शनिवार, 20 मार्च 2010

: बोर्ड परीक्षा: ऐसे मेँ कैसे हो नकल विहीन परीक्षा?






बोर्ड परीक्षाएँ प्रारम्भ हो गयी हैं. नकल विहीन परीक्षा करवाने सम्बन्धी प्रशासन की बयान प्रति वर्ष मीडिया के सामने आती है लेकिन क्या नकलविहीन परीक्षाएँ ईमानदारी से सम्भव हो सकी हैँ? मैँ अनेक वर्षोँ से कक्ष निरीक्षक बन कर किसी न किसी कालेज मेँ डयूटी करता आया हूँ.मुझे तो कभी नहीँ लगा कि परीक्षाएँ ईमानदारी से नकलविहीन हुई हैँ.कालेज के चपरासी से लेकर प्रधानाचार्य केन्द्र व्यवस्थापक तक अप्रत्यक्ष रुप से भागीदार होते हैँ.दबंग अध्यापक या अभिभावक के सामने तटस्थ हो कर.जब स्थानीय केन्द्र थे तो परीक्षार्थियोँ को इमला बोल कर लिखवाते तक देखा गया. अब जब स्थानीय केन्द्र नहीँ रहते तो भी नकल माफियाओँ की ही चलती है.उनके विद्यालय का जहाँ परीक्षा केन्द्र होता है वहाँ वे इधर उधर की जुगाड़ से अपने माफिक कक्ष निरीक्षक बना कर भेज देते हैँ और वहीँ के कुछ अध्यापकोँ से साँठगाँठ कर अपने कार्य को अन्जाम देते हैँ.जिसकी जानकारी कभी कभी प्रधानाचार्य एवँ केन्द्रव्यवस्थापक तक को नहीँ होती.ईमानदारी से सिर्फ डयूटी करने वाले कक्ष निरीक्षक ऐसे मेँ परेशान होते हैँ.


एक दृश्य --"कुछ वर्ष पहले मैँ एक विद्यालय के एक कक्ष मेँ डयूटी कर रहा होता हूँ कि एक अध्यापक बार बार आकर कुछ परीक्षार्थियोँ को आकर कुछ न कुछ बता कर चले जाते हैँ.मेरे विरोध का असर नहीँ पड़ता .हाँ , हमेँ धमकियाँ जरूर मिलती है.


दूसरा दृश्य--"मैँ एक कमरे मेँ डयूटी कर रहा होता हूँ कि केन्द्रव्यवस्थापक हमेँ बुलवाकर कहते हैँ कि आप का विष्य हिन्दी है जरा बच्चोँ की मदद कर देना. मैँ यह कह कर वापस कक्ष मेँ आगया कि मेरा विषय हिन्दी नहीँ है."

तीसरा दृश्य-- "बिन्दु जी की डयूटी कक्ष मेँ न लगवाओ(भविष्य मेँ आप पढ़ेँगे मेरा ब्लाग-'प्रतिष्ठित अध्यापकोँ के दंश'). "


चतुर्थ दृश्य:हमेँ एक दो बार यह देखने का अवसर मिला है कि कैसे एक कक्ष मेँ एक अच्छे विद्यार्थी के साथ अन्याय होता है?उससे हर हालत मेँ सहयोग लेने के लिए कक्ष निरीक्षक तक तैयार रह व्यवधान पैदा करने की कोशिस करते हैँ.



दृश्य पाँच:कालेज मेँ एक कमरा बन्द होता है.जिसमेँ बाहर से ताला लगा होता है.एक दो गाड़ियाँ कालेज मेँ आकर सब ओके कर चली जाती हैँ.लेकिन........?! उस बन्द कमरे मेँ?! उससे क्या मतलब?वह तो बन्द है?वह बन्द है तो क्या उसमेँ कुछ नहीँ हो सकता?उसमेँ एक अध्यापक प्रश्न पत्र हल कर रहे होते हैँ.कुछ देर बाद वह कमरा खुलता है......एक अध्यापक एक कमरे मेँ पहुँचते हैँ,एक परीक्षार्थी की कापी उठाते हैँ जिसके अन्दर के पन्ने निकाल कर अपने पास रख लेते हैँ,अपनी और से लिखी एक अन्य कापी उस परीक्षार्थी को दे देते हैँ.एक दूसरे अध्यापक हर कक्ष मेँ जा कर इमला बोलने लगते हैँ.




दृश्य छ: :कालेज मेँ कहीँ न कहीँ किसी न किसी के पास मोबाइल तो रहता ही है केन्द्रव्यवस्थापक प्रधानाचार्य आदि से बचते हुए मोबाइल प्रश्नोँ के उत्तर जानने मेँ सहायक हो जाता है.





दृश्य सात: एक कमरे मेँ मैँ डयूटी कर रहा होता हूँ . जहाँ एक अध्यापक एक परीक्षार्थी के पास खड़े पेपर हल करवा रहे थे जिसका मैने विरोध किया.कुछ मिनट बाद जब वह परीक्षार्थी की कापी पर लिखने लगे तो मैँने फिर विरोध किया.बाहर घूम रहे सर्च दस्ते के एक अध्यापक को मैने अन्दर बुला अपनी आपत्ति बतायी तो सम्बन्धित अध्यापक की डयूटी कैँसिल कर दी गयी लेकिन
विद्यालय के कुछ प्रतिष्ठित अध्यापक इस घटना के विरोध मेँ आगये थे.


दृश्य आठ:जो छिनरा वही डोली के संग.......कुछ प्रतिष्ठित अध्यापक जो किसी न किसी माध्यम से विद्यालय प्रशासन पर हावी रहते हैँ और मनमानी कर परीक्षार्थियोँ के साथ पक्षपात करते हैँ एवं ईमानदार या अपने प्रतिकूल अध्यापकोँ उनकी छोटी गलती पर भी प्रतिक्रिया करते फिरते हैँ.



http://slydoe163.blogspot.com

बुधवार, 17 मार्च 2010

घर- घर का महाभारत

किसी ने कहा है अन्धा वह ही नहीँ है जो नेत्र नहीँ रखता है अन्धा वह भी है जिसे अपने या उनके दोष दिखाई नहीँ देते जिनसे स्वार्थपूर्ण सम्बन्ध होता हैँ . एक ही बात लेकिन वही बात जब एक कहता है तो बौखला जाते हैँ वही बात जब दूसरा कहता है तो खामोश रह जाते हैँ यहाँ तक कि गलत बात तक पर भी. इन्सान विवेक रूपी दृष्टि कितने रखते हैँ ?भौतिक मूल्योँ मेँ जीते जीते मनुष्य भूल गया है कि वह मनुष्योँ के प्रति कैसी सोँच रखे ? जो व्यवहार वह अपने साथ चाहता है वैसा ही व्यवहार वह दूसरोँ के साथ नहीँ करता है . यह उसकी बेईमानी कमजोरी व असफलता है. परिवार के अन्दर कुशल नेतृत्व का अभाव आज देखने को मिल रहा है जो निष्पक्ष न्याय करने मे असफल होते हैँ या किसी पारिवारिक- सदस्य के हित मेँ कुशल मार्ग -दर्शक तक नजर नहीँ आते. ऐसे विकल्प नहीँ रखते जो साकारात्मक एवं शान्तिपूर्ण निष्कर्ष तक ले जाएँ .परिवार मेँ जिसकी चलती है उसकी खिन्नता, अशान्ति, मनमानी, उदारहीनता , आदि परिवार को शान्त व खुशमिजाज रखने मेँ असफल होती है.ऐसे मेँ महाभारत के बीज....?!लोग राम- भरत मिलाप को पढ़ते हैँ, श्रवण कुमर की कथा को पढ़ते हैँ. यहाँ तक की रंग- मंचन मेँ भी रूचि लेते हैँ.करबा चौथ ,रक्षा बन्धन, भैया -दूज ,आदि पर्व हैँ लेकिन....?लेकिन रोज मर्रे की जिन्दगी मेँ ....?वही टकराव, रोज का टकराव आदि.रिश्तोँ के बीच बढ़ती मानसिक दूरी व खिन्नता को प्रति -दिन सोँचने के ढ़ंग व उदारहीन व्यवहारोँ से ट्रेँड कर विस्तार देते रहते हैँ जिससे घर मेँ अशान्ति व खुशमिजाजहीन वातावरण बना रहता है.हमारे सनातन विद्वानोँ ने परिवार का उद्देश्य धर्म बताया है न कि काम व अर्थ .मोक्ष या शान्ति के लिए काम एवं अर्थ का प्रयोग धर्म की प्रयोगशाला मेँ बताया है.कुप्रबन्धन, श्रम विभाजन का असफल वितरण, त्याग व समर्पण का अभाव,उदार हीनता,परस्पर आवश्यकताओँ मेँ सामञ्स्य का अभाव,एक दूसरे की भावनाओँ के शेयर का अभाव,सभी के अभिव्यक्ति के सम्मान का अभाव,एक दो परिवारिक सदस्योँ की उपेक्षा,आदि परिवार के विखराव व अशान्ति का कारण हैँ.त्याग व समर्पण ...?त्याग व समर्पण के बिना परिवार व देश का उत्थान नहीँ होता.इसके लिए अपने परिवार व देश की कमियोँ को जग जाहिर न कर अन्दर ही अन्दर हल करना आवश्यक होता है.जिन समस्याओँ का हल मुश्किल हो जाए तो आध्यात्मिक, आयुर्वेदिक ,योग, प्राणी सेवा ,आदि पर जीवन लगा देना चाहिए.जिस प्रकार देश के अन्दर की समस्याएँ देश के बाहर निकल कर अन्तर्राष्ट्रीय हो जाती हैँ उसी प्रकार घर की समस्याएं सड़क पर आ जाने के बाद समाज व रिश्तेदारोँ के बीच की समस्याएँ हो जाती हैँ.ऐसे मेँ तीसरे फायदा उठाते आये हैँ.इसलिए अन्दर की समस्याएँ अन्दर ही रख कर अन्दर ही अन्दर सुलझा लेना चाहिए अन्यथा बाहर फीँका पन आता है.अन्दर की असन्तुष्टि बाहरी तत्वोँ के सहयोग से परिवार या देश मेँ अन्तर्सँघर्ष को बढ़ोत्तरी मिलती है.ऐसे मेँ खुली वार्ता ,परस्पर-सहयोग, उदारता ,आदि से ही शान्ति व्यवस्था को बनाए रखा जा सकता है.धृतराष्ट्र तो अन्धे होते ही हैँ गाँधारी भी जब आँखोँ पर पट्टी बाँध ले अर्थात विवेक रूपी दृष्टि से काम न ले तो महाभारत की आवश्यकता आ ही पड़ती है.महाभारत अर्थात प्रकाश मेँ रत बड़ा.

