शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

सुपोषण बनाम कुप्रबन्धन

सभी समस्याऔँ की जड़ है हमारा मन.कुपोषण के लिए भी हम सब का मन दोषी है.किसी ने ठीक ही कहा है कि सभी को माता पिता बनने का अधिकार नहीँ होना चाहिए.अब हम धर्म अर्थ काम मोक्ष मेँ सन्तुलन की कला से अन्जान हो गये हैँ. हम भूल गये है कि हमारे सनातन विद्वानोँ नबियोँ ने गर्भाधान शब्द के साथ संस्कार शब्द जोड़ कर गर्भाधानसंस्कार शब्द की अवधारणा क्योँ प्रस्तुत की थी?वर्तमान मेँ अपने जीवन को हम सब सार्वभौमिक मानकोँ या कानून के आधार पर बेहतर बना नहीँ पाते किसी को पति या पत्नी बनाने या बच्चे पैदा करने के कर्म से जुड़ जाते हैँ.आज 70प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार है इसके लिए माता पिता के अलावा को दोषी है?हमारे आदि विद्वानोँ ने तो विवाह एवं सन्तानोत्पत्ति का उद्देश्य तक धर्म बताया है वहीँ आज हम सब काम मेँ जीते है.हमारे मन धर्म मेँ नहीँ काम मेँ जीता है. "अशोक कुमार वर्मा बिन्दु" akvashokbindu @yahoo.in antaryahoo.blogspot.com #9452874748

कोई टिप्पणी नहीं: