हो जाती हैँ.जिससे प्रेम होता है,उसकी इच्छाएं ही अपनी इच्छाएं हो जाती हैँ.
जो अपनी प्रेमिका या प्रेमी की ओर से उदास हो जाते हैँ, वे प्रेमवान नहीँ हो सकते.अखबारोँ मेँ निकलने वाली आज कल की प्रेम कहानियां हवस की कहानियां है.जो चार पांच साल बाद टाँय टाँय फिस्स..........प्रेम तो अन्त है शाश्वत है जो जाग गया तो फिर सोता नहीँ, व्यक्ति निराश नहीँ होता. करुणा व संयम के बिना प्रेम कहाँ ?प्रेम तो सज्जनता की निशानी हैँ.जो जीवन को मधुर बनाती है.


खैर....



आज गांधी जी का जन्मदिन है.जो कि बीसवीँ सदी के सर्वश्रेष्ठ जेहादी हैँ.जिनका हर देश मेँ सम्मान बढ़ता जा रहा है.

गांधी वास्तव मेँ सभ्यता की पहचान हैँ.जो कहते हैँ मजबूरी का नाम -गांधी,वे भ्रम मेँ हैँ.



 

गुरुवार, 9 सितंबर 2010

वो एलियन्स कहाँ गये?

यह इत्तफाक कहेँ या और कुछ कि मैँ तथाकथित हिन्दू परिवार मेँ
जन्मा जरुर था लेकिन वहाँ प्रेम नहीँ पा सका था .मेरे लेडीज एण्ड जेण्टस
जो भी फ्रेण्डस थे,इत्तफाक से गैर हिन्दू थे. एम एस सी करने के बाद
मैँ शोधकार्य मेँ लग गया था.जिसकी सघनता मेँ प्रेम मित्रता या शादी पर
सोँचने की फर्सत ही नहीँ थी.मेरी एक फ्रेण्ड रही थी नादिरा खानम. वह
सम्भवत: हमेँ नहीँ भूली थी,कभी कभार हमसे मिलने चली आती थी.ऐसे मेँ वह ही
मैँ और समाज के बीच सेतु थी.प्रत्येक वर्ष 16 नवम्बर को मैँ उसके जन्म
दिन पर उसके घर जाना नहीँ भूलता था.एक दिन उसने अचानक मुझसे पूछ लिया-

" भविष्य! क्या ऐसे ही गम्भीरता मेँ जीवन गवाँ दोगे? शादी
का क्या नहीँ सोँचा?"


तब मैँ बोला-"शादी ,हमसे कौन करेगा शादी? क्या तुम करोगी शादी? "


इसके बाद मैँ डर सा गया था.नादिरा खानम के गम्भीर होते चेहरे ने हमेँ
और डरा दिया था.


वह बोली-"होश मेँ हो भविष्य?"

मैँ बोल दिया-"सारी,सारी नादिरा.मैँ तो योँ ही तुम्हारे मन को......"


नादिरा खानम मुस्कुरा दी-" आप तो पसीना पसीना हो रहे हो? नो टेन्शन,भविष्य. "

नादिरा खानम की शादी के एक साल बाद ही एक एक्सीडेण्ट मेँ उसके
पति की मृत्यु हो गयी.एक दिन मैने उससे कह दिया -"नादिरा,मेरे साथ काम पर
आ जाओ.तुमको रोजगार भी मिल जाएगा और ...... "


अब हम और नादिरा खानम एक साथ थे,जीवन के हर क्षण एक साथ थे.


एक दिन मैँ नादिरा के साथ बैठा अपने कम्पयूटर पर एलियन्स
के सम्बन्ध मेँ एकत्रित विभिन्न जानकारियोँ का अध्ययन कर रहा था. वर्ष
1971ई0के 'अपोलो 14' के चाँद मिशन के एक यात्री रह चुके-डा0 मिशेल द्वारा
वृहस्पतिवार 24 जुलाई 2008ई को एलियन्स के सम्बन्ध मेँ दिए बयान भी
संकलित थे.


* * *


टीवी पर अन्तरिक्ष के दृश्य दिखाये जा रहे थे.

क्या वास्तव मेँ एक उड़नतश्तरी न्यू मैक्सिको के एक खेत मेँ जून
1947ई0 मेँ गिरी थी?जिससे सम्बन्धित तथ्योँ को पेश करने के साथ अन्तरिक्ष
की भावी सम्भावनाएँ एक टीवी चैनल पर दिखाई जा रही थीं.

एक युवक तासीन अजीम कुर्सी पर बैठते हुए बोला -


"भाई जान! अन्तर्रास्ट्रीय दबाव के रहते अब पाकिस्तान से जेहादियोँ
का आना कम हो गया है."

"हाँ ,जो आ भी रहे हैँ वे शिविरोँ से भाग कर अपने घर जा रहे हैँ,एक
मिनट....."

मोबाइल पर किसी ने काल किया.


मोईनुद्दीन मोबाइल देखते हुए बोला-


" मेरी लड़की का फोन है."


"पापा ,घर कब आ रहे हो ? "


" बेटी ,एक घण्टे बाद आ रहा हूँ."


"पापा ,एक खास बात.टीवी पर आ रहा है कि शाहजहाँपुर के एक गाँव
मेँ दूसरी धरती का यान उतरा ,जो अण्डाकार का था."


"अच्छा,कहीँ ऐसा तो नहीँ कोई सीरियल बगैरा देख लिया हो नीँद के नशे मेँ ?"


"पापा आप भी? मैँ क्या इतनी ऐसी हूँ?"


रुबी मोबाइल आफ कर सोँचने लगी-


जून 1947ई0की बात,न्यू मैक्सिको का रहने वाला मिस्टर एस.जो एक
अन्तरिक्ष संस्था मेँ वैज्ञानिक था.अपने अवकाश के दिन वह न्यू मैक्सिको
के बाहर अपने कृषि फार्म पर बीताता था.

एक दिन वह अपने कृषि फार्म पर ही था कि अचानक अपने सामने एक
परग्रही प्राणी/एलियन को पाकर चौँका.


मिस्टर एस के मुँह से सिर्फ इतना निकला-"तुम!तुम यहाँ क्योँ?क्योँ?"

तब एलियन बोला-


"मित्र,निश्चिन्त रहो.क्या तुम हमारी मदद कर सकते हो?"


मि एस खामोश हो उसे आश्चर्य से देखता रहा.


"हमारे साथियोँ का एक यान यहाँ दुर्घटना ग्रस्त हो गया था
,जिसमेँ दो लोग जीवित थे सम्भवत:.उन सब को आपकी सेना ले गयी."


मि एस उसे एक कमरे मेँ ले जा कर बोला-" मुझसे जितना
बनेगा,उतना प्रत्यन करूँगा. "

फिर मि एस कहीँ का सोँचने लगा तो एलियन बोला -


"मि एस मुझे दुख है कि तुम्हारी बीबी की हत्या एवं पुत्री रुचिको का
अपहरण उन लोगोँ के द्वारा कर लिया गया . "


एलियन फिर बोला-"सनडेक्सरन धरती के कुछ निवासियोँ का... "

मि एस बोला- "सनडेक्सरन ?"


तब एलियन बोला - "हाँ, ग्यारह फुटी और तीन नेत्रधारी व्यक्तियोँ की धरती!?"

मि एस चौँका-" क्या,क्या कहते हो?"

एलियन बोला-"अन्तरिक्ष मेँ और भी धरतियाँ हैँ,आप लोगोँ से कहीँ
ज्यादा उच्च विज्ञान व तकनीकी रखते हैँ वहाँ के निवासी.अतीत मेँ भूमध्य
सागर व कश्यप सागर के समीपवर्ती कुछ कबीलोँ का अन्तरिक्ष की अन्य धरतियोँ
से सम्बन्ध था."

मि एस सोँचने लगा-
कुछ दिन पूर्व गिरी दोनोँ उड़नतश्तरियाँ जरुर ' धधस्कनक'
धरती की होगी.एक तो मेरे ही खेत मेँ गिरी थी...."

अमरीकी सेना ने उड़नतश्तरियोँ के मलवे व एलियन्स को गायब करवा दिया
था.अब इस एलियन के साथ साथ मि एस को जेल मेँ डाल दिया गया.जेल से छूटने
के दो दिन बाद वायु यान दुर्घटना मेँ मि एस की मृत्यु हो गयी.


रुबी सोँच रही थी-"वो एलियन्स कहाँ गये?"

सन 2007ई0 की जून....

रविवार, 2 मई 2010

वैज्ञानिक अध्यात्म: ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान प्रस्तुति:अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'




05जून1979ई0 को मेँ लगभग छ: वर्ष का था.बीसलपुर (पीलीभीत)स्थित बाला जी की मढ़ी,जहाँ सरस्वती शिशु मन्दिर विद्यालय भी स्थित था.जहाँ हमारे पड़ोस मेँ रहने वाला एक हमउम्र बालक सन्तोष गंगवार कक्षा दो पास होकर तीन मेँ आया था.मैँ उसके साथ वहाँ जाने लगा था.गायत्री परिवार एवं आर्य समाज के लोगोँ के सम्पर्क मेँ भी आ चुका था.इसी दौरान.....?!

शान्ति कुञ्ज द्वारा वैज्ञानिक अध्यात्म की अध्ययन अनुसंधान यात्रा की शुरुआत 05जून1979ई0 को ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना के साथ हुई.उस वक्त पं. श्री राम शर्मा आचार्य ने कहा था

" आज हम सब ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के रूप मेँ जिस वैज्ञानिक अध्यात्म की अनुसंधानशाला की स्थापना कर रहे हैँ,वह कल इक्कीसवीँ सदी के उज्जवल भविष्य का वैचारिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक आधार बनेगी..... ...भविष्य मेँ इसी का विकास महान विश्वविद्यालय के रुप मेँ होगा." श्री राम शर्मा आचार्य का स्वपन साकार हुआ.देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना हुई.जहाँ अब 'वैज्ञानिक अध्यात्म विभाग' की स्थापना भी हो चुकी है.


काफी वर्ष पहले रुस मेँ एक ऐसा कैमरा विकसित हुआ जो व्यक्ति के आभा मण्डल की तश्वीर खीँचता है.जिसके माध्यम से हम विविध जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैँ-व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर किस स्तर का है,उसे भविष्य मेँ कौन से रोग हो सकते हैँ.आभा मण्डल के माध्यम से अनेक निष्कर्षोँ तक पहुँचा जा सकता है.आप सब को ज्ञात होना चाहिए कि रंग सुगन्ध ध्वनि प्रकाश तरंग आदि का सूक्ष्म जगत मेँ काफी महत्व है जो स्थूल शरीर व जगत को भी प्रभावित करता है.इसी सिद्धान्त के तहत अब कलर थेरेपी ,साउण्ड थेरेपी, सुगन्ध थेरेपी, आदि का विकास सम्भव हो सका है.तरंग ,प्रकाश व रंग को प्रभावित करने वाली भौगोलिक घटनाओँ ,ग्रहोँ, आदि की स्थितियोँ ने ज्योतिष विज्ञान, रत्न विज्ञान ,आदि को जन्म दिया.शरीर जिन पंच तत्वोँ से बना है,उन पाँच तत्वोँ का भी अपना अपना रंग होता है.

अमेरीका स्थित एक संस्था सूक्ष्म शरीर पर शोध कर रही है जिसे भूत कहा जा सकता है.एक पुस्तक' लाइफ आफ द लाइफ'मेँ ऐसे व्यक्तियोँ के अनुभवोँ को संकलित किया गया है जो चिकित्सकोँ की दृष्टि मेँ मर चुके थे लेकिन फिर जिन्दा हो गये. विज्ञानवेत्ता स्टुअर्ट हाल रायड ने अपनी पुस्तक 'मिस्ट्रीज आफ इनरसेल्फ'मेँ कहा है कि ओ .ब .ई( शरीर से बाहर अनुभव)की अधिकतर घटनाएँ दूरी का अतिक्रमण करके स्थान के सम्बन्ध मेँ पायी गयी हैँ,लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी पाई गई हैँ जिसमेँ समय का भी अतिक्रमण हो सकता है.दुनियां के तमाम पन्थ आत्मा और सूक्ष्म शरीर(भूत)के अस्तित्व को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हैँ.खैर.....


अन्ध विश्वासोँ से निकल कर अपने पन्थ -जाति, आदि के रीतिरिवाजोँ -विचारों को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतारने के बाद जो शेष बचता है वही वैज्ञानिक अध्यात्म है. वैज्ञानिक अध्यात्म के जगत मेँ
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का योगदान सराहनीय रहेगा जिसने वैज्ञानिक अध्यात्म युग का श्रीगणेश किया है.हाँ अब कुछ गाय पर भी कुछ कह दूँ.


जब व्यक्ति के मन मेँ विकार आते हैँ व्यक्ति सिर्फ भोगवादी भौतिकवाद मेँ जीता है-प्रकृति का विदोहन बढ़ जाता है.
धर्म व मोक्ष से हट अर्थ व काम महत्वपूर्ण हो जाता है.प्रकृति असन्तुलन बढ़ जाता है.मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है.कहते हैँ कि गाय के सीँगोँ पर पृथ्वी टिकी है....क्या कहा गाय के सींगोँ पर..?!हाँ!जरा इसे विज्ञान की कसौटी पय कसिए तो....

हजरत मोहम्मद साहब ने कहा है कि गाय का दूध गिजा है घी दबा और गोस्त बीमारी है.महात्मा गाँधी ने कहा है कि गाय की रक्षा करना ईश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है.

गाय का सम्मान(सीँग)जब थक जाते है अर्थात कमजोर पड़ जाते हैँ तब धरती हिलती है.समृद्ध भारत का इतिहास गाय के सम्मान व सेवा के जिक्र के बिना अपूर्ण है. अनेक वैज्ञानिक सिद्ध कर चुके हैँ कि कृत्रिम वर्षा कराने मेँ सहायक प्रोपलीन आक्साइड गैस हमेँ गाय के घी को हवन से प्राप्त होती है.गाय के दूध मेँ STRONTIONतत्व पाया जाता है जो अणु विकरण का प्रतिरोधक है.कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाने पर भी गाय के दूध से बना घी नुकसानदायक नहीँ होता है. गाय के मूत्र मेँ विटामिन बी तथा कार्बोलिक एसिड होता है जो रोगाणुओँ का नाश करता है.

वैज्ञानिक कहते
है कि अगला युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा मै कहता हूँ कि इसके बाद का युद्ध गाय के लिए लड़ा जाएगा.मनुष्योँ मेँ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा भावी पीड़ी के स्वास्थ्य के लिए हर घर मेँ गाय का पालन आवश्यक है.प्रति व्यक्ति पाँच वृक्षोँ अर्थात पंचवटी का निर्माण आवश्यक है.

कलि औरतेँ-2




'सद्भावना'इमारत के समीप ही एक इमारत थी,जिसके मुख्य गेट पर लिखा था -अतिथि कक्ष.अफस्केदीरन अर्थात आरदीस्वन्दी की माँ नारायण के साथ अतिथि कक्ष मेँ पहुँची .


नारायण के गुरु अर्थात ' महागुरु' जिन्होंने 'सद्भावना' इमारत का निर्माण करवाया था,आखिर उन्होँने सद्भावना मेँ रोबेट स्त्रियाँ अर्थात 'ह्यूमोनायड' क्योँ रखे?

अब से 220वर्ष पूर्व अर्थात सन 4800ई0 के19जनवरी , एक पिरामिड आकार की भव्य बिल्डिँग मेँ मैरून वस्त्रोँ मेँ स्त्री -पुरुष मेडिटेशन मेँ बैठे थे.महागुरु की उम्र उस वक्त 30 वर्ष थी.आज उसके छोटे भाई की शादी लेकिन वह स्वयं बड़ा होकर भी अभी अविवाहित ?क्या लोक मर्यादाएँ- परिवार मर्यादाएँ?गरीब व मजबूर जनता के लिए तो सब घोर कलियुग का परिणाम ..!मुट्ठी भर दस प्रतिशत लोग सिर्फ एश्वर्यवान व सभी शक्तियोँ के अधिकारी थे.अन्तरिक्ष की अन्य धरतियोँ पर यहाँ के पूँजीपति व वैज्ञानिक लगभग सन 2150ई0 से ही जा जा कर रहने लगे थे .विभिन्न कारणोँ से धरती पर आक्सीजन ,आनाज ,फल, सब्जियोँ ,आदि की उपलब्धता नाम मात्र की रह गयी थी .मध्यम वर्ग बिल्कुल समाप्त हो चुका था.उच्च वर्ग व निम्न वर्ग;दो मेँ समाज विभाजित हो चुका था.प्राकृतिक मनुष्योँ से कई गुनी ज्यादा संख्या कृत्रिम मनुष्योँ , साइबोर्ग व ह्यूमोनायड की थी.सन2165ई0 मेँ भारतीय उपमहाद्वीप व चीन को दो भागोँ मेँ विभाजित करने वाली घटना ,जिसने अरब की खाड़ी को चीन के सागर से होकर प्रशान्त महासागर से मिला दिया था; के दौरान भूकम्प मेँ पूरे के पूरे शहर नष्ट हो गये थे.अनेक धर्म स्थल नष्ट हो गये थे .वैसे भी प्रकृति योग स्वास्थ्य मानवता आदि के सामने बाइसवीँ सदी के प्रथम दशक तक स्थापित धर्म स्थलोँ महत्व कमजोर पड़ गया था तथा आश्रम, आक्सीजन केन्द्र, योग केन्द्र का महत्व बढ़ गया था.इक्कीसवीँ सदी के आदर्श पुरुषोँ मेँ से एक डा.ए पी जे अब्दुल कलाम का यह कथन सत्य साबित होने की ओर था कि आने वाली
नस्लेँ हमेँ इस लिए याद नहीँ करने वाली कि हम जाति ,पन्थ, रीति रिवाजोँ के लिए सिर्फ संघर्ष करते रहेँ.इक्कीसवी सदी तक पूजे जाने वाले अनेक जातीय व मजहबी नेता आदि नकारे जा चुके थे.विश्व को सार्बभौमिक ज्ञान, भाईचारा, आदि की ले जाने वालोँ का ही अब सिर्फ सम्मान बचा था.अब फिर जाति के स्थान पर वर्ण व्यवस्था का
महत्व बढ़ गया था.




"आर्य,उन्मुक्त!तुम ख्वाब छोड़ दो कि कोई मिलेगी .ऐसे मेँ तुम्हेँ कोई नहीँ मिलनी .फिर अब वैसे भी सब स्त्री पुरुष मिल जुल कर बेटोक रहते हैँ ."


" फिर भी....."



"तुम जिन अर्थात जितेन्द्रिय नहीँ हो ?कामुकता तुम्मे जोर मार रही है ?अब जब हर परिस्थितियोँ मेँ स्त्री पुरुष के साथ साथ रहने के अवसर है तो काहे की खिन्नता ?जरूर तुम काम के वशीभूत हो?सन्तानोत्पत्ति तुम करना नहीँ चाहते.गृहस्थ जीवन के परम्परागत दायित्वोँ व मर्यादाओँ मेँ भी जी नहीँ सकते ,तब तो फिर वही मेडिटेशन , गीता व कुरआन"

महागुरु का वास्तविक नाम था-उन्मुक्त जिन.


उन्मुक्त जिन मेडिटेशन हाल मेँ अनेक स्त्री पुरुषोँ के बीच मेडिटेशन मेँ बैठा था.मेडिटेशन मेँ वह बैठा जरूर था लेकिन.....उसके कानोँ मेँ आवाज गूँज रही थी -

" आर्य,उन्मुक्त!तुम अभी जिन नहीँ हुए हो ,जिन के नाम पर तुम पाखड़ी हो.तुमको अभी और कठोर तपस्या करनी होगी."

* * * *


उन्मुक्त जिन के अज्ञातबास मेँ जाने के बाद कुख्यात औरतेँ ब्राह्माण्ड मेँ बेखौफ हो आतंक मचाने लगीँ .इन कुख्यात औरतोँ के बीच एक पाँच वर्षीय बालक ठहाके लगा रहा था.

इधर तीन नेत्र धारियोँ की धरती सनडेक्सरन पर आपात कालीन बैठक मेँ अनेक धरतियोँ के प्रतिनिधि उपस्थित थे.जिसमेँ औरतोँ की बहुलता थी.सभी इस बात के लिए चिन्तित थे कि कैसे ब्राह्माण्ड महा सभा मेँ अपना बहुमत बनाया जाये जो कि उन्मुक्त जिन के अज्ञातबास मेँ जाने के बाद कमजोर पड़ने लगा था और कुख्यात शक्तियाँ अपना मुँह फैलाने लगी थीँ.

एपीसोड-2
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लेखक:अशोक कुमार वर्मा'बिन्दु'

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

पी.चिदम्बरम् से सवाल

माननीय चिदम्बरम् जी,

आपको धन्यवाद कि चेन्नई मेँ आपने घोषणा की कि जब तक हमारे शरीर मेँ खून की आखिरी बूंद है ,हम आक्रामकता के साथ आतंकवाद और नक्सलवाद के खिलाफ लड़ेँगे और भरोसा दिलातेँ हैँ कि दो या तीन साल मेँ इन पर पूरी तरह काबू कर लेँगे.

चिदम्बरम् जी हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैँ कि आप सफल होँ.हूँ ! वास्तव मेँ अव्वल दर्जे का दुश्मन है नक्सलवाद! जैसा कि आप ने कहा है .

एक छोटा सा बालक था-रमुआ.उसे लोग चिड़ाते रहते थे.बेचारे की सुन्दर सुशील विधवा माँ , उसे भी काफी कमेन्टस सुनने को मिलते थे.पुलिस भी दवंगोँ व धनवानोँ के संग मजा लेती थी.नेता भी दवंगोँ व धनवानोँ के प्रभाव के सामने सोँचते कि एक वोट की खातिर अनेक वोटोँ को प्रभावित क्योँ करेँ?एक दिन रमुआ की माँ गाँव के कुछ लोगोँ के साथ खेत मेँ गन्ना काट रही थी.लोगोँ के कमेन्टस सुनते सुनते वह बौखला गयी.आखिर बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है.


"अरे,बहुत गर्मी है तू मेँ . बुझा ही देयेँ बैसे भी तेरे आदमी को मरे दस साल बीत गये.किसी से का ठुकवाये नाय का?"फिर कुछ लोग उसे ईख मेँ ले जा कर उसकी इज्जत के साथ खेलने लगे.कुछ औरते चीखी चिल्लायीँ लेकिन दबंगोँ के सामने उनकी क्या चलने वाली?

घायलावस्था मेँ वह रमुआ के साथ कस्वे जाने लगी लेकिन कस्बे से कुछ पहले ही उसने प्राण त्याग दिये.

समय गुजरा,रमुआ की दो बीघा जमीन पर दबंगोँ ने कब्जा कर लिया.जब भी उसने अन्याय व शोषण के खिलाफ अपना सिर उठाने की कोशिस की उसको दबा दिया गया.दबंग उसे पकड़ कर जवरदस्ती धमक मेँ शराब पिला देते.गाँव के कुछ मुसलमान जब उसकी मदद करना चाहेँ तो दबंग साम्प्रदायिकता को भड़काने का प्रयत्न करेँ.आखिर इन्सानोँ की वस्ती निकल रमुआ जंगल मेँ आ गया.रामुआ डाकु रमुआ हो कानून का दुश्मन होगया .उसकी मृत्यु के बाद दबंगोँ पुलिस नेता अपने घर दिवाली मनाएँ. मूल कारण वहीँ के वहीँ.नये रमुआ पैदा हो जाते फिर जब वे मार दिए जाते नये रमुआ पैदा हो जाते.मूल जड़ तक जाने की आवश्यकता नहीँ....?!
खैर...

आदिकाल से अब तक धरती कब आतंकवाद से मुक्त हुई है?या कब तक?

कोई विक्षिप्त हो खुदकुशी कर ले ,शोषित होता रहे वह ठीक है.उठ खड़ा हो वह कोई ,तो वह अपराधी घोषित कर दिया जाए ?इससे पहले कानून व न्याय क्योँ सोता रहता है?हम देख रहे हैँ कि कैसे गरीब मजदूर कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार की कुव्यवस्था मेँ अन्याय व शोषण का शिकार हो विक्षिप्त होकर अपराध की राह पर निकल पड़ता है.आदिबासियोँ के आगे भी कमोबेश इसी तरह की समस्याएँ हैँ.

ओशो ठीक ही कहते हैँ कि अन्य समस्याओँ की तरह आतंकवाद की समस्या की जड़ मनुष्य का मन है.चिदम्बरम् जी अपराधिक मनोविज्ञान व मूल जड़ को भी समझिए .हाँ,आतंकवाद व नक्सलवाद के वर्तमान रुप को आप नष्ट करने मेँ आप अवश्य सफल होँगे लेकिन...?!आखिर कब धरती आतंक से विहीन हुई है?आतंक नये नये रूप मेँ पैदा होता रहा है.कार्ल मार्क्स की कुछ बातेँ यथार्थ मेँ सत्य महसूस होती हैँ. हम देख रहे हैँ कि समाज मेँ अब भी शोषण करने वालोँ या शोषित होने वालोँ की संख्या कम नहीँ है.

चिदम्बरम् जी जयप्रकाश का मानना था कि दबंगवाद ,जातिवाद, एवं भीड़तन्त्र के रहते प्रजातन्त्र का शुद्ध रुप स्थापित नहीँ हो सकता.

अध्यापक दंश:औरन को उ��देश बहुतेरे

यदि 20प्रतिशत अध्यापक भी आचरण मेँ कानून- ज्ञान को उतार लेँ,पुलिस- वकील भी. खैर......!?प्रकृति असन्तुलन ,भ्रष्टाचार, कुप्रबन्धन के लिए हम सबकी शूद्रता दोषी है.सिर्फ अर्थ काम की लालसा रखने वाला शूद्र ही है.
पुरूषार्थ की आज अति आवश्यकता है.धर्म ,अर्थ ,काम, मोक्ष मेँ सन्तुलन ही पुरुषार्थ है. परिवार समाज देश व विश्व की बिगड़ती दिशा दशा के लिए हम सब की सोँच ही उत्तरदायी है.मात्र शिक्षा से काम नहीँ चलने वाला शिक्षा के चारो रूपोँ शिक्षा, स्वाध्याय(स्वाध्याय की सीख भगत सिँह से लेनी चाहिए कि जिस दिन उन्हे फाँसी लगने वाली होती है उस दिन भी वह स्वाध्याय करना नहीँ भूलते) , अध्यात्म, ,तत्वज्ञान पर ध्यान देना आवश्यक हैँ. वह सोँच जो सिर्फ अर्थ काम मेँ लिप्त है और सांसारिक चकाचौँध मेँ विचलित हो अपने ऋषियोँ नबियोँ के त्याग समर्पण व परिश्रम को भूल गयी है जो कि मानव को महामानव की यात्रा पर ले जाने के लिए थी.अभी हम सच्चे मायने मेँ मानव नहीँ बन पाये हैँ,महामानव बनना तो काफी दूर है. दुनिया के शास्त्रोँ को रट लेने से कुछ न होगा,अपने को भी जानना होगा.हमारे सनातन नबी ऋषि ने शिक्षा का प्रारम्भ अक्षर ज्ञान से नहीँ वरन योग नैतिक शारीरिक खेल कथा कहानियोँ से प्रारम्भ करवाया था लेकिन आज.....?व्यक्तित्व का निर्माण सिर्फ अंकतालिकाएँ नौकरी धन तक सीमित नहीँ होना चाहिए.विद्या ददाति विनयम् ,लेकिन विद्या किसे विनय देती है?

देश के आदर्श पुरुष डा. ए पी जे अब्दुल कलाम से एक बार एक बालक ने पूछा कि क्या भ्रष्टाचार रहते महाशक्ति बनने का सपना देखा जा सकता है?बालक से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर अपने माता पिता से पूछो.राष्ट्रपति जी के सामने बालक के माता पिता घबरा गये. दरअसल मनुष्य के जीवन मेँ बेसिक एजुकेशन व्यक्तित्व निर्माण का आधार ही नहीँ दिशा है.इसलिए डा.ए पी जे अब्दुल कलाम ने कहा माता पिता एवं बेसिक अध्यापक ही व्यक्तित्व निर्माण करता हैँ.

लेकिन......?!
यहाँ पर हमेँ धर्मराज युधिष्ठिर को भी स्मरण मेँ लाना होगा."सदा सत्य बोलो"पाठ याद करने के लिए युधिष्ठिर को काफी दिन लग गये.जिससे उनकी मजाक बनती है.अब तो युधिष्ठिरोँ की मजाक बालक ही नहीँ बड़े भी बनाते हैँ.वर्तमान मेँ हमेशा से ही जो याद कर ' डालते ' हैँ और भौतिक लाभ उठा लेते है वे वर्तमान मेँ सम्माननीय होते हैँ लेकिन जो याद कर 'लेते' हैँ वे मजाक के ही पात्र होते हैँ.जिस कालेज मेँ मैँ अध्यापन कार्य कर रहा हूँ वहाँ एक अध्यापक हैँ- विशाल मिश्रा .वह मन वचन कर्म से एक हैँ,ऐसा सभी का विश्वास है और ऐसा वास्तव मेँ है भी . मन वचन कर्म से एक होना क्या मूर्खता है?वह ड्रामाबाज नहीँ हैँ तो क्या मूर्ख हैँ . कुछ प्रतिष्ठित अध्यापकोँ तक को मुँहपीछे उनकी आलोचना एवं मजाक बनाते देखा गया है.जिन अध्यापकोँ का उद्देश्य विभिन्न माध्यमोँ से धन कमाना है न कि अध्यापन कार्य . जिस वर्ष विशाल मिश्रा कालेज मेँ आये थे उस वर्ष कालेज का माहौल सुधरता दिख रहा था . जिसके लिए प्रतिष्ठित या वरिष्ठ अध्यापक ही सहयोगात्मक नहीँ रहे वरन आलोचनात्मक रहे .मेरा विचार है कि ब्रेन रीडिँग नारको परीक्षण आदि का प्रयोग विभिन्न परिस्थितियोँ मेँ विभिन्न विभागोँ मेँ
अनिवार्य किया जाए.
मनुष्य तो अब न्यायवादी रहा नहीँ. कुप्रबन्धन भ्रष्टाचार की जड़ तो मनुष्योँ के मन मेँ है. ऐसे मेँ जिसका हेतु सिर्फ अर्थ- काम है, वे कुण्डी कैसे खोलेँ ?जो बोले वही कुण्डी खोले.हमेँ जो करना है वह करेँ यदि हम सत्य के पथ पर हैँ.धर्मगुरु रब्बी उल्फ का नाम सुन रखा होगा.किसी ने उसका चाँदी का पात्र चुरा लिया.उसकी पत्ऩी ने अपनी नौकरानी पर आरोप लगा कर मामला यहूदी धर्म न्यायालय मेँ पहुँचा दिया. रब्बी उल्फ नौकरानी के पक्ष मेँ न्यायालय चल दिया.गीता मेँ ठीक ही कहा है कि धर्म के पथ पर अपना कोई नहीँ होता है.हमेँ ताज्जुब होता है कि कोई हमसे कहता है कि मै धार्मिक हूँ या ईश्वर को मानता हूँ.उनका आचरण तो कुछ और ही कह रहा होता है.

लघु कथा : कलि- औरतेँ! (क��ई है मेरी कल्पनाओँ का खरीददार ! वादा करता हू��� कि जो मेरी कल्पनाओँ ��ो खरीदेगा मेरी जीवन भ��� की सारी कल्पनाएँ कुछ शर्तोँ के साथ इस्तेम��ल कर सकता है.जिसके पास ही कापी राइट होगा.

जंगल के बीच एक विशालकाय इमारत ! इमारत के बाहर अनेक जीव जन्तुओँ एवं महापुरूषोँ-कृष्ण विदुर ,महावीर जैन ,बुद्ध, चाणक्य, ईसामसीह ,सुकरात, कालिदास ,दाराशिकोह, कबीर, शेरशाहसूरी ,गुरूनानक ,राजा राममोहनराय, साबित्री फूले ,राम कृष्णपरमहंस ,महात्मा गाँधी, एपीजे अब्दुल कलाम, साँई बाबा, ओशो , अन्ना हजारे, आदि की प्रतिमाएँ पेँड़ पौधोँ के बीच स्थापित थीँ . इमारत के अन्दर बातावरण आध्यात्मिक था.वेद कुरान बाइबिल आदि से लिए गये अमर वचन जहाँ -तहाँ दीवारोँ पर लिखे थे.इसके साथ ही सभी पन्थोँ के प्रतीक चिह्न अंकित थे.मन्द मन्द 'ओ3म -आमीन' की ध्वनि गूँज रही थी.जहाँ अनेक औरतेँ नजर आ रही थीँ पुरुष कहीँ भी नजर नहीँ आ रहे थे. हाँ,इस इस इमारत के अन्दर एक अधेड़ पुरुष उपस्थित था जो श्वेत वस्त्र धारी था .इस इमारत का नाम था-'सद्भावना' .एक अण्डाकार यान आकाश मेँ चक्कर लगा रहा था. एक कमरेँ के अन्दर दीवारोँ पर फिट स्क्रीनस के सामन किशोरियाँ एवं युवतियाँ उपस्थित थे.अधेड़ पुरुष के सामने उपस्थित स्क्रीन पर अण्डाकार यान को देख कर उसने अपना हाथ घुमाया और वह स्क्रीन गायब होगयी.सामने रखी माचिस के बराबर एक यन्त्र लेकर फिर वह उठ बैठा.इधर अण्डाकार यान हवाई अड्डे पर उतर चुका था.
* * * * पृथ्वी से लाखोँ प्रकाश वर्ष दूर एक धरती-सनडेक्सरन . जहाँ मनुष्य रहता तो था लेकिन ग्यारह फुट लम्बे और तीन नेत्रधारी .एक बालिका 'आरदीस्वन्दी'जो तीननेत्र धारी थी , वह बोली -देखो ,माँ पहुँची पृथ्वी पर क्या?एक किशोर 'सम्केदल वम्मा' दीवार मेँ फिट स्क्रीन पर अतीत के एक वैज्ञानिक, जिन्हेँ लोग त्रिपाठी जी कहकर पुकारते थे, को सुन रहा था . जो कह रहे थे कि आज से लगभग एक सौ छप्पन वर्ष पूर्व इस ( पृथ्वी) पर एक वैज्ञानिक हुए थे एपीजे अब्दुल कलाम.उन्होने कहा था कि हमेँ इस लिए याद नहीँ किया जायेगा कि हम धर्म स्थलोँ जातियोँ के लिए संघर्ष करते रहे थे.आज सन 2164ईँ0 की दो अक्टूबर! विश्व अहिँसा दिवस . आज मैँ इस सेमीनार मेँ कहना चाहूगा कि कुछ भू सर्वेक्षक बता रहे हैँ कि सूरत , ग्वालियर,मुरादाबाद, हरिद्वार ,उत्तरकाशी, बद्रीनाथ ,मानसरोवर, चीन स्थित साचे ,हामी, लांचाव, बीजिँग, त्सियांगटाव ,उत्तरी- द्क्षणी कोरिया, आदि की भूमि के नीचे एक दरार बन कर ऊपर आ रही है,
जो हिन्दप्राय द्वीप को दो भागोँ मेँ बाँट देगी.यह दरार एक सागर का रुप धारण कर लेगी जिसमेँ यह शहर समा जाएँगे.इस भौगोलिक परिवर्तन से भारत और चीन क्षेत्र की भारी तबाही होगी जिससे एक हजार वर्ष बाद भी उबरना मुश्किल होगा.
सम्केदल वम्मा आरदीस्वन्दी से बोला -" त्रिपाठी जी कहते रहे लेकिन पूँजीवादी सत्तावादी व स्वार्थी तत्वोँ के सामने उनकी न चली.सन2165ई0 की फरवरी! इस चटक ने अरब की खाड़ी और उधर चीन के सागर से होकर प्रशान्त महासागर को मिला दिया.भारतीय उप महाद्वीप की चट्टान खिसक कर पूर्व की ओर बढ़ गयी थी.म्यामार,वियतनाम आदि बरबादी के गवाह बन चुके थे."
बालिका बोली कि देखो न,माँ पृथ्वी पर पहुँची कि नही
आज सन 5010ई0 की 19 जनवरी! उस अण्डाकार यान से एक तीन नेत्र धारी युवती के साथ एक बालिका बाहर आयी जो कि तीन नेत्रधारी ही थी.अधेड़ व्यक्ति कुछ युवतियोँ के साथ जिनके स्वागत मेँ खड़ा था.
* * * *
"सर ! आपके इस इमारत 'सद्भावना' मेँ तो मेँ प्रवेश नहीँ कर सकूँगी?"- सनडेक्सरन से आयी महिला बोली. तो अधेड़ व्यक्ति बोला कि अफस्केदीरन !तुम ऐसा क्योँ सोँचती हो?
अफस्केदीरन बोल पड़ी-"सोँचते होँगे आपकी धरती के लोग,आप जानते हैँ मैँ किस धरती से हूँ?"
जेटसूट से एक वृद्धा उड़ कर धरती पर आ पहुँची.
"नारायण!"
वृद्धा को देख कर अधेड़ व्यक्ति बोला- "मात श्री !"फिर नारायण उसके पैर छूने लगा.
" मैँ कह चुकी हूँ मेरे पैर न छुआ करो."
"तब भी......" नारयण ने वृद्धा के पैर छू लिए.
इमारत'सद्भावना' के समीप ही बने अतिथिकक्ष मेँ सभी प्रवेश कर गये. आखिर अफस्केदीरन ने ऐसा क्योँ कहा कि सद्भावना मेँ तो मैँ प्रवेश नहीँ कर सकूँगी?
दरअसल सद्भावना मेँ औरतोँ का प्रवेश वर्जित था.क्योँ आखिर क्योँ ?इस इमारत को महागुरु ने बनवाया था.जहाँ उन्होँने अपना सारा जीवन गुजार दिया.उन्होँने ही यह नियम बनाया कि इस इमारत मेँ कोई औरत प्रवेश नहीँ करेगी.यह क्या कहते हो आप ? एक को छोड़ कर सब औरतेँ हैँ.तब भी......
बात तब की है जब महागुरु युवावस्था मेँ थे.वह अपनी शादी के लिए लेट होते जा रहे थे. परम्परागत समाज मेँ लोग तरह तरह की बात करने लगे थे.तब वह मन ही मन चिड़चिड़े होने लगे थे कि कोई लड़की हमसे बात करना तक पसन्द नहीँ करती,हमेँ अपने जीवन मेँ पसन्द करना दूर की बात. सामने वाले पर अपनी इच्छाएँ थोपना क्या प्रेम होता है?सद्भावना मेँ उपस्थित स्त्रियाँ ह्यूमोनायड थे.

एपीसोड-1

शनिवार, 20 मार्च 2010

: बोर्ड परीक्षा: ऐसे मेँ कैसे हो नकल विहीन परीक्षा?






बोर्ड परीक्षाएँ प्रारम्भ हो गयी हैं. नकल विहीन परीक्षा करवाने सम्बन्धी प्रशासन की बयान प्रति वर्ष मीडिया के सामने आती है लेकिन क्या नकलविहीन परीक्षाएँ ईमानदारी से सम्भव हो सकी हैँ? मैँ अनेक वर्षोँ से कक्ष निरीक्षक बन कर किसी न किसी कालेज मेँ डयूटी करता आया हूँ.मुझे तो कभी नहीँ लगा कि परीक्षाएँ ईमानदारी से नकलविहीन हुई हैँ.कालेज के चपरासी से लेकर प्रधानाचार्य केन्द्र व्यवस्थापक तक अप्रत्यक्ष रुप से भागीदार होते हैँ.दबंग अध्यापक या अभिभावक के सामने तटस्थ हो कर.जब स्थानीय केन्द्र थे तो परीक्षार्थियोँ को इमला बोल कर लिखवाते तक देखा गया. अब जब स्थानीय केन्द्र नहीँ रहते तो भी नकल माफियाओँ की ही चलती है.उनके विद्यालय का जहाँ परीक्षा केन्द्र होता है वहाँ वे इधर उधर की जुगाड़ से अपने माफिक कक्ष निरीक्षक बना कर भेज देते हैँ और वहीँ के कुछ अध्यापकोँ से साँठगाँठ कर अपने कार्य को अन्जाम देते हैँ.जिसकी जानकारी कभी कभी प्रधानाचार्य एवँ केन्द्रव्यवस्थापक तक को नहीँ होती.ईमानदारी से सिर्फ डयूटी करने वाले कक्ष निरीक्षक ऐसे मेँ परेशान होते हैँ.


एक दृश्य --"कुछ वर्ष पहले मैँ एक विद्यालय के एक कक्ष मेँ डयूटी कर रहा होता हूँ कि एक अध्यापक बार बार आकर कुछ परीक्षार्थियोँ को आकर कुछ न कुछ बता कर चले जाते हैँ.मेरे विरोध का असर नहीँ पड़ता .हाँ , हमेँ धमकियाँ जरूर मिलती है.


दूसरा दृश्य--"मैँ एक कमरे मेँ डयूटी कर रहा होता हूँ कि केन्द्रव्यवस्थापक हमेँ बुलवाकर कहते हैँ कि आप का विष्य हिन्दी है जरा बच्चोँ की मदद कर देना. मैँ यह कह कर वापस कक्ष मेँ आगया कि मेरा विषय हिन्दी नहीँ है."

तीसरा दृश्य-- "बिन्दु जी की डयूटी कक्ष मेँ न लगवाओ(भविष्य मेँ आप पढ़ेँगे मेरा ब्लाग-'प्रतिष्ठित अध्यापकोँ के दंश'). "


चतुर्थ दृश्य:हमेँ एक दो बार यह देखने का अवसर मिला है कि कैसे एक कक्ष मेँ एक अच्छे विद्यार्थी के साथ अन्याय होता है?उससे हर हालत मेँ सहयोग लेने के लिए कक्ष निरीक्षक तक तैयार रह व्यवधान पैदा करने की कोशिस करते हैँ.



दृश्य पाँच:कालेज मेँ एक कमरा बन्द होता है.जिसमेँ बाहर से ताला लगा होता है.एक दो गाड़ियाँ कालेज मेँ आकर सब ओके कर चली जाती हैँ.लेकिन........?! उस बन्द कमरे मेँ?! उससे क्या मतलब?वह तो बन्द है?वह बन्द है तो क्या उसमेँ कुछ नहीँ हो सकता?उसमेँ एक अध्यापक प्रश्न पत्र हल कर रहे होते हैँ.कुछ देर बाद वह कमरा खुलता है......एक अध्यापक एक कमरे मेँ पहुँचते हैँ,एक परीक्षार्थी की कापी उठाते हैँ जिसके अन्दर के पन्ने निकाल कर अपने पास रख लेते हैँ,अपनी और से लिखी एक अन्य कापी उस परीक्षार्थी को दे देते हैँ.एक दूसरे अध्यापक हर कक्ष मेँ जा कर इमला बोलने लगते हैँ.




दृश्य छ: :कालेज मेँ कहीँ न कहीँ किसी न किसी के पास मोबाइल तो रहता ही है केन्द्रव्यवस्थापक प्रधानाचार्य आदि से बचते हुए मोबाइल प्रश्नोँ के उत्तर जानने मेँ सहायक हो जाता है.





दृश्य सात: एक कमरे मेँ मैँ डयूटी कर रहा होता हूँ . जहाँ एक अध्यापक एक परीक्षार्थी के पास खड़े पेपर हल करवा रहे थे जिसका मैने विरोध किया.कुछ मिनट बाद जब वह परीक्षार्थी की कापी पर लिखने लगे तो मैँने फिर विरोध किया.बाहर घूम रहे सर्च दस्ते के एक अध्यापक को मैने अन्दर बुला अपनी आपत्ति बतायी तो सम्बन्धित अध्यापक की डयूटी कैँसिल कर दी गयी लेकिन
विद्यालय के कुछ प्रतिष्ठित अध्यापक इस घटना के विरोध मेँ आगये थे.


दृश्य आठ:जो छिनरा वही डोली के संग.......कुछ प्रतिष्ठित अध्यापक जो किसी न किसी माध्यम से विद्यालय प्रशासन पर हावी रहते हैँ और मनमानी कर परीक्षार्थियोँ के साथ पक्षपात करते हैँ एवं ईमानदार या अपने प्रतिकूल अध्यापकोँ उनकी छोटी गलती पर भी प्रतिक्रिया करते फिरते हैँ.



http://slydoe163.blogspot.com

बुधवार, 17 मार्च 2010

घर- घर का महाभारत

किसी ने कहा है अन्धा वह ही नहीँ है जो नेत्र नहीँ रखता है अन्धा वह भी है जिसे अपने या उनके दोष दिखाई नहीँ देते जिनसे स्वार्थपूर्ण सम्बन्ध होता हैँ . एक ही बात लेकिन वही बात जब एक कहता है तो बौखला जाते हैँ वही बात जब दूसरा कहता है तो खामोश रह जाते हैँ यहाँ तक कि गलत बात तक पर भी. इन्सान विवेक रूपी दृष्टि कितने रखते हैँ ?भौतिक मूल्योँ मेँ जीते जीते मनुष्य भूल गया है कि वह मनुष्योँ के प्रति कैसी सोँच रखे ? जो व्यवहार वह अपने साथ चाहता है वैसा ही व्यवहार वह दूसरोँ के साथ नहीँ करता है . यह उसकी बेईमानी कमजोरी व असफलता है. परिवार के अन्दर कुशल नेतृत्व का अभाव आज देखने को मिल रहा है जो निष्पक्ष न्याय करने मे असफल होते हैँ या किसी पारिवारिक- सदस्य के हित मेँ कुशल मार्ग -दर्शक तक नजर नहीँ आते. ऐसे विकल्प नहीँ रखते जो साकारात्मक एवं शान्तिपूर्ण निष्कर्ष तक ले जाएँ .परिवार मेँ जिसकी चलती है उसकी खिन्नता, अशान्ति, मनमानी, उदारहीनता , आदि परिवार को शान्त व खुशमिजाज रखने मेँ असफल होती है.ऐसे मेँ महाभारत के बीज....?!लोग राम- भरत मिलाप को पढ़ते हैँ, श्रवण कुमर की कथा को पढ़ते हैँ. यहाँ तक की रंग- मंचन मेँ भी रूचि लेते हैँ.करबा चौथ ,रक्षा बन्धन, भैया -दूज ,आदि पर्व हैँ लेकिन....?लेकिन रोज मर्रे की जिन्दगी मेँ ....?वही टकराव, रोज का टकराव आदि.रिश्तोँ के बीच बढ़ती मानसिक दूरी व खिन्नता को प्रति -दिन सोँचने के ढ़ंग व उदारहीन व्यवहारोँ से ट्रेँड कर विस्तार देते रहते हैँ जिससे घर मेँ अशान्ति व खुशमिजाजहीन वातावरण बना रहता है.हमारे सनातन विद्वानोँ ने परिवार का उद्देश्य धर्म बताया है न कि काम व अर्थ .मोक्ष या शान्ति के लिए काम एवं अर्थ का प्रयोग धर्म की प्रयोगशाला मेँ बताया है.कुप्रबन्धन, श्रम विभाजन का असफल वितरण, त्याग व समर्पण का अभाव,उदार हीनता,परस्पर आवश्यकताओँ मेँ सामञ्स्य का अभाव,एक दूसरे की भावनाओँ के शेयर का अभाव,सभी के अभिव्यक्ति के सम्मान का अभाव,एक दो परिवारिक सदस्योँ की उपेक्षा,आदि परिवार के विखराव व अशान्ति का कारण हैँ.त्याग व समर्पण ...?त्याग व समर्पण के बिना परिवार व देश का उत्थान नहीँ होता.इसके लिए अपने परिवार व देश की कमियोँ को जग जाहिर न कर अन्दर ही अन्दर हल करना आवश्यक होता है.जिन समस्याओँ का हल मुश्किल हो जाए तो आध्यात्मिक, आयुर्वेदिक ,योग, प्राणी सेवा ,आदि पर जीवन लगा देना चाहिए.जिस प्रकार देश के अन्दर की समस्याएँ देश के बाहर निकल कर अन्तर्राष्ट्रीय हो जाती हैँ उसी प्रकार घर की समस्याएं सड़क पर आ जाने के बाद समाज व रिश्तेदारोँ के बीच की समस्याएँ हो जाती हैँ.ऐसे मेँ तीसरे फायदा उठाते आये हैँ.इसलिए अन्दर की समस्याएँ अन्दर ही रख कर अन्दर ही अन्दर सुलझा लेना चाहिए अन्यथा बाहर फीँका पन आता है.अन्दर की असन्तुष्टि बाहरी तत्वोँ के सहयोग से परिवार या देश मेँ अन्तर्सँघर्ष को बढ़ोत्तरी मिलती है.ऐसे मेँ खुली वार्ता ,परस्पर-सहयोग, उदारता ,आदि से ही शान्ति व्यवस्था को बनाए रखा जा सकता है.धृतराष्ट्र तो अन्धे होते ही हैँ गाँधारी भी जब आँखोँ पर पट्टी बाँध ले अर्थात विवेक रूपी दृष्टि से काम न ले तो महाभारत की आवश्यकता आ ही पड़ती है.महाभारत अर्थात प्रकाश मेँ रत बड़ा.

अपने पक्ष को मजबूती से न रख पाने की असफलता के कारण भी मन मेँ खिन्नता उत्पन होती है और ऐसे मेँ भी परिवार की उदारहीनता , सभी को न ले कर चलने की सोँच परिवार आगे नहीँ बढ़ा सकती.कुछ को वैसाखा अर्थात सहयोग की आवश्यकता है लेकिन तथाकथित अपनोँ मेँ भी सहयोग से वंचित रह जाना पड़ता है.स्वयं की अशान्ति कभी कभी पूरे परिवार पर हावी कर दी जाती है . उन्हेँ बस बहाना चाहिए होता है.किसी न किसी बहाने घर मेँ अशान्ति का माहैल बनाय रखते हैँ.नुक्ताचीनी,व्यक्ति को पहचाने की अक्षमता,निरन्तर खिन्ऩता का व्यवहार ,जिन्दगी जीने ढंग से अपरिचित,आदि से क्या शान्ति का वातावरण बनाया जा सकता है?परिवार को महत्व देने का मतलब है त्याग व समर्पण के साथ सबको लेकर चलना.परिवार के अन्दर की अपनी असन्तुष्टि को परिवार के बाहर के लोगोँ से कहना अपने व अपने परिवार को कमजोर करना है.यदि हम चाहेँ कि हमारे चाहे अनुसार सब बदल जाएँ यह मूर्खता है.कहीँ भी एक दम चेँजिग नहीँआती.जब हम खुद की आदतोँ मेँ बदलाव नहीँ ला सकते तो दूसरोँ से कैसे उम्मीद नहीँ रख सकते?किसी परिवार मेँ कोई लड़की व्याह कर आती है तो अपने अनकूल वातारण न पा कर क्या कर सकती है? उसके हिसाब से एक दम बदलाव कैसे हो सकता है?ऐसे धीरज हीन ,नेतृत्वहीन, असन्तोषी,धैर्यहीन, विवेकहीन,आलोचना,बात बनाने की कला से अनभिज्ञता,आदि स्वयं को अशान्ति मेँ डालना है ही परिवार मेँ अपनी छवि को नष्ट करना .

शनिवार, 13 मार्च 2010

डिग्रियाँ तथा धन एकत्रित करना ही काफी क्या ?

सभी समस्याओँ के जड़ मेँ है-व्यवहार एवं ज्ञान मेँ सामाञ्जस्य का अभाव तथा मन पर शंका भ्रम अफवाह पूर्वाग्रह कूपमण्डूकता आदि का प्रभाव.हमारे एक सम्पर्की परिवार मेँ सभी अपने परिवार के ही एक सदस्य जो कि तेरह वर्षीय एक बालक . उसकी आदतोँ से सभी परेशान हैँ लेकिन......?!किताबेँ रट कर अच्छे अंक पाने की होड़ तथा भौतिक चमक दमक से हट कर है बच्चोँ मेँ अच्छी आदते डालने की परम्परा. परिवार एवं देश मेँ कुप्रबन्धन का एक कारण यह भी है कि भौतिक एवं मानवीय मूल्योँ मेँ असन्तुलन का होना . एक समय ऐसा होता है कि परिवार के किसी सदस्य के व्यवहारोँ को अपने प्रतिकूल (क्योँ न वे व्यवहार आदर्शवादी होँ) पा कर उसे उपेक्षित असम्मानित कमेन्टस असहयोग आदि कर निरुत्साहित रोगी आदि बना दिया जाता है वहीँ फिर आगे चल कर एक बच्चे मेँ पड़ती आदतोँ को नजर अन्दाज कर उसे रटन्तिविद्या तक सीमित कर उसके दशा दिशा को भी विचलित कर दिया जाता है.
उस परिवार मेँ वह बालक आज उस परिवार मेँ एक समस्या बन चुका है लेकिन इसके लिए दोषी कौन है?

जब हम यह सोँच रखे कि हम जो कर रहे है ठीक कर रहे हैँ चाहे क्योँ न उस कारण कोई हम से मानसिक दूरी बढ़ाती जा रही हो,मन मेँ अन्य विकार पैदा होते जायेँ . देखा गया है कि 13 - 14 वर्ष के बाद बालक को बिगड़ते देखते हैँ तो संगत या उसके किसी मित्र को दोष देते हैँ लेकिन मेरा अनुभव कहता है इसके लिए बालक का मन दोषी होता है. एक मनोवैज्ञानिक ने कहा है बालक जो बनना है वह 12साल तक बन चुका होता है बस उसका प्रदर्शन बाकी रह जाता है.

एक ओर इन्सान की बुराईयोँ को मारने की असफलता मेँ इन्सान को ही जिन्दा लाश बना देना दूसरी ओर विभिन्न भौतिक एन्द्रिक लालसाओँ या मोह के कारण किसी इन्सान की बुराईयोँ को नजर अन्दाज कर देना.....?! ऐसे मेँ कैसी भावी पीढ़ी की उम्मीद की जा सकती है?क्या अच्छे इन्सान की पहचान सिर्फ यही है कि इन्सान जैसे तैसे आगे चल धन कमाने लगे? धनवान होना अलग बात है अच्छा इन्सान होना अलग बात है. किसी के डिग्रियोँ या आमदनी को देख कर उसकी बुराईयोँ को नजरान्दाज कर देना या किसी की कम आमदनी या अशिक्षा को देख कर उसके भले होने के बाबजूद उसे उपेक्षित कर देना अपराध है.परिवार एवं देश की वास्तविक सम्पत्ति व्यक्ति का उत्साह चरित्र मधुरता न्याय भाईचारा ईमानदारी स्वाबलम्वन साहस परस्परसहयोग आदि है.भौतिक चकाचौँध मेँ जिसे भूल अमानवीय व्यवहार करने का परिणाम क्या हो सकता है? बच्चो के सामने गाली की भाषा मतभेद कटुकथन आदि की प्रस्तुति करने वाले अभिभावकोँ को तब अपने बच्चोँ के व्यवहार गलत लगने लगते हैँ जब बड़े होकर बच्चे वही व्यवहार करते हैँ जो वे बच्चो के सामने अन्य के सामने करते आये थे.हम देख रहे है कि अभिभावक ही कैसे भौतिक चकाचौँध मेँ शिष्टाचार को भूलते जा रहे हैँ और अपने बच्चोँ को अच्छे अंकोँ की चाहत की होड़ मेँ देख बच्चोँ की अशिष्टता तक को नजरान्दाज करते जा रहे हैँ . जब तक होश आता है कमान हाथ से निकल चुकी होती है.

अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'
शाहजहाँपुर (उ.प्र.)

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

भारतीय संस्कृति: अरण्य जीवन

भारतीय आदि संस्कृति प्रकृति सहचर्य के साथ आयुर्वेदिक एवं योग परम्परा को दिनचर्या का हिस्सा बनाने की प्रेरणा देती है.भारतीय पर्व एवं उत्सव अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति व आयुर्वेद से जुड़े हैँ.


कहा जाता है कि यदि माँ सीता रावण की अशोक वाटिका मेँ न रहतीँ तो लव कुश को नहीँ जन्मा होता.भारतीय संस्कृति अरण्य जीवन की प्रेरणा देती है.काम देव के पाँच वाण -अशोक ,नील कमल,आम्र मंजरी,लाल कमल,रजनी गंधा.जिसका आयुर्वँद मेँ बड़ा महत्व है.इसी प्रकार शिव लिँग पर बेलपत्री बेर गन्ने के छिले टुकड़े धतूरा आदि चढ़ाना का अपना महत्व है.

पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का प्रथम दिवस कहा गया है.इस दिन से संवत्सर का पूजन नवरात्र घटस्थापन ध्वजारोपण वर्षेश का फल पाठ आदि विधि विधान किए जाते हैँ.
कलश स्थापना एवं नए मिट्टी के बर्तन मेँ जौँ बोना नीम की कपोलोँ के साथ मिश्री खाने का विधान आयुर्वेदिक महत्व भी छिपाए है.
गाय के सीँगोँ अर्थात सम्मान पर पृथ्वी टिकी है इसका मतलब अब शोध स्पष्ट कर रहे है.सृष्टि के अन्त व प्रारम्भ पर गाय वास्तव मे कामधेनु है.

मैँ मुस्लिम भाईओँ आर्य समाजियोँ विज्ञानवादियोँ बुद्धिवादियोँ आदि से कहना चाहूँगा कि मतभेदोँ मेँ जीने की अपेक्षा अध्यात्म विज्ञान मेँ जीना आवश्यक है.अध्यात्मविज्ञान क्या है?अध्यात्म विज्ञान है- परम्पराओँ को विज्ञान की कसौटी पर कसना.अन्वेषण तथा सत्य मेँ जीना.


शेष फिर........

अपराध की जड़

एक सड़क, लोगोँ का आना जाना लगा था . एक अधेड़ अवस्था का व्यक्ति एक अधेड़ व्यक्ति पर टूट पड़ा और अनेक थप्पड़ व घूँसे चला दिए.जिसके विरोध मेँ पब्लिक आ गयी. पड़ोस मेँ दो सिपाई खड़े थे जो उसे थाने ले गये.दो दिन बाद उसको जमानत पर रिहा कर दिया गया .वह अब दुनिया की नजर मेँ अपराधी था. कोई भी उसकी सच्चाई परिचित नहीँ था.


उसने जिससे मार पीट की थी उसे बर्दाश्त करने की हद आ गयी थी. आखिर उसने उसका क्या बिगाड़ा था कि बार बार उस पर कमेन्टस ,लोगोँ से उसकी झूठी आलोचना, उसकी सफलता के पथ पर रोक लगाना ,आदि. आखिर हद की एक सीमा होती है.बर्दाश्त करने की हद होती हैँ. बर्दाश्त करते करते आदमी पागल सनकी हो जाए, आत्म हत्या कर बैठे तब ठीक है अन्यथा.........?या तो व्यक्ति अपराधी हो जाए या एकान्त मेँ जा कर भजन करने लगे?

सोमवार, 8 मार्च 2010

व्यक्तित्व निर्माण क��� भूमिका

व्यक्तित्व निर्माण से बढ़कर जीवन मेँ अन्य निर्माण क्या है? हम जीवन मेँ किन विकल्पोँ पर प्रथम ध्यान देँ,यह हमारे एवं परिवार के भविष्य निर्माण पर टिका है.सबसे बढ़ा धन है-स्वास्थ्य . कुछ लोग जमीन जायदाद धन लोलुपता आदि मेँ अन्धे होकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से अपने या परिजनोँ के स्वास्थ्य उत्साह उम्मीद आदि के साथ खिलवाड़ करते रहते हैँ . विशेषज्ञोँ या डाक्टरोँ की सलाह पर कार्य करते रहते हैँ . खुश मिजाज या विवेकपूर्ण गम्भीर बनने की कला से अन्जान होते हैँ . किसी ने कहा है कि जो वर्तमान मेँ असन्तुष्ट है , सोँच मेँ मत भेदोँ से भरा है,खिन्ऩता आदि बनाता जा रहा है-वह भविष्य के लिए कितना भी भौतिक आधार मजबूत कर ले लेकिन नम्रता धैर्य परोपकार आदि धारी मन के बिना वह जीवन मेँ शान्ति व सन्तुष्टि प्राप्त नहीँ कर सकता . यह अपनी आवश्यकताओँ व दूसरे की आवश्यकताओँ मेँ सामज्स्य करने मेँ असफल होते हैँ .

व्यक्तित्व निर्माण के लिए परिवार का खुश मिजाज एवं शान्तिपूर्ण वातावरण, व्यक्ति सम्मान, उदारता, स्वास्थ्य जागरूकता ,अध्यात्म, आदि की आवश्यकता होती है.
व्यक्ति की वास्तविक सम्पत्ति- उत्साह ,धैर्य, साहस ,आत्मबल, नम्रता ,आन्तरिक आनन्द ,शान्ति,आदि होती है न कि अन्य निर्जीव वस्तुएँ ;वे तो मात्र संसाधन हैँ.

रविवार, 7 मार्च 2010

जीवन:त्याग एवं संयम

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है.ऐसे मेँ उसका समूह मेँ जीना आवश्यक है.व्यक्तिगत जीवन मेँ जो समूह महत्वपूर्ण है, वे हैँ-परिजन,सम्बन्धीजन,कार्यक्षेत्र,लक्ष्य.जिसकी कार्यात्मक संरचना आदर्श होना आवश्यक है.जहाँ पर निर्जीव वस्तुओँ की अपेक्षा सजीव वस्तुओँ ,व्यक्ति सम्मान, स्वास्थय ,शान्ति ,नम्रता ,विवेक,आदि आवश्यक है.जो त्यग एवं संयम के बिना सम्भव नहीँ है.जो सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थ मेँ जीना जानते वे क्या जाने त्याग एवं संयम का मजा.समूह मेँ रहने के लिए अन्य के हित मेँ त्याग संयम आवश्यक हो जाता है.समूह हट एकान्त प्रिय व्यक्ति विकार युक्त होता है.

09.18PM; मैँ इस वक्त शहबाजनगर स्टेशन पर हूँ,ट्रेन से बीसलपुर जा रहा हूँ.आज सुबह सुबह पत्नी ने मोबाइल पर बताया कि परसोँ रात्रि पिता जी की काफी तबीयत खराब हो गयी, लखनऊ पीजी आई के एमरजेँन्सी मेँ एडमिट हैँ. नाक व लैट्रीन से खून निकलना बन्द नहीँ हो रहा है.प्रकृति (शरीर)मेँ वह घटित होना ही है जिसके कारण उपस्थित हो चुके हैँ .चाहेँ उन करणोँ हेतु मनुष्य दोषी न हो.यहाँ पर भी त्याग संयम आवश्यक है.चलो संयम तो समझ मेँ आता है लेकिन त्याग......कैसा त्याग?त्याग तामसी भोजन- आचार- बिहार -सोँच- आदि का.आज भी उदाहण हैँ-जीवन पर्यन्त शुद्ध सादा शाकाहारी भोजन, सत्संग, स्वाध्याय ,योगासन, प्रातभ्रमण ,प्राणायाम, पारिवारिक शान्तिपूर्ण धार्मिक वातावरण,आयुर्वेदिकता, आदि से हर हालत मेँ जुड़े रहे तथा त्याग संयम विवेक बनाये रखा,अब भी सब ठीक ठाक चल रहा है.कोई समस्या आयी भी तो उलझे नहीँ,निदान खोज लिया या छोटे छोटे नुस्खोँ को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना लिया,पथ्य अपथ्य पर ध्यान देना शुरु कर दिया या ईश्वर पर सब छोड़ कर आध्यात्मिक क्रिया विचारोँ को अपने ऊपर थोप लिया था.कभी कभी देखा गया है कि समाज सेवा योगासन पथ्य अपथ्य आदि से असाध्य रोग तक समाप्त होते देखे गये हैँ.यहाँ पर भी त्याग संयम काम करता है.मनुष्य अपने मेँ कुछ ऐसी आदतेँ डाल लेता है जिसके लिए वह तर्क भी खोज लेता है हालाकि वे आदतेँ आदर्श नहीँ होतीँ.ऐसी जीवन शैली एवं खान पान हम क्योँ रखेँ कि जिसके विरोध मेँ डाक्टर को सलाह देनी पड़े.

www.antaryahoo.blogspot.com

#9452874748

शनिवार, 6 मार्च 2010

बच्चोँ -युवकोँ को भड़काने का लाँच्छन

कौन माता पिता आखिर अपने बच्चोँ को सत्य अन्वेषण तथा धर्म के पथ पर देखना चाहता है? ऐसा जो करता भी है उसके खिलाफ उठ खड़े होते हैँ माता पिता अध्यापक एवं अन्य.सुकरात के साथ क्या हुआ?उसने 17 साल की अवस्था मेँ अपने स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी.उसका सत्य से साक्षात्कार हो चुका था.अब वह अन्य के सामने सत्य रखने लगा तो दबंगवाद और सत्तावाद उसके खिलाफ उठ खड़ा हुआ.उस पर बच्चोँ एवं युवकोँ को भड़काने का आरोप भी लगाया जाने लगा. मैँ भी बच्चोँ युवकोँ को भड़काने का काम करता हूँ-कहता हूँ कि जरूरी नहीँ की माता पिता का कहना मानो या भीड़ की चाल चलो,महापुरूषोँ का कहना मानो,कानून का कहना मानो .

कब धरती आतंकविहीन?

हिन्दुस्तान मेँ आप( राम चन्द्र गुहा जी) का लेख 'कैसे खत्म होगी माओवादी हिँसा?'प्रकाशित हुआ. आप कैसे लेखक हैँ?हम जैसा अदना प्रकाशित होने को व्याकुल लेखक आपको हर प्रश्न का उत्तर दे सकता हूँ.हमेँ अनेक लेख पढ़ कर हँसी आती है और मीडिया वालोँ की नियति पर भी.खैर..... मैँ आप से पूछना चाहता हूँ कि कब धरती आतंक से विहीन हुई है?हाँ,ऐसा तो हुआ है कि आतंक नये नये रूप धारण कर आता रहा है. 6 साल पहले की बात है मेरे बाये पैर मेँ दर्द प्रारम्भ हो गया .मैँ लँगड़ाकर चलने लगा.एक एलोपैथिक डाक्टर की शरण गया .जब तक दवायी का असर रहता दर्द नहीँ होता.एक की सलाह पर पैर की मालिश करने लगा .एक ने सलाह दी कि वैसाखी का सहारा लो मैँ वैसाखी का सहारा लेने लगा.जितने मिलते उतनी सलाह प्राप्त होती.लेकिन कोई लाभ प्राप्त नहीँ हो रहा था.रोग विशेषज्ञ के पास जाने की हिम्मत विभिन्न जाँच कराने अधिक रुपये खर्च करने, समय व्यय ,आदि की हिम्मत नहीँ हो रही थी.जब हिम्मत जुटायी तो.......?!विभिन्न जाँचोँ के बाद जाँघ के एक छोटे आपरेशन के बाद मैँ ठीक होगया. देश एवं विश्व की समस्योँ मूल जड़ तक पहुँचे बिना हम समस्याओँ से मुक्ति नहीँ पा सकते. आखिर कब धरती आतंक से विहीन हुई है?

गुरुवार, 4 मार्च 2010

एक से और खुलासा:अभिव्��क्ति अंश

**डा.नेत्रपाल से एक खुला विमर्श ** 5.00PM,04मार्च2010 ;दिन वृहस्पतिवार!मैँ एक पुस्तक 'महापुरूषोँ की अमरवाणी' लेकर डा.नेत्रपाल की दुकान के सामने से गुजरा तो उन्हेँ देख मैँ उनके समीप जाकर नमस्ते कर खड़ा हो गया."आओ बैठो "-कहते हुए वे अन्दर जा अपनी कुर्सी पर बैठ गये.मैँ जाकर बैँच पर बैठ ही पाया कि अपने स्कूल मेँ ही परीक्षा डयुटी करना,लफड़ोँ मेँ पड़ने की जरुरत नहीँ. तब फिर मैँ भी बोलने लगा था.प्रभु कृपा मैँ क्या क्या बोल गया कुछ पता नहीँ.जो बोला उसका कुछ आधार यह है कि--स्थूल मेँ जो दिखता है वह ही सिर्फ सत्य नहीँ होता.बहुत कुछ अदृश्य भी है जिसे देखने के लिए स्थूल आँखेँ ही काफी नहीँ हैँ.एक ही घटना को देख कर नौ व्यक्ति नौ बातेँ सोँचते हैँ. जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसा ही सोँचता है.और फिर व्यक्ति पहले से ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता है.ऐसे मेँ समाज की नजर मेँ क्या चरित्र..?महापुरुषोँ की नजर मेँ, प्रभु की नजर मेँ ,कानून व्यवस्था की नजर मेँ अपना चरित्र बनाओ. कबीरदास को एक बार कहना पड़ा था-मैँ जो दुनिया को देने आया हूँ,उसे मेरे पास कौन लेने आता है?दुनिया की चकाचौँध मेँ रहने वाला कब दुनिया से उबर पाया है?जब वे बोले कि ब्रह्मचर्य जीवन जीने वालोँ ने ही जीवन का भला किया है.हमने आपने यह गलती कर दी कि शादी कर ली. तब मैँ बोला-यह कोई गलती नहीँ है.सिर्फ सन्तान पैदा करने के लिए सम्भोग करने वाला भी ब्रह्मचर्य है. हाँ,यह सौभाग्य है कि पत्नी सहयोगी मिल जाए.यदि हमारा पथ धर्म का है लेकिन पत्ऩी काम मेँ आप को ढकेलने वाली तथा सांसारिकता मेँ लिप्त रखने वाली है तो ऐसे मेँ ऐसी पत्ऩी का साथ छोड़ देना चाहिए. अपने लक्ष्यात्मक समूह का ख्याल भी रखना आवश्यक है.लक्ष्य से दूर करने वाला अपना शत्रु होता है और धर्म के रास्ते पर न कोई अपना होता है न कोई पराया.

बुधवार, 3 मार्च 2010

बहुलवाद:खिशियानी बिल���ली खम्बा नोचे

बरेली;बरेली मेँ दंगे भड़क उठे.भड़काता कौन है?भड़कता कौन है?मनोवैज्ञानिकोँ से पूछो.भौतिक चमक- दमक, प्रदर्शनात्मक व्यवहार, आदि से क्या होता है? असलियत तो मन मानसिक- दूरियाँ, अलगावाद ,भेद ,आदि भरा हो तो........?! गलियोँ चौराहोँ पर धर्म नहीँ व्यक्ति की उदारता नहीँ साम्प्रदायिकता एवं उन्माद भड़कता है.एक दूसरी जाति एवं सम्प्रदाय को नीचा दिखाने तथा अपनी हिँसा का शिकार बनाने को इस्तेमाल करते हैँ.दोष हमारे मन का है,जिससे उदारता, नम्रता ,शालीनता, सद्भावना ,भाई- चारा, आदि विदा हो चुका है.मानसिक रूप से व्यक्ति अब भी विक्रत, असभ्य ,अराजक, आदि है. बहुलवाद मेँ जीने का मतलब यह नहीँ कि एक दूसरे के विरोध मेँ हम खड़े हो जायेँ. शुद्ध प्रजा तन्त्र के सामने अभी अनेक समस्याएँ हैँ जिससे निपटने के लिए अभी भारतीय व्यक्ति योग्य नहीँ है.(अपने आगामी लेख ' अमेरीकी फौजोँ भारत आओ' मेँ इसे और स्पष्ट करुँगा) शूद्रता एवं दुष्टता के दमन करते रहने के लिए साम दाम दण्ड भेद का इस्तेमाल आवश्यक है.संवैधानिक वातावरण के लिए तो वोट की राजनीति से हट कर कठोर निर्णय आवश्यक है. भाई भाई को एक जाति दूसरी जाति को एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को बर्दाश्त करने को तैयार नहीँ.हमेँ यह सीखना ही चाहिए कि घर से बाहर निकलने के बाद हम अपने रीति रिवाज सम्प्रदाय को घर पर ही छोड़ आयेँ और संवैधानिक तथा मानवीय व्यवहार करेँ. साम्प्रदायिक दंगे भड़काने वाले अफवाहोँ को बल देने वाले क्या कभी स्वस्थ इन्सान कहे जाने योग्य हैँ?हमेँ समझना चाहिए कि समाज के धर्म धर्म नहीँ हैँ,सम्प्रदाय है रीति रिवाज आदि हैँ. मनुष्य का धर्म तो एक ही होता है.जो त्याग -समर्पण, परहित ,नम्रता, आदि के बिना प्राप्त नहीँ किया जा सकता.साम्प्रदायिक दंगे ,उन्माद, आदि व्यक्ति के धर्म की पहचान नहीँ, अपराधी मन की पहचान है.

मंगलवार, 2 मार्च 2010

एहसास मौत का...?!

किसी ने कहा है कि जन्म और मृत्यु अस्तित्व के दो पैर हैँ.सृजन और विध्वंस प्रकृति का अंग है जिसे नकारा नहीँ जा सकता.संसार एवं उसकी हर वस्तु परिवर्तनशील है ऐसे मेँ कैसे उम्मीद रख सकते हैँ कि कोई वस्तु कैसे एक ही अवस्था मेँ रह सकती है?जीवन एक उत्सव है. जिसे हम जीवन समझते है वह तो चेतना के सागर मेँ एक बुलबुला है.ओशो ने अपने साधना की शुरूआत शवासन से की थी.उनके कुछ प्रवचन 'मैँ मृत्यु सिखाता हूँ' नामक एक पुस्तक मेँ संकलित हैँ,जिसे हर जिज्ञासु को पढ़ना चाहिए.जीवन के हर पक्ष के प्रति तटस्थ रहना आवश्यक है. दृष्टा और श्रोता का मतलव भी क्या होता है?दार्शनिक शब्द की उत्पत्ति 'दर्श' धातु से ही तो हुई है. अभी यह ब्लाग लिखते लिखते मैँ मैजिक गाड़ी से शाहजहाँपुर से मीरानपुर कटरा जा रहा हूँ. अभी गाड़ी ड्राईवर ढाबा के सामने से गुजरी है. गाड़ी जब शाहजहाँपुर थी ब्लाग लिखने लगा था. मन अनेक शँकाओँ से घिरा हुआ था .खैर अब सब ठीक है लेकिन....?पत्नी सुजाता से दोनोँ मोबाइल नम्बर पर बात न हो सकी? अंग्रेजी महीने के अनुसार आज मेरी शादी का एक वर्ष हो चुका.शादी का यह एक वर्ष और इससे पूर्व यह शादी तय होते तथा चर्चा के दौरान क्या मैँ अपने व्यक्तिगत जीवन मेँ पहले बराबर भी सुकून पाया है?ओह मैँ भी....?!किस विषय से मैने यह ब्लाग लिखना शुरु किया था और किस पर आगया? हाँ,मैँ कह रहा था कि दार्शनिक शब्द की उत्पत्ति 'दर्श' धातु से हुई है.यह अच्छी बात है कि मैँ बचपन से ही दुनिया से ऊबा हुआ पैदा हुआ .जिसने हमे आम आदमी से असाधारण बना दिया.बस अब इस असाधारणता को विशिष्टता मेँ बदलना आवश्यक है. जिसके लिए साधनारत हूँ.मुझे भी शवासन व कुछ अन्य मानसिक क्रियाओँ के समय को बढ़ाने की आवश्यकता है.अपनी आत्मा पर पकड़ मजबूत करना जरूरी है.दुनियाँ मेँ अपने कौ उलझाए रखना ठीक नहीँ आखिर इस दुनिया से जाना भी तो है. अब आप कहेँगे कि हम क्या अमर हैँ?लेकिन आपकी तैयारी क्या है?आप कहीँ मेहमानी पर जाते हैँ तो क्या वहाँ कि वस्तुओँ घटनाओँ व्यक्तियोँ आदि से जीवन भर के लिए मन को प्रभावित कर लेते हो?

नारको परीक्षण, ब्रेन ��ीडिँग:न्याय मेँ सहाय��

मैँ बचपन से ही महसूस करता आया हूँ कि समाज मेँ अफवाह भ्रम शंका आदि के आधार पर क़ैसे दबंग एवं अपने अनुकूल प्रदर्शन करने मेँ असफल व्यक्ति अन्याय व शोषण का शिकार होता रहा है?यह भी भ्रष्टाचार एवं कुप्रबन्धन का अंग है.ऐसे मेँ पीस पार्टी के प्रमुख की यह माँग क्रान्तिकारी है कि विभिन्न पदोँ पर नियुक्ति के लिए नारको परीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए. यह विचार हर वक्त हममेँ कौँधते रहते हैँ. इसका कारण यह है कि मैँ बचपन से परिवार तथा अन्य संस्थाऔँ मेँ ऐसा सहता आया हूँ जो हमेँ कष्ट पहुँचाता आया है.मैँ तो वैसे भी दुनिया मेँ ऊबा सा पैदा हुआ और ऊपर से.............?मधुर तथा ईमानदार वातावरण की तलाश मेँ मैँ और भटका ही. एक पल के किसी प्रेम कौ सजो कर रखने की कोशिस ने हमेँ सुकून दिया है.लेकिन किसी ने कहा है कि प्रभु के सिबा कोई प्रेम के लायक नहीँ है.शेष फिर.....

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

25नवम्बर2002:अरमान सिंह यादव

25नवम्बर2002:शिशु मन्दिर मेँ आखिरी कार्य दिवस था सम्भवत: ! मेरे प्रधानाचार्य थे अरमान सिँह यादव .शिशु मन्दिर योजना मेँ कार्य करते मुझे साढ़े चार वर्ष पूर्ण हो चुके थे.आरमान सिँह यादव के कार्य काल मेँ कार्य करते ढाई साल पूरे हो चुके थे .जिनसे हतासा निराशा ही पल्ले पड़ी थी.अभी तक मैने इतना शातिर दिमाग का व्यक्ति नहीँ देखा था.मैँ वैसे भी दुनियाँ मेँ रहते हुए दुनियाँ मेँ नहीँ रहा हूँ.दुनियाँ मेँ कौन मुझे समझ पाया है? आदमी की स्थूल निगाहेँ स्थूल ही देख पाती हैँ.जिसकी एक हद है.जिसके पार भी बहुत कुछ है जिसे मन एवं आत्मा ही महसूस कर सकती है.मेरे प्रदर्शन सेँ मुझे कौन समझ सके हैँ? अरमान सिँह यादव ने हमेँ पहचान अपने जीवन मेँ एक बड़ी भूल कर दी जिसका मैँने साँसारिक नुकसान उठाया ही .क्या अरमान सिँह पर प्रभाव नहीँ पड़ने वाला?मानव जीवन मेँ 7 संख्या का बड़ा महत्व है जो कि 'कुण्डलिनी जागरण:सात शरीर ' सम्बन्धित प्रवचनोँ से स्पष्ट होता है.खैर जो होता है ठीक होता है जो नहीँ होता वह भी ठीक होता है.चलना ही जीवन है,मुझे शिशु मन्दिर छोड़ना पड़ा.मैँने अरमान सिँह यादव का क्या बिगाड़ा था.उन्होँने ही मुझे नुकसान पँहुचाने का प्रयत्न किया.आज समाचार पत्रोँ के माध्यम से जाना कि नाना जी देशमुख नहीँ रहे . वर्ष 1950मेँ उन्होँने गोरखपुर मेँ देश का पहला सरस्वती शिशु मन्दिर खोला.उनके पोते यशवंत देशमुख के अनुसार-"आप हैरान हो सकते हैँ कि खालिस संघी विचार धारा को कोई व्यक्ति आखिर कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नवासे नुस्ली वाडिया का अभिभावक कैसे हो सकता है...उनका व्यक्तित्व हर किसी को अपनी ओर खीँचता था." शेष फिर......

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

लघु कथा: नक्सली छाँव.......

1857 क्राति की 150वीँ वर्षगाँठ पूरे देश मेँ मनायी जा रही थी.इस अवसर पर कुछ भारतीय युवक युवतियोँ नेँ भारतीय संविधान की शपथ ले कर एक दल 'सैक्यूलर फोर्स'की स्थापना कर रखी थी.जिस पर नक्सली दबाव डाल रहे थे कि हमसे मिल जाओ लेकिन निर्दोष लोगोँ की हत्या करने वाले नक्सलियोँ से देशभक्त कैसे मिल सकते थे?सैक्यूलर फोर्स का एक युवा सदस्य आलोक वम्मा को किसी काम से शहर राँची जाना हुआ जहाँ उसक़ी एक युवा शिष्या शिवानी ने उसे राजो मण्डल से मिलवाया.आलोक वम्मा ने उससे पूछा-"आखिर ऐसी क्या मजबूरियाँ थीँ कि तुम्हेँ नक्सलियोँ की शरण मेँ जाना पड़ा?"राजो मण्डल बोली-"मैने किशोरावस्था मेँ कदम ही रखे थे.मेरी भाभी ने पूरे परिवार पर दहेज एक्ट लगा रखा था.सब जेल मेँ थे .बस मैँ ही घर मेँ अकेली बची थी.गाँव मेँ मेरा एक मुँहबोला भाई था. मैँ उसी के साथ कचहरी अदालत आदि के चक्कर लगा रही थी और खेती के कार्य देख रही थी.एक दिन मुझे अकेले ही अदालत जाना था. जाने के लिए कोई सवारी नहीँ मिल रही थी.जल्दी के चक्कर मेँ मेँ एक ट्रक पर बैठ गयी . हमेँ क्या पता था कि यह ट्रक ड्राईवर कामान्ध होते हैँ. " फिर राजो की आँखोँ मेँ आँसू आ गये.वह फिर सिसकते हुए बोली-"पहले ट्रक मेँ ही फिर आगे जा एक ढाबा पर अनेक ट्रक ड्राईबरोँ ने मेरे साथ कुकर्म किया.मैँ बेहोश हो चुकी थी जब मुझे होश आया तो फिर मैने एक कमरे मेँ युवकोँ एवं किशोरोँ से अपने को घिरा पाया जो दारू पी रहे थे.जिन्होंने फिर हमारे शरीर के साथ खूब मनमानी की .जब छक गये तो मुझे बाहर निकाल एक चौराहे पर छोड़ आये.सुबह जब कुछ टहलने वालोँ ने देखा तो मुझे पुलिस के अधीन कर दिया गया . थाने मेँ मुझे दो दिन रखा गया फिर पुलिस वाले एवं शायद कुछ नेता बारी बारी से मेरे ऊपर उतरते गये.इत्तफाक से उस थाने पर नक्सलियोँ ने धावा बोल दिया.थाने मेँ कुछ नक्सली बन्द थे.नक्सली मुझे भी साथ लेकर जंगल मेँ अपने ठिकाने पर आ गये. मेरे स्वस्थ हो जाने पर मुझे अन्य किशोरियोँ युवतियोँ के साथ ट्रेनिँग दी जाने लगी. मैने दोषियोँ को खोज खोज कर विकलांग बना दिया एवं अपने परिवार को न्याय दिलवा दिया लेकिन सात आठ सालोँ के दैरान नक्सलियोँ के द्वारा निर्दोष लोगो की हत्याऔ पर विचलित एवँ परेशान होती रही.अभी एक महीना पहले मेरी शिवानी से मुकालात हुई. पहली मुलाकात तब हुई थी जब इसे नक्सलियो के बीच लाया गया था लेकिन आप इसे तथा इसके भाई अरमान को राँची मेँ ला आये थे और इनके पढाई की व्यवस्था की थी.जब दुवारा मेरी शिवानी से मुलाकात हुई तो मैने अपनी भड़ास निकाल डाली. तब शिवानी बोली-सब ठीक हो जाएगा , सर जी को आने दो.मैँ तो गुजरात के गोसार की रहने वाली थी . गोधरा काण्ड के बाद मेरे साथ क्या क्या नहीँ हुआ तुम्से कुछ छिपा नहीँ है.हाँलाकि कुप्रबन्धन भ्रष्टाचार अन्याय आदि के कारण नक्सलवाद को बड़ावा मिल रहा है लेकिन उनके द्वारा निर्दोषोँ के कत्ल एवं परेशान करना मुझे दिल गवाही नहीँ देता."आलोक वम्मा बोला-हम पर तो वे काफी दबाव डाल रहे है हमे अपने साथ लेने के लिए लेकिन वहाँ की छाँव छाँव है नहीँ.

दीन- ए- इलाही:आवश्यकता एक सैकयूलर फोर्स की

देश के समक्ष सभी समस्याओँ की जड़ है -हमारा मन, जो कि अध्यात्मिक शिक्षा एवं विधि साक्षारता के बिना नहीँ संवारा जा सकता है . देश के सामने सबसे बड़ी बिडम्वना यह है कि आदर्शात्मक व्यवहार के लिए साहस का अभाव एवं संविधान के अनरूप चलने वालोँ को पुलिस तथा वकीलोँ की ही मदद न मिल पाना . भ्रष्टाचार ,बहुलवाद, क्षेत्रवाद ,साम्प्रदायिकता, दबंगवाद ,आदि मेँ दब कर व्यवहार मेँ संवैधानिक उद्देश्य समाप्त होने लगते हैँ . ऐसे मेँ संवैधानिक वातावरण बनने के बजाय मनमानी, पक्षपात ,दबंगवाद का शिकार हो अन्दर ही अन्दर मानसिक अशान्ति , असन्तुष्टि एवं अलगाव के बीज उत्पन्ऩ कर देता है.ऐसे मेँ विचलन , पलायन तथा मानसिक दूरियाँ पैदा होकर ऐसे लोगोँ का साथ पा जाती हैँ जो व्यक्ति को या तो अपराध या अध्यात्म की और मोड़ देती हैँ .अध्यात्म की ओर तो विरलोँ का ही झुकाव होता है, हाँ !ऐसा तो हो सकता है कि व्यक्ति तन्हा एवं एकाकी मानसिकता से ग्रस्त हो कर पागल विछिप्त हो जाए या आत्म हत्या कर बैठे . कुप्रबन्धन एवं भ्रष्टाचार के लिए अध्यापक पुलिस वकील नेता एवं आध्यात्मिक नेता दोषी हैँ. जब यह ही संविधान एवं अध्यात्म के प्रति जागरुक नहीँ हैँ तो अन्य से कैसे उम्मीद की जाए? ऐसे मेँ यदि लोग विचलित हो कर अपराध अलगाववाद आतँकवाद नकसलवाद आदि के शिकार हो जाएँ तो ऐसे मेँ अपराध, अलगाववाद, आतँकवाद, नकसलवाद और भी क्या कोई दोषी नहीँ कि अपराधी ,अलगाववादी, आदि ही सिर्फ दोषी है.विभिन्न समस्याओँ के निदानोँ का अध्ययन क्या सिर्फ पढ़कर अंकतालिकाएँ इकट्ठा करने या सेमीनार तक ही रखने एवं उनकी व्यवहार मेँ बात करने वाले को सनकी पागल कहने या उनको झूठ के सहारे फँसा देना है? यदि सभी समस्याओँ की जड़ हमारा मन है तो ऐसे मेँ आध्यात्मिक शारीरिक शिक्षा तथा वकील पुलिस व शिक्षक वर्ग के लिए आचरण मेँ विधि कठोरता आवश्यक है .एक नकसलवादी विचारक का कहना ठीक ही है कि जो कानून का पालन कराने वाले एवं संरक्षक हैँ वे अपने जीवन मेँ कानून का क्या 25 प्रतिशत भी पालन करते है? वकील पुलिस एवं शिक्षक वर्ग का संवैधानिककरण कर भावी सैकयूलर फोर्स का अंग बनाना आव श्यक है. देश मेँ एक ऐसे सैकयूलर फोर्स की आवश्यकता है जो राष्ट्र की विभिन्न समस्याओँ के निदानात्मक व्यवहार या संवैधानिक जीवन मेँ लगे हैँ उनकी हर हालत मेँ मदद करे.जिसके लिए कुर्बानी क्योँ न करनी पड़े. साथ मेँ राजनैतिक स्तर पर वोट की राजनीति से हट सद्भावना एवं भाई चारे की स्थापना के लिए शेर शाह सूरी एवं सम्राट अकबर से प्रेरणा लेनी आवश्यक है. अन्तर्जातीय विवाह प्रेम विवाह जातिवाद विरोधी व्यवहार आदि रखने वाले व्यक्तियोँ को हर हालत मेँ मदद पहुँचायी जाए तथा ऐसोँ को भी आरक्षण दिया जाए. वाह भाई वाह !संविधान विरोधी, जातिगत, क्षेत्रीयगत ,सम्प्रदाय गत, आदि लोगोँ को संरक्षण लेकिन संवैधानिक जीवन जीने वालोँ को दर दर की ठोकरेँ!? हाँ ,दूसरी और यह भी-देश मेँ सबसे सुरक्षित- आतँकवादी कसाब! जिन्दा आम आदमी की कीमत जानवरोँ से भी कम .

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

आम आदमी : अशान्ति एवं ��सन्तुष्टि

हिन्दुस्तान,23फरबरी 2010,अरुण कुमार त्रिपाठी का लेख -'नेहरु का सपना और आम आदमी' ठीक ही लिखता है - "........बहुलवाद, धर्मनिरपेक्षता और सभी के लिए न्याय ही हिँसा और तनाव रहित भारतीय लोकतन्त्र का आधार हो सकता है. समृद्धि और समावेशी विकास लोकतन्त्र को टिकाऊपन देता है और इसी से माओवाद और आतँकवाद जैसी अलोकतांत्रिक शक्तियोँ से लड़ने की ताकत मिलती है. " .....लेकिन देश की विभिन्न समस्याओँ को मनोविषय की दृष्टि से भी देखना आवश्यक है. स्थूल एवं भौतिक विश्लेषण ही आवश्यक है.अभी तक का हमारा यही अनुभव है कि सभी समस्याओँ की जड़ हमारा मन है.17-18वीँ सदी से आधुनिक विकास की जो दौड़ शुरू हुई है वह मानसिक भौतिक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है . और फिर हमारे विद्वान अन्तरिक्ष मेँ जीवन खोजने मेँ लगे हैँ हम अब भी राजपूतानी काल के रीतिरिवाजोँ ,अन्ध विश्वासोँ से चिपके है. सदियोँ से चले आ रहे प्रभावोँ को मन से विदा नहीँ कर पा रहे हैँ और आज के चका चौँध मेँ भी खोया हुए हैँ. ऐसे मेँ भटकाव तथा अवसरवाद की स्थिति पैदा होगयी है.अशान्ति एवं असन्तुष्टि की अति व्यक्ति को खिन्न बना कर बागी बना देती है या पागल विछिप्त या आत्महत्या की स्थिति तक पहुँचा देती है.ऐसे मेँ क्या उपाय है व्यक्ति की श्रेष्ठ दिशा व दशा बनाने के लिए?उपाय है आध्यात्मिक, शारीरिक नैतिक शिक्षा . प्रत्येक युवक युवती के लिए पाँच वर्ष की सैन्य सेवा अनिवार्य की जानी चाहिए .विभिन्न पदोँ एवं चुनाव मेँ प्रत्याशियोँ के लिए नारको परीक्षण तथा ब्रेन रीडिँग अनिवार्य किया जाना चाहिए.सिर्फ भैतिक स्थूल चमकधमक के विकास से सब कुछ सम्भव नहीँ है.अशान्ति एवं असन्तुष्टि तो मन की दशा है उसे मनोविषय के स्तर पर ही सुलझाना होगा.....JAI HO....OM..AAMEEN.

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

22फरबरी:कस्तूरबा पुण्�� दिवस

प्रकृति मेँ अकेला तत्व स्वयं मेँ क्या है? विभिन्न तत्वोँ मेँ सन्तु लन -असन्तुलन से ही प्राकृतिक घटनाएँ है . जो आकर्षण -प्रतिकर्षण के बिना असम्भव है. प्रकृति मेँ मानव सत्ता महत्व पूर्ण है, जिसके दो ध्रुव हैँ- नारी एवं पुरूष . नर- नारी एक दूसरे के लिए परस्पर श्रेष्ठ सहज एवं नैसर्गिक मित्र हैँ लेकिन हमारी कुण्ठित, लिँगभेदी और भोगवादी सोँच ने नर -नारी सम्बन्धोँ के बीच अनेक संदिग्ध सवाल तथा भ्रम पैदा कर दिए हैँ. किसी ने कहा है कि जिसे पति या पत्नी के रूप मेँ यदि सच्चा मित्र मिल जाता है तो उसका जीवन धन्य हो जाता है. श्रेष्ठ पतिव्रता महिलाओँ मेँ से एक नाम है- कस्तूरबा गाँधी का .11 अप्रैल 1869 को जन्मी कस्तूरबा का अपने पति कर्मचंद्र गाँधी को काफी सहयोग रहा .बाल विवाह के बावजूद इन्होँने शुरू से ही अपने दायित्वोँ को भली -भाँति निभाया. अपने आखिरी दिनोँ मेँ अपनी अस्वस्थता के बाबजूद साहस एवं सँयम से काम लिया. हालाँकि वे महात्मा गाँधी की मृत्यु से लगभग 4 वर्ष पहले दुनिया से गुजर गयीँ लेकिन उनका गाँधी -आन्दोलन मेँ महत्वपूर्ण योगदान रहा. हमेँ सीख लेना चाहिए कि स्थूलताओँ (शरीर एवं वस्तुओँ )के विकारोँ -रोगोँ से घबराना नहीँ चाहिए. स्थूलता वैसे भी परिवर्तन शील है और यही प्रदूषण का कारण है ,जो कि दो प्रकार का होता है -कृत्रिम एवं प्राकृतिक .यदि हम अपने मन को ऊपर से और विकृत कर लेँ तो विकार एवं समस्याएँ बढ़ती ही है. हमेँ अपना धैर्य एवं साहस कदापि नहीँ खोना चाहिए और हर हालत मेँ पुरुषार्थ के चारोँ स्तम्भ धर्म अर्थ काम मोक्ष मेँ सन्तुलन बनाये रखना चाहिए और फिर परहित ही धर्म है ........JAI HO....OM...AAMEEN.

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

08 मार्च : नारीसशक्तिकरण पर प्रश्न

नारी और पुरुष मानवसत्ता के दो पहिया हैँ जो सन्तुलित होना आवश्यक है . पश्चिम से उधार लिए गये भोगवादी भैतिकवाद मेँ नारीवाद एवं नारीसशक्तिकरण के दावोँ के बीच कुछ कानूनोँ के दुरुपयोग के माध्यम से आज की नारी का व्यवहार पारिवारिक कलह का कारण बन हुआ है यहाँ तक कि महानगरीय संस्कृति मेँ आत्मनिर्भर एवं स्वेच्छ नारी 'पुरुषवैश्याओँ' तक को जन्म दे रही है . 'मै' और 'तू' की भाषा, अहंकार ,आत्मनिर्भरता, अर्थ एवं काम की लालसा, आदि ने परस्पर एक दूसरे के लिए समस्याएँ खड़ी कर दी हैँ. इन पर्वोँ का जो उद्देश्य होता है उस प्रति हम संवेदन हीन हो चुके हैँ. जैसे, अब हिन्दी दिवस की ही बात लेँ बेचारी हिन्दी रोज मर्रे की जिन्दगी मेँ क्या सम्मान से दूर नहीँ होरही है. भारतीय मैकालोँ के बीच मेँ हिन्दी रोज सिसकती है परेशान होती है ........अंग्रेजी की ओर दौड़ लगाने वालोँ की संख्या मेँ प्रतिदिन वृद्धि हो रही है लेकिन.....? इसीतरह नारी दिवस ..भैतिकवादी भोगवाद मेँ पश्चिम उधार लिया गया नारीसशक्तिकरण भारतीय समाज एवं परिवारोँ का भला नहीँ कर सकता. नारीअधिकार एवं समानता के उपायोँ को वैदिक काल से ग्रहण करना होगा. जहाँ शादी एवं विवाह तक का उद्देश्य DHARM बताया गया है .PURUSHARTH के चार स्तम्भ मेँ से DHARM और MOKSH विदा हो चुका है. ARTH और KAM बाकी है, यही दुख का कारण है. अब नारी मेँ पन्नाधाय, जीजा बाई, अपाला, घोषा, गार्गी ,सावित्री, कस्तूरबा गाँधी, भगिनी निवेदिता, आदि जैसी कुशलता पाने की लालसा कितनी? पश्चिम का नारीसशक्तिकरण कुशल सशक्त चरित्र वान पीढ़ी को कैसे जन्म दे सकता है? भारतीय आदि संस्कृति मेँ 'गर्भाधान' शब्द के साथ 'संस्कार' शब्द जोड़ कर आखिर 'गर्भाधान संस्कार' की अवधारणा क्योँ प्रस्तुत की गयी? वहाँ तो SEX का प्रयोग सन्तान के लिए बताया गया है नारी शक्ति को मातृशक्ति मानकर सम्मानित किया गया है. लेकिन अब राजपूतकाल से नारी स्वयं अपनी शक्ति से अन्जान है और रमणी की भाँति बनी रहना चाहती हैँ खैर.......महिला दिवस के उपलक्ष्य पर हम अपाला, गार्गी ,घोषा, सावित्री, पन्ना धाय ,जीजाबाई, रजिया सुल्तान ,किरण वेदी, आदि को शत -शत- नमन .!.....JAI HO.....OM...AAMEEN.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

वेलेँटाइन वीक स्पेश��

हिन्दुस्तान मेँ वेलेँन्टाइन वीक स्पेशल पर आप का लेख सराहनीय था हालाँकि इस विषय पर मेरे विचार हैँ कि वास्तव मेँ जीवन ही उत्सव है आज की अन्ध भागदौड़ मेँ पर्व मात्र औपचारिकता रह गये है इन पर्वोँ से सिद्ध होता है कि जो आचार विचार भाव सात्विकता आदि पर्वोँ पर बनाने का प्रत्यन करते हैँ वह तो दैनिक दिनचर्या होनी चाहिए थी उसे हम भूल चुके हैँ.जो भूले नहीँ भी हैँ वे आज की भौतिक वादी दौड़ मेँ कहाँ पर हैँ? यहाँ बात प्रेम की है किसका प्रेम से साक्षात्कार है? जिसका प्रेम से साक्षात्कार हो जाता है उसका जीवन ही उत्सव हो जाता है.वह औरोँ को कष्ट नहीँ दे सकता.वह द्वेषभावना ईर्ष्या आदि नहीँ रखता.जहाँ ऐसा है भी वहाँ प्रेम नहीँ होता प्रेम मेँ तो अपनी इच्छाएँ नहीँ सामने वाली की इच्छाएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैँ. antaryahoo.blogspot.com

सुप्रबन्धन के वास्ते!

देश के समक्ष प्रमुख समस्याएँ हैँ-भ्रष्टाचार एवं कुप्रबन्धन .नियुक्ति प्रक्रियाओँ मेँ भारी ब दलाव के साथ विभिन्न नियुक्तियोँ के लिए नारको परीक्षण एवं ब्रेन रीडिँग अनिवार्य होना चाहिए.दूसरी ओर महिला आरक्षण एवं आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता है.आरक्षण व्यवस्था समानता की व्यवस्था नहीँ असमानता की व्यवस्था है.हाँ ऐसा तो होना चाहिए किआरक्षण के दायरे मेँ आने वाले अभ्यार्थियोँ को पहले वरीयता दी जाए यदि वे सभी मानक पूरे करते होँ.मातापिता बनने के अधिकार पर भी काऩून बनना चाहिए.आज 70 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है तो क्या इसके लिए अभिभावक दोषी नहीँ है?हमे विचार करना चाहिए कि हमारे वैदिक विद्वानोँ को 'गर्भाधान' शब्द के साथ 'संस्कार' शब्द जोड़ 'गर्भाधानसंस्कार' के अवधारणा की क्या जरूरत थी?उन्होँने तो विवाह एवं परिवार का उद्देश्य तक धर्म माना है.इस सब पर विचार कर भावी आश्रम पद्धति अधिनियम पर सोँचना चाहिए. जहाँ पर्यावरण,नैतिकता का वातावरण हो.जो नारको परीक्षण ब्रेन रीडिंग एवं भावी 'माता पिता बनने के अधिनियम' पर खरा न उतरे उन्हेँ जहाँ रखा जाए और कुटीर तथा शिल्प कला के माध्यम से व्यवसायी बनाया जाए.प्रत्येक युवक के लिए स्नातक के बाद 5 वर्ष के लिए सैन्य प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए. ASHOK KUMAR VERMA 'BINDU' akvashokbindu@yahoo.in antaryahoo.blogspot.com #9452874748

सुपोषण बनाम कुप्रबन्धन

सभी समस्याऔँ की जड़ है हमारा मन.कुपोषण के लिए भी हम सब का मन दोषी है.किसी ने ठीक ही कहा है कि सभी को माता पिता बनने का अधिकार नहीँ होना चाहिए.अब हम धर्म अर्थ काम मोक्ष मेँ सन्तुलन की कला से अन्जान हो गये हैँ. हम भूल गये है कि हमारे सनातन विद्वानोँ नबियोँ ने गर्भाधान शब्द के साथ संस्कार शब्द जोड़ कर गर्भाधानसंस्कार शब्द की अवधारणा क्योँ प्रस्तुत की थी?वर्तमान मेँ अपने जीवन को हम सब सार्वभौमिक मानकोँ या कानून के आधार पर बेहतर बना नहीँ पाते किसी को पति या पत्नी बनाने या बच्चे पैदा करने के कर्म से जुड़ जाते हैँ.आज 70प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है इसके लिए माता पिता के अलावा को दोषी है?हमारे आदि विद्वानोँ ने तो विवाह एवं सन्तानोत्पत्ति का उद्देश्य तक धर्म बताया है वहीँ आज हम सब काम मेँ जीते है.हमारे मन धर्म मेँ नहीँ काम मेँ जीता है. "अशोक कुमार वर्मा बिन्दु" akvashokbindu @yahoo.in antaryahoo.blogspot.com #9452874748

I WANT TO ADDRESS Mr.BARAK OBAMA

Hope that your presence as an American president will solve allthe problems such as terrorism and violence,prevailing in india,tibbet, immediate actions in support of good health, human riggts,women rights and happy life on earth by rising beyond castism,racialism, sex and regionalism. in this contect,we happen to remember the statement of an young buddhist saint named AAGYEN TRINLEY DORJEY 'KARMAPA LAMA',that by joining a great nation like America, he would succeed in bringing peace in the world. we should always be ready with heart and soul for good life, health and world-peace. for which, we should forget our differences and narrow-mindedness and regionalism. india and whole world has great expectations from you. the terrorists believing in seperation neither remained silent, nor will ever be . so,we are expected to have control upon them in all ways. The remaining part in the next letter. ASHOK KUMAR VERMA 'BINDU' www.antaryahoo.blogspot.com #9452874748

: शेर के मुँह खान

महाराष्ट्र की राजनीति मेँ जो हो रहा है वह राष्ट्रीयता के परिपेक्ष्य मेँ ठीक नहीँ हो रहा. प्रजातन्त्र मेँ आखिर दबंगवाद एवं क्षेत्रवाद के खिलाफ बिगुल कब बजेगा?मुम्बई मेँ मराठा बनाम हिन्दी की जो क्षेत्रवादी राजनीतिक खेल चल रहा है आखिर कब बन्द होगा ?इससे इतना जरूर है कि राष्ट्रीयता पर भी दृष्टि गयी है.हालाँकि आम आदमी मेँ भी क्षेत्रीयता की बू आ रही है .यहाँ तो हर मन विभक्त है. अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु' akvashokbindu@yahoo.in antaryahoo.blogspot.com #9452874748

REGISTER: दहेज:दोषी कौन?

दहेज के 90प्रतिशत केस फर्जी होते हैँ मेरा अन्वेषण इसके लिए वधु या वधुपक्ष को भी मानता है शादी तय होने वक्त या दाम्पत्य जीवन मेँ मानवीय मूल्योँ को महत्व न दे निर्जीव वस्तुओँ को महत्व देना रिश्तोँ के बीच कब तक सहजता बनाये रख सकता है?दहेज के 90प्रतिशत केस मेँ वधु या वधु पक्ष ही दोषी है .यह पर्दे के पीछे का सच है. दर असल समाज अपनी आत्मा खो चुका है हमारे आदि विद्वानोँ ने तो शादी एवं परिवार का उद्देश्य धर्म माना था न कि काम.बुद्ध ने कहे दुख का कारण तृष्णा 'काम 'है. अशोक कुमार आ .ब .वि. इण्टर कालेज. कटरा शाहजहाँपुर. akvashokbindu@gmail.com antaryahoo.blogspot.com