रविवार, 21 फ़रवरी 2010

08 मार्च : नारीसशक्तिकरण पर प्रश्न

नारी और पुरुष मानवसत्ता के दो पहिया हैँ जो सन्तुलित होना आवश्यक है . पश्चिम से उधार लिए गये भोगवादी भैतिकवाद मेँ नारीवाद एवं नारीसशक्तिकरण के दावोँ के बीच कुछ कानूनोँ के दुरुपयोग के माध्यम से आज की नारी का व्यवहार पारिवारिक कलह का कारण बन हुआ है यहाँ तक कि महानगरीय संस्कृति मेँ आत्मनिर्भर एवं स्वेच्छ नारी 'पुरुषवैश्याओँ' तक को जन्म दे रही है . 'मै' और 'तू' की भाषा, अहंकार ,आत्मनिर्भरता, अर्थ एवं काम की लालसा, आदि ने परस्पर एक दूसरे के लिए समस्याएँ खड़ी कर दी हैँ. इन पर्वोँ का जो उद्देश्य होता है उस प्रति हम संवेदन हीन हो चुके हैँ. जैसे, अब हिन्दी दिवस की ही बात लेँ बेचारी हिन्दी रोज मर्रे की जिन्दगी मेँ क्या सम्मान से दूर नहीँ होरही है. भारतीय मैकालोँ के बीच मेँ हिन्दी रोज सिसकती है परेशान होती है ........अंग्रेजी की ओर दौड़ लगाने वालोँ की संख्या मेँ प्रतिदिन वृद्धि हो रही है लेकिन.....? इसीतरह नारी दिवस ..भैतिकवादी भोगवाद मेँ पश्चिम उधार लिया गया नारीसशक्तिकरण भारतीय समाज एवं परिवारोँ का भला नहीँ कर सकता. नारीअधिकार एवं समानता के उपायोँ को वैदिक काल से ग्रहण करना होगा. जहाँ शादी एवं विवाह तक का उद्देश्य DHARM बताया गया है .PURUSHARTH के चार स्तम्भ मेँ से DHARM और MOKSH विदा हो चुका है. ARTH और KAM बाकी है, यही दुख का कारण है. अब नारी मेँ पन्नाधाय, जीजा बाई, अपाला, घोषा, गार्गी ,सावित्री, कस्तूरबा गाँधी, भगिनी निवेदिता, आदि जैसी कुशलता पाने की लालसा कितनी? पश्चिम का नारीसशक्तिकरण कुशल सशक्त चरित्र वान पीढ़ी को कैसे जन्म दे सकता है? भारतीय आदि संस्कृति मेँ 'गर्भाधान' शब्द के साथ 'संस्कार' शब्द जोड़ कर आखिर 'गर्भाधान संस्कार' की अवधारणा क्योँ प्रस्तुत की गयी? वहाँ तो SEX का प्रयोग सन्तान के लिए बताया गया है नारी शक्ति को मातृशक्ति मानकर सम्मानित किया गया है. लेकिन अब राजपूतकाल से नारी स्वयं अपनी शक्ति से अन्जान है और रमणी की भाँति बनी रहना चाहती हैँ खैर.......महिला दिवस के उपलक्ष्य पर हम अपाला, गार्गी ,घोषा, सावित्री, पन्ना धाय ,जीजाबाई, रजिया सुल्तान ,किरण वेदी, आदि को शत -शत- नमन .!.....JAI HO.....OM...AAMEEN.

कोई टिप्पणी नहीं: