मंगलवार, 2 मार्च 2010

एहसास मौत का...?!

किसी ने कहा है कि जन्म और मृत्यु अस्तित्व के दो पैर हैँ.सृजन और विध्वंस प्रकृति का अंग है जिसे नकारा नहीँ जा सकता.संसार एवं उसकी हर वस्तु परिवर्तनशील है ऐसे मेँ कैसे उम्मीद रख सकते हैँ कि कोई वस्तु कैसे एक ही अवस्था मेँ रह सकती है?जीवन एक उत्सव है. जिसे हम जीवन समझते है वह तो चेतना के सागर मेँ एक बुलबुला है.ओशो ने अपने साधना की शुरूआत शवासन से की थी.उनके कुछ प्रवचन 'मैँ मृत्यु सिखाता हूँ' नामक एक पुस्तक मेँ संकलित हैँ,जिसे हर जिज्ञासु को पढ़ना चाहिए.जीवन के हर पक्ष के प्रति तटस्थ रहना आवश्यक है. दृष्टा और श्रोता का मतलव भी क्या होता है?दार्शनिक शब्द की उत्पत्ति 'दर्श' धातु से ही तो हुई है. अभी यह ब्लाग लिखते लिखते मैँ मैजिक गाड़ी से शाहजहाँपुर से मीरानपुर कटरा जा रहा हूँ. अभी गाड़ी ड्राईवर ढाबा के सामने से गुजरी है. गाड़ी जब शाहजहाँपुर थी ब्लाग लिखने लगा था. मन अनेक शँकाओँ से घिरा हुआ था .खैर अब सब ठीक है लेकिन....?पत्नी सुजाता से दोनोँ मोबाइल नम्बर पर बात न हो सकी? अंग्रेजी महीने के अनुसार आज मेरी शादी का एक वर्ष हो चुका.शादी का यह एक वर्ष और इससे पूर्व यह शादी तय होते तथा चर्चा के दौरान क्या मैँ अपने व्यक्तिगत जीवन मेँ पहले बराबर भी सुकून पाया है?ओह मैँ भी....?!किस विषय से मैने यह ब्लाग लिखना शुरु किया था और किस पर आगया? हाँ,मैँ कह रहा था कि दार्शनिक शब्द की उत्पत्ति 'दर्श' धातु से हुई है.यह अच्छी बात है कि मैँ बचपन से ही दुनिया से ऊबा हुआ पैदा हुआ .जिसने हमे आम आदमी से असाधारण बना दिया.बस अब इस असाधारणता को विशिष्टता मेँ बदलना आवश्यक है. जिसके लिए साधनारत हूँ.मुझे भी शवासन व कुछ अन्य मानसिक क्रियाओँ के समय को बढ़ाने की आवश्यकता है.अपनी आत्मा पर पकड़ मजबूत करना जरूरी है.दुनियाँ मेँ अपने कौ उलझाए रखना ठीक नहीँ आखिर इस दुनिया से जाना भी तो है. अब आप कहेँगे कि हम क्या अमर हैँ?लेकिन आपकी तैयारी क्या है?आप कहीँ मेहमानी पर जाते हैँ तो क्या वहाँ कि वस्तुओँ घटनाओँ व्यक्तियोँ आदि से जीवन भर के लिए मन को प्रभावित कर लेते हो?

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