अपने पक्ष को मजबूती से न रख पाने की असफलता के कारण भी मन मेँ खिन्नता उत्पन होती है और ऐसे मेँ भी परिवार की उदारहीनता , सभी को न ले कर चलने की सोँच परिवार आगे नहीँ बढ़ा सकती.कुछ को वैसाखा अर्थात सहयोग की आवश्यकता है लेकिन तथाकथित अपनोँ मेँ भी सहयोग से वंचित रह जाना पड़ता है.स्वयं की अशान्ति कभी कभी पूरे परिवार पर हावी कर दी जाती है . उन्हेँ बस बहाना चाहिए होता है.किसी न किसी बहाने घर मेँ अशान्ति का माहैल बनाय रखते हैँ.नुक्ताचीनी,व्यक्ति को पहचाने की अक्षमता,निरन्तर खिन्ऩता का व्यवहार ,जिन्दगी जीने ढंग से अपरिचित,आदि से क्या शान्ति का वातावरण बनाया जा सकता है?परिवार को महत्व देने का मतलब है त्याग व समर्पण के साथ सबको लेकर चलना.परिवार के अन्दर की अपनी असन्तुष्टि को परिवार के बाहर के लोगोँ से कहना अपने व अपने परिवार को कमजोर करना है.यदि हम चाहेँ कि हमारे चाहे अनुसार सब बदल जाएँ यह मूर्खता है.कहीँ भी एक दम चेँजिग नहीँआती.जब हम खुद की आदतोँ मेँ बदलाव नहीँ ला सकते तो दूसरोँ से कैसे उम्मीद नहीँ रख सकते?किसी परिवार मेँ कोई लड़की व्याह कर आती है तो अपने अनकूल वातारण न पा कर क्या कर सकती है? उसके हिसाब से एक दम बदलाव कैसे हो सकता है?ऐसे धीरज हीन ,नेतृत्वहीन, असन्तोषी,धैर्यहीन, विवेकहीन,आलोचना,बात बनाने की कला से अनभिज्ञता,आदि स्वयं को अशान्ति मेँ डालना है ही परिवार मेँ अपनी छवि को नष्ट करना .

शनिवार, 13 मार्च 2010

डिग्रियाँ तथा धन एकत्रित करना ही काफी क्या ?

सभी समस्याओँ के जड़ मेँ है-व्यवहार एवं ज्ञान मेँ सामाञ्जस्य का अभाव तथा मन पर शंका भ्रम अफवाह पूर्वाग्रह कूपमण्डूकता आदि का प्रभाव.हमारे एक सम्पर्की परिवार मेँ सभी अपने परिवार के ही एक सदस्य जो कि तेरह वर्षीय एक बालक . उसकी आदतोँ से सभी परेशान हैँ लेकिन......?!किताबेँ रट कर अच्छे अंक पाने की होड़ तथा भौतिक चमक दमक से हट कर है बच्चोँ मेँ अच्छी आदते डालने की परम्परा. परिवार एवं देश मेँ कुप्रबन्धन का एक कारण यह भी है कि भौतिक एवं मानवीय मूल्योँ मेँ असन्तुलन का होना . एक समय ऐसा होता है कि परिवार के किसी सदस्य के व्यवहारोँ को अपने प्रतिकूल (क्योँ न वे व्यवहार आदर्शवादी होँ) पा कर उसे उपेक्षित असम्मानित कमेन्टस असहयोग आदि कर निरुत्साहित रोगी आदि बना दिया जाता है वहीँ फिर आगे चल कर एक बच्चे मेँ पड़ती आदतोँ को नजर अन्दाज कर उसे रटन्तिविद्या तक सीमित कर उसके दशा दिशा को भी विचलित कर दिया जाता है.
उस परिवार मेँ वह बालक आज उस परिवार मेँ एक समस्या बन चुका है लेकिन इसके लिए दोषी कौन है?

जब हम यह सोँच रखे कि हम जो कर रहे है ठीक कर रहे हैँ चाहे क्योँ न उस कारण कोई हम से मानसिक दूरी बढ़ाती जा रही हो,मन मेँ अन्य विकार पैदा होते जायेँ . देखा गया है कि 13 - 14 वर्ष के बाद बालक को बिगड़ते देखते हैँ तो संगत या उसके किसी मित्र को दोष देते हैँ लेकिन मेरा अनुभव कहता है इसके लिए बालक का मन दोषी होता है. एक मनोवैज्ञानिक ने कहा है बालक जो बनना है वह 12साल तक बन चुका होता है बस उसका प्रदर्शन बाकी रह जाता है.

एक ओर इन्सान की बुराईयोँ को मारने की असफलता मेँ इन्सान को ही जिन्दा लाश बना देना दूसरी ओर विभिन्न भौतिक एन्द्रिक लालसाओँ या मोह के कारण किसी इन्सान की बुराईयोँ को नजर अन्दाज कर देना.....?! ऐसे मेँ कैसी भावी पीढ़ी की उम्मीद की जा सकती है?क्या अच्छे इन्सान की पहचान सिर्फ यही है कि इन्सान जैसे तैसे आगे चल धन कमाने लगे? धनवान होना अलग बात है अच्छा इन्सान होना अलग बात है. किसी के डिग्रियोँ या आमदनी को देख कर उसकी बुराईयोँ को नजरान्दाज कर देना या किसी की कम आमदनी या अशिक्षा को देख कर उसके भले होने के बाबजूद उसे उपेक्षित कर देना अपराध है.परिवार एवं देश की वास्तविक सम्पत्ति व्यक्ति का उत्साह चरित्र मधुरता न्याय भाईचारा ईमानदारी स्वाबलम्वन साहस परस्परसहयोग आदि है.भौतिक चकाचौँध मेँ जिसे भूल अमानवीय व्यवहार करने का परिणाम क्या हो सकता है? बच्चो के सामने गाली की भाषा मतभेद कटुकथन आदि की प्रस्तुति करने वाले अभिभावकोँ को तब अपने बच्चोँ के व्यवहार गलत लगने लगते हैँ जब बड़े होकर बच्चे वही व्यवहार करते हैँ जो वे बच्चो के सामने अन्य के सामने करते आये थे.हम देख रहे है कि अभिभावक ही कैसे भौतिक चकाचौँध मेँ शिष्टाचार को भूलते जा रहे हैँ और अपने बच्चोँ को अच्छे अंकोँ की चाहत की होड़ मेँ देख बच्चोँ की अशिष्टता तक को नजरान्दाज करते जा रहे हैँ . जब तक होश आता है कमान हाथ से निकल चुकी होती है.

अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'
शाहजहाँपुर (उ.प्र.)

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

भारतीय संस्कृति: अरण्य जीवन

भारतीय आदि संस्कृति प्रकृति सहचर्य के साथ आयुर्वेदिक एवं योग परम्परा को दिनचर्या का हिस्सा बनाने की प्रेरणा देती है.भारतीय पर्व एवं उत्सव अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति व आयुर्वेद से जुड़े हैँ.


कहा जाता है कि यदि माँ सीता रावण की अशोक वाटिका मेँ न रहतीँ तो लव कुश को नहीँ जन्मा होता.भारतीय संस्कृति अरण्य जीवन की प्रेरणा देती है.काम देव के पाँच वाण -अशोक ,नील कमल,आम्र मंजरी,लाल कमल,रजनी गंधा.जिसका आयुर्वँद मेँ बड़ा महत्व है.इसी प्रकार शिव लिँग पर बेलपत्री बेर गन्ने के छिले टुकड़े धतूरा आदि चढ़ाना का अपना महत्व है.

पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का प्रथम दिवस कहा गया है.इस दिन से संवत्सर का पूजन नवरात्र घटस्थापन ध्वजारोपण वर्षेश का फल पाठ आदि विधि विधान किए जाते हैँ.
कलश स्थापना एवं नए मिट्टी के बर्तन मेँ जौँ बोना नीम की कपोलोँ के साथ मिश्री खाने का विधान आयुर्वेदिक महत्व भी छिपाए है.
गाय के सीँगोँ अर्थात सम्मान पर पृथ्वी टिकी है इसका मतलब अब शोध स्पष्ट कर रहे है.सृष्टि के अन्त व प्रारम्भ पर गाय वास्तव मे कामधेनु है.

मैँ मुस्लिम भाईओँ आर्य समाजियोँ विज्ञानवादियोँ बुद्धिवादियोँ आदि से कहना चाहूँगा कि मतभेदोँ मेँ जीने की अपेक्षा अध्यात्म विज्ञान मेँ जीना आवश्यक है.अध्यात्मविज्ञान क्या है?अध्यात्म विज्ञान है- परम्पराओँ को विज्ञान की कसौटी पर कसना.अन्वेषण तथा सत्य मेँ जीना.


शेष फिर........

अपराध की जड़

एक सड़क, लोगोँ का आना जाना लगा था . एक अधेड़ अवस्था का व्यक्ति एक अधेड़ व्यक्ति पर टूट पड़ा और अनेक थप्पड़ व घूँसे चला दिए.जिसके विरोध मेँ पब्लिक आ गयी. पड़ोस मेँ दो सिपाई खड़े थे जो उसे थाने ले गये.दो दिन बाद उसको जमानत पर रिहा कर दिया गया .वह अब दुनिया की नजर मेँ अपराधी था. कोई भी उसकी सच्चाई परिचित नहीँ था.


उसने जिससे मार पीट की थी उसे बर्दाश्त करने की हद आ गयी थी. आखिर उसने उसका क्या बिगाड़ा था कि बार बार उस पर कमेन्टस ,लोगोँ से उसकी झूठी आलोचना, उसकी सफलता के पथ पर रोक लगाना ,आदि. आखिर हद की एक सीमा होती है.बर्दाश्त करने की हद होती हैँ. बर्दाश्त करते करते आदमी पागल सनकी हो जाए, आत्म हत्या कर बैठे तब ठीक है अन्यथा.........?या तो व्यक्ति अपराधी हो जाए या एकान्त मेँ जा कर भजन करने लगे?

सोमवार, 8 मार्च 2010

व्यक्तित्व निर्माण क��� भूमिका

व्यक्तित्व निर्माण से बढ़कर जीवन मेँ अन्य निर्माण क्या है? हम जीवन मेँ किन विकल्पोँ पर प्रथम ध्यान देँ,यह हमारे एवं परिवार के भविष्य निर्माण पर टिका है.सबसे बढ़ा धन है-स्वास्थ्य . कुछ लोग जमीन जायदाद धन लोलुपता आदि मेँ अन्धे होकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से अपने या परिजनोँ के स्वास्थ्य उत्साह उम्मीद आदि के साथ खिलवाड़ करते रहते हैँ . विशेषज्ञोँ या डाक्टरोँ की सलाह पर कार्य करते रहते हैँ . खुश मिजाज या विवेकपूर्ण गम्भीर बनने की कला से अन्जान होते हैँ . किसी ने कहा है कि जो वर्तमान मेँ असन्तुष्ट है , सोँच मेँ मत भेदोँ से भरा है,खिन्ऩता आदि बनाता जा रहा है-वह भविष्य के लिए कितना भी भौतिक आधार मजबूत कर ले लेकिन नम्रता धैर्य परोपकार आदि धारी मन के बिना वह जीवन मेँ शान्ति व सन्तुष्टि प्राप्त नहीँ कर सकता . यह अपनी आवश्यकताओँ व दूसरे की आवश्यकताओँ मेँ सामज्स्य करने मेँ असफल होते हैँ .

व्यक्तित्व निर्माण के लिए परिवार का खुश मिजाज एवं शान्तिपूर्ण वातावरण, व्यक्ति सम्मान, उदारता, स्वास्थ्य जागरूकता ,अध्यात्म, आदि की आवश्यकता होती है.
व्यक्ति की वास्तविक सम्पत्ति- उत्साह ,धैर्य, साहस ,आत्मबल, नम्रता ,आन्तरिक आनन्द ,शान्ति,आदि होती है न कि अन्य निर्जीव वस्तुएँ ;वे तो मात्र संसाधन हैँ.

रविवार, 7 मार्च 2010

जीवन:त्याग एवं संयम

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है.ऐसे मेँ उसका समूह मेँ जीना आवश्यक है.व्यक्तिगत जीवन मेँ जो समूह महत्वपूर्ण है, वे हैँ-परिजन,सम्बन्धीजन,कार्यक्षेत्र,लक्ष्य.जिसकी कार्यात्मक संरचना आदर्श होना आवश्यक है.जहाँ पर निर्जीव वस्तुओँ की अपेक्षा सजीव वस्तुओँ ,व्यक्ति सम्मान, स्वास्थय ,शान्ति ,नम्रता ,विवेक,आदि आवश्यक है.जो त्यग एवं संयम के बिना सम्भव नहीँ है.जो सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थ मेँ जीना जानते वे क्या जाने त्याग एवं संयम का मजा.समूह मेँ रहने के लिए अन्य के हित मेँ त्याग संयम आवश्यक हो जाता है.समूह हट एकान्त प्रिय व्यक्ति विकार युक्त होता है.

09.18PM; मैँ इस वक्त शहबाजनगर स्टेशन पर हूँ,ट्रेन से बीसलपुर जा रहा हूँ.आज सुबह सुबह पत्नी ने मोबाइल पर बताया कि परसोँ रात्रि पिता जी की काफी तबीयत खराब हो गयी, लखनऊ पीजी आई के एमरजेँन्सी मेँ एडमिट हैँ. नाक व लैट्रीन से खून निकलना बन्द नहीँ हो रहा है.प्रकृति (शरीर)मेँ वह घटित होना ही है जिसके कारण उपस्थित हो चुके हैँ .चाहेँ उन करणोँ हेतु मनुष्य दोषी न हो.यहाँ पर भी त्याग संयम आवश्यक है.चलो संयम तो समझ मेँ आता है लेकिन त्याग......कैसा त्याग?त्याग तामसी भोजन- आचार- बिहार -सोँच- आदि का.आज भी उदाहण हैँ-जीवन पर्यन्त शुद्ध सादा शाकाहारी भोजन, सत्संग, स्वाध्याय ,योगासन, प्रातभ्रमण ,प्राणायाम, पारिवारिक शान्तिपूर्ण धार्मिक वातावरण,आयुर्वेदिकता, आदि से हर हालत मेँ जुड़े रहे तथा त्याग संयम विवेक बनाये रखा,अब भी सब ठीक ठाक चल रहा है.कोई समस्या आयी भी तो उलझे नहीँ,निदान खोज लिया या छोटे छोटे नुस्खोँ को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना लिया,पथ्य अपथ्य पर ध्यान देना शुरु कर दिया या ईश्वर पर सब छोड़ कर आध्यात्मिक क्रिया विचारोँ को अपने ऊपर थोप लिया था.कभी कभी देखा गया है कि समाज सेवा योगासन पथ्य अपथ्य आदि से असाध्य रोग तक समाप्त होते देखे गये हैँ.यहाँ पर भी त्याग संयम काम करता है.मनुष्य अपने मेँ कुछ ऐसी आदतेँ डाल लेता है जिसके लिए वह तर्क भी खोज लेता है हालाकि वे आदतेँ आदर्श नहीँ होतीँ.ऐसी जीवन शैली एवं खान पान हम क्योँ रखेँ कि जिसके विरोध मेँ डाक्टर को सलाह देनी पड़े.

www.antaryahoo.blogspot.com

#9452874748

शनिवार, 6 मार्च 2010

बच्चोँ -युवकोँ को भड़काने का लाँच्छन

कौन माता पिता आखिर अपने बच्चोँ को सत्य अन्वेषण तथा धर्म के पथ पर देखना चाहता है? ऐसा जो करता भी है उसके खिलाफ उठ खड़े होते हैँ माता पिता अध्यापक एवं अन्य.सुकरात के साथ क्या हुआ?उसने 17 साल की अवस्था मेँ अपने स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी.उसका सत्य से साक्षात्कार हो चुका था.अब वह अन्य के सामने सत्य रखने लगा तो दबंगवाद और सत्तावाद उसके खिलाफ उठ खड़ा हुआ.उस पर बच्चोँ एवं युवकोँ को भड़काने का आरोप भी लगाया जाने लगा. मैँ भी बच्चोँ युवकोँ को भड़काने का काम करता हूँ-कहता हूँ कि जरूरी नहीँ की माता पिता का कहना मानो या भीड़ की चाल चलो,महापुरूषोँ का कहना मानो,कानून का कहना मानो .

कब धरती आतंकविहीन?

हिन्दुस्तान मेँ आप( राम चन्द्र गुहा जी) का लेख 'कैसे खत्म होगी माओवादी हिँसा?'प्रकाशित हुआ. आप कैसे लेखक हैँ?हम जैसा अदना प्रकाशित होने को व्याकुल लेखक आपको हर प्रश्न का उत्तर दे सकता हूँ.हमेँ अनेक लेख पढ़ कर हँसी आती है और मीडिया वालोँ की नियति पर भी.खैर..... मैँ आप से पूछना चाहता हूँ कि कब धरती आतंक से विहीन हुई है?हाँ,ऐसा तो हुआ है कि आतंक नये नये रूप धारण कर आता रहा है. 6 साल पहले की बात है मेरे बाये पैर मेँ दर्द प्रारम्भ हो गया .मैँ लँगड़ाकर चलने लगा.एक एलोपैथिक डाक्टर की शरण गया .जब तक दवायी का असर रहता दर्द नहीँ होता.एक की सलाह पर पैर की मालिश करने लगा .एक ने सलाह दी कि वैसाखी का सहारा लो मैँ वैसाखी का सहारा लेने लगा.जितने मिलते उतनी सलाह प्राप्त होती.लेकिन कोई लाभ प्राप्त नहीँ हो रहा था.रोग विशेषज्ञ के पास जाने की हिम्मत विभिन्न जाँच कराने अधिक रुपये खर्च करने, समय व्यय ,आदि की हिम्मत नहीँ हो रही थी.जब हिम्मत जुटायी तो.......?!विभिन्न जाँचोँ के बाद जाँघ के एक छोटे आपरेशन के बाद मैँ ठीक होगया. देश एवं विश्व की समस्योँ मूल जड़ तक पहुँचे बिना हम समस्याओँ से मुक्ति नहीँ पा सकते. आखिर कब धरती आतंक से विहीन हुई है?

गुरुवार, 4 मार्च 2010

एक से और खुलासा:अभिव्��क्ति अंश

**डा.नेत्रपाल से एक खुला विमर्श ** 5.00PM,04मार्च2010 ;दिन वृहस्पतिवार!मैँ एक पुस्तक 'महापुरूषोँ की अमरवाणी' लेकर डा.नेत्रपाल की दुकान के सामने से गुजरा तो उन्हेँ देख मैँ उनके समीप जाकर नमस्ते कर खड़ा हो गया."आओ बैठो "-कहते हुए वे अन्दर जा अपनी कुर्सी पर बैठ गये.मैँ जाकर बैँच पर बैठ ही पाया कि अपने स्कूल मेँ ही परीक्षा डयुटी करना,लफड़ोँ मेँ पड़ने की जरुरत नहीँ. तब फिर मैँ भी बोलने लगा था.प्रभु कृपा मैँ क्या क्या बोल गया कुछ पता नहीँ.जो बोला उसका कुछ आधार यह है कि--स्थूल मेँ जो दिखता है वह ही सिर्फ सत्य नहीँ होता.बहुत कुछ अदृश्य भी है जिसे देखने के लिए स्थूल आँखेँ ही काफी नहीँ हैँ.एक ही घटना को देख कर नौ व्यक्ति नौ बातेँ सोँचते हैँ. जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसा ही सोँचता है.और फिर व्यक्ति पहले से ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता है.ऐसे मेँ समाज की नजर मेँ क्या चरित्र..?महापुरुषोँ की नजर मेँ, प्रभु की नजर मेँ ,कानून व्यवस्था की नजर मेँ अपना चरित्र बनाओ. कबीरदास को एक बार कहना पड़ा था-मैँ जो दुनिया को देने आया हूँ,उसे मेरे पास कौन लेने आता है?दुनिया की चकाचौँध मेँ रहने वाला कब दुनिया से उबर पाया है?जब वे बोले कि ब्रह्मचर्य जीवन जीने वालोँ ने ही जीवन का भला किया है.हमने आपने यह गलती कर दी कि शादी कर ली. तब मैँ बोला-यह कोई गलती नहीँ है.सिर्फ सन्तान पैदा करने के लिए सम्भोग करने वाला भी ब्रह्मचर्य है. हाँ,यह सौभाग्य है कि पत्नी सहयोगी मिल जाए.यदि हमारा पथ धर्म का है लेकिन पत्ऩी काम मेँ आप को ढकेलने वाली तथा सांसारिकता मेँ लिप्त रखने वाली है तो ऐसे मेँ ऐसी पत्ऩी का साथ छोड़ देना चाहिए. अपने लक्ष्यात्मक समूह का ख्याल भी रखना आवश्यक है.लक्ष्य से दूर करने वाला अपना शत्रु होता है और धर्म के रास्ते पर न कोई अपना होता है न कोई पराया.

बुधवार, 3 मार्च 2010

बहुलवाद:खिशियानी बिल���ली खम्बा नोचे

बरेली;बरेली मेँ दंगे भड़क उठे.भड़काता कौन है?भड़कता कौन है?मनोवैज्ञानिकोँ से पूछो.भौतिक चमक- दमक, प्रदर्शनात्मक व्यवहार, आदि से क्या होता है? असलियत तो मन मानसिक- दूरियाँ, अलगावाद ,भेद ,आदि भरा हो तो........?! गलियोँ चौराहोँ पर धर्म नहीँ व्यक्ति की उदारता नहीँ साम्प्रदायिकता एवं उन्माद भड़कता है.एक दूसरी जाति एवं सम्प्रदाय को नीचा दिखाने तथा अपनी हिँसा का शिकार बनाने को इस्तेमाल करते हैँ.दोष हमारे मन का है,जिससे उदारता, नम्रता ,शालीनता, सद्भावना ,भाई- चारा, आदि विदा हो चुका है.मानसिक रूप से व्यक्ति अब भी विक्रत, असभ्य ,अराजक, आदि है. बहुलवाद मेँ जीने का मतलब यह नहीँ कि एक दूसरे के विरोध मेँ हम खड़े हो जायेँ. शुद्ध प्रजा तन्त्र के सामने अभी अनेक समस्याएँ हैँ जिससे निपटने के लिए अभी भारतीय व्यक्ति योग्य नहीँ है.(अपने आगामी लेख ' अमेरीकी फौजोँ भारत आओ' मेँ इसे और स्पष्ट करुँगा) शूद्रता एवं दुष्टता के दमन करते रहने के लिए साम दाम दण्ड भेद का इस्तेमाल आवश्यक है.संवैधानिक वातावरण के लिए तो वोट की राजनीति से हट कर कठोर निर्णय आवश्यक है. भाई भाई को एक जाति दूसरी जाति को एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को बर्दाश्त करने को तैयार नहीँ.हमेँ यह सीखना ही चाहिए कि घर से बाहर निकलने के बाद हम अपने रीति रिवाज सम्प्रदाय को घर पर ही छोड़ आयेँ और संवैधानिक तथा मानवीय व्यवहार करेँ. साम्प्रदायिक दंगे भड़काने वाले अफवाहोँ को बल देने वाले क्या कभी स्वस्थ इन्सान कहे जाने योग्य हैँ?हमेँ समझना चाहिए कि समाज के धर्म धर्म नहीँ हैँ,सम्प्रदाय है रीति रिवाज आदि हैँ. मनुष्य का धर्म तो एक ही होता है.जो त्याग -समर्पण, परहित ,नम्रता, आदि के बिना प्राप्त नहीँ किया जा सकता.साम्प्रदायिक दंगे ,उन्माद, आदि व्यक्ति के धर्म की पहचान नहीँ, अपराधी मन की पहचान है.

मंगलवार, 2 मार्च 2010

एहसास मौत का...?!

किसी ने कहा है कि जन्म और मृत्यु अस्तित्व के दो पैर हैँ.सृजन और विध्वंस प्रकृति का अंग है जिसे नकारा नहीँ जा सकता.संसार एवं उसकी हर वस्तु परिवर्तनशील है ऐसे मेँ कैसे उम्मीद रख सकते हैँ कि कोई वस्तु कैसे एक ही अवस्था मेँ रह सकती है?जीवन एक उत्सव है. जिसे हम जीवन समझते है वह तो चेतना के सागर मेँ एक बुलबुला है.ओशो ने अपने साधना की शुरूआत शवासन से की थी.उनके कुछ प्रवचन 'मैँ मृत्यु सिखाता हूँ' नामक एक पुस्तक मेँ संकलित हैँ,जिसे हर जिज्ञासु को पढ़ना चाहिए.जीवन के हर पक्ष के प्रति तटस्थ रहना आवश्यक है. दृष्टा और श्रोता का मतलव भी क्या होता है?दार्शनिक शब्द की उत्पत्ति 'दर्श' धातु से ही तो हुई है. अभी यह ब्लाग लिखते लिखते मैँ मैजिक गाड़ी से शाहजहाँपुर से मीरानपुर कटरा जा रहा हूँ. अभी गाड़ी ड्राईवर ढाबा के सामने से गुजरी है. गाड़ी जब शाहजहाँपुर थी ब्लाग लिखने लगा था. मन अनेक शँकाओँ से घिरा हुआ था .खैर अब सब ठीक है लेकिन....?पत्नी सुजाता से दोनोँ मोबाइल नम्बर पर बात न हो सकी? अंग्रेजी महीने के अनुसार आज मेरी शादी का एक वर्ष हो चुका.शादी का यह एक वर्ष और इससे पूर्व यह शादी तय होते तथा चर्चा के दौरान क्या मैँ अपने व्यक्तिगत जीवन मेँ पहले बराबर भी सुकून पाया है?ओह मैँ भी....?!किस विषय से मैने यह ब्लाग लिखना शुरु किया था और किस पर आगया? हाँ,मैँ कह रहा था कि दार्शनिक शब्द की उत्पत्ति 'दर्श' धातु से हुई है.यह अच्छी बात है कि मैँ बचपन से ही दुनिया से ऊबा हुआ पैदा हुआ .जिसने हमे आम आदमी से असाधारण बना दिया.बस अब इस असाधारणता को विशिष्टता मेँ बदलना आवश्यक है. जिसके लिए साधनारत हूँ.मुझे भी शवासन व कुछ अन्य मानसिक क्रियाओँ के समय को बढ़ाने की आवश्यकता है.अपनी आत्मा पर पकड़ मजबूत करना जरूरी है.दुनियाँ मेँ अपने कौ उलझाए रखना ठीक नहीँ आखिर इस दुनिया से जाना भी तो है. अब आप कहेँगे कि हम क्या अमर हैँ?लेकिन आपकी तैयारी क्या है?आप कहीँ मेहमानी पर जाते हैँ तो क्या वहाँ कि वस्तुओँ घटनाओँ व्यक्तियोँ आदि से जीवन भर के लिए मन को प्रभावित कर लेते हो?

नारको परीक्षण, ब्रेन ��ीडिँग:न्याय मेँ सहाय��

मैँ बचपन से ही महसूस करता आया हूँ कि समाज मेँ अफवाह भ्रम शंका आदि के आधार पर क़ैसे दबंग एवं अपने अनुकूल प्रदर्शन करने मेँ असफल व्यक्ति अन्याय व शोषण का शिकार होता रहा है?यह भी भ्रष्टाचार एवं कुप्रबन्धन का अंग है.ऐसे मेँ पीस पार्टी के प्रमुख की यह माँग क्रान्तिकारी है कि विभिन्न पदोँ पर नियुक्ति के लिए नारको परीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए. यह विचार हर वक्त हममेँ कौँधते रहते हैँ. इसका कारण यह है कि मैँ बचपन से परिवार तथा अन्य संस्थाऔँ मेँ ऐसा सहता आया हूँ जो हमेँ कष्ट पहुँचाता आया है.मैँ तो वैसे भी दुनिया मेँ ऊबा सा पैदा हुआ और ऊपर से.............?मधुर तथा ईमानदार वातावरण की तलाश मेँ मैँ और भटका ही. एक पल के किसी प्रेम कौ सजो कर रखने की कोशिस ने हमेँ सुकून दिया है.लेकिन किसी ने कहा है कि प्रभु के सिबा कोई प्रेम के लायक नहीँ है.शेष फिर.....