मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

आम आदमी : अशान्ति एवं ��सन्तुष्टि

हिन्दुस्तान,23फरबरी 2010,अरुण कुमार त्रिपाठी का लेख -'नेहरु का सपना और आम आदमी' ठीक ही लिखता है - "........बहुलवाद, धर्मनिरपेक्षता और सभी के लिए न्याय ही हिँसा और तनाव रहित भारतीय लोकतन्त्र का आधार हो सकता है. समृद्धि और समावेशी विकास लोकतन्त्र को टिकाऊपन देता है और इसी से माओवाद और आतँकवाद जैसी अलोकतांत्रिक शक्तियोँ से लड़ने की ताकत मिलती है. " .....लेकिन देश की विभिन्न समस्याओँ को मनोविषय की दृष्टि से भी देखना आवश्यक है. स्थूल एवं भौतिक विश्लेषण ही आवश्यक है.अभी तक का हमारा यही अनुभव है कि सभी समस्याओँ की जड़ हमारा मन है.17-18वीँ सदी से आधुनिक विकास की जो दौड़ शुरू हुई है वह मानसिक भौतिक प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है . और फिर हमारे विद्वान अन्तरिक्ष मेँ जीवन खोजने मेँ लगे हैँ हम अब भी राजपूतानी काल के रीतिरिवाजोँ ,अन्ध विश्वासोँ से चिपके है. सदियोँ से चले आ रहे प्रभावोँ को मन से विदा नहीँ कर पा रहे हैँ और आज के चका चौँध मेँ भी खोया हुए हैँ. ऐसे मेँ भटकाव तथा अवसरवाद की स्थिति पैदा होगयी है.अशान्ति एवं असन्तुष्टि की अति व्यक्ति को खिन्न बना कर बागी बना देती है या पागल विछिप्त या आत्महत्या की स्थिति तक पहुँचा देती है.ऐसे मेँ क्या उपाय है व्यक्ति की श्रेष्ठ दिशा व दशा बनाने के लिए?उपाय है आध्यात्मिक, शारीरिक नैतिक शिक्षा . प्रत्येक युवक युवती के लिए पाँच वर्ष की सैन्य सेवा अनिवार्य की जानी चाहिए .विभिन्न पदोँ एवं चुनाव मेँ प्रत्याशियोँ के लिए नारको परीक्षण तथा ब्रेन रीडिँग अनिवार्य किया जाना चाहिए.सिर्फ भैतिक स्थूल चमकधमक के विकास से सब कुछ सम्भव नहीँ है.अशान्ति एवं असन्तुष्टि तो मन की दशा है उसे मनोविषय के स्तर पर ही सुलझाना होगा.....JAI HO....OM..AAMEEN.

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