बुधवार, 3 मार्च 2010

बहुलवाद:खिशियानी बिल���ली खम्बा नोचे

बरेली;बरेली मेँ दंगे भड़क उठे.भड़काता कौन है?भड़कता कौन है?मनोवैज्ञानिकोँ से पूछो.भौतिक चमक- दमक, प्रदर्शनात्मक व्यवहार, आदि से क्या होता है? असलियत तो