शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

वेलेँटाइन वीक स्पेश��

हिन्दुस्तान मेँ वेलेँन्टाइन वीक स्पेशल पर आप का लेख सराहनीय था हालाँकि इस विषय पर मेरे विचार हैँ कि वास्तव मेँ जीवन ही उत्सव है आज की अन्ध भागदौड़ मेँ पर्व मात्र औपचारिकता रह गये है इन पर्वोँ से सिद्ध होता है कि जो आचार विचार भाव सात्विकता आदि पर्वोँ पर बनाने का प्रत्यन करते हैँ वह तो दैनिक दिनचर्या होनी चाहिए थी उसे हम भूल चुके हैँ.जो भूले नहीँ भी हैँ वे आज की भौतिक वादी दौड़ मेँ कहाँ पर हैँ? यहाँ बात प्रेम की है किसका प्रेम से साक्षात्कार है? जिसका प्रेम से साक्षात्कार हो जाता है उसका जीवन ही उत्सव हो जाता है.वह औरोँ को कष्ट नहीँ दे सकता.वह द्वेषभावना ईर्ष्या आदि नहीँ रखता.जहाँ ऐसा है भी वहाँ प्रेम नहीँ होता प्रेम मेँ तो अपनी इच्छाएँ नहीँ सामने वाली की इच्छाएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैँ. antaryahoo.blogspot.com

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