रविवार, 28 फ़रवरी 2010

25नवम्बर2002:अरमान सिंह यादव

25नवम्बर2002:शिशु मन्दिर मेँ आखिरी कार्य दिवस था सम्भवत: ! मेरे प्रधानाचार्य थे अरमान सिँह यादव .शिशु मन्दिर योजना मेँ कार्य करते मुझे साढ़े चार वर्ष पूर्ण हो चुके थे.आरमान सिँह यादव के कार्य काल मेँ कार्य करते ढाई साल पूरे हो चुके थे .जिनसे हतासा निराशा ही पल्ले पड़ी थी.अभी तक मैने इतना शातिर दिमाग का व्यक्ति नहीँ देखा था.मैँ वैसे भी दुनियाँ मेँ रहते हुए दुनियाँ मेँ नहीँ रहा हूँ.दुनियाँ मेँ कौन मुझे समझ पाया है? आदमी की स्थूल निगाहेँ स्थूल ही देख पाती हैँ.जिसकी एक हद है.जिसके पार भी बहुत कुछ है जिसे मन एवं आत्मा ही महसूस कर सकती है.मेरे प्रदर्शन सेँ मुझे कौन समझ सके हैँ? अरमान सिँह यादव ने हमेँ पहचान अपने जीवन मेँ एक बड़ी भूल कर दी जिसका मैँने साँसारिक नुकसान उठाया ही .क्या अरमान सिँह पर प्रभाव नहीँ पड़ने वाला?मानव जीवन मेँ 7 संख्या का बड़ा महत्व है जो कि 'कुण्डलिनी जागरण:सात शरीर ' सम्बन्धित प्रवचनोँ से स्पष्ट होता है.खैर जो होता है ठीक होता है जो नहीँ होता वह भी ठीक होता है.चलना ही जीवन है,मुझे शिशु मन्दिर छोड़ना पड़ा.मैँने अरमान सिँह यादव का क्या बिगाड़ा था.उन्होँने ही मुझे नुकसान पँहुचाने का प्रयत्न किया.आज समाचार पत्रोँ के माध्यम से जाना कि नाना जी देशमुख नहीँ रहे . वर्ष 1950मेँ उन्होँने गोरखपुर मेँ देश का पहला सरस्वती शिशु मन्दिर खोला.उनके पोते यशवंत देशमुख के अनुसार-"आप हैरान हो सकते हैँ कि खालिस संघी विचार धारा को कोई व्यक्ति आखिर कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना के नवासे नुस्ली वाडिया का अभिभावक कैसे हो सकता है...उनका व्यक्तित्व हर किसी को अपनी ओर खीँचता था." शेष फिर......

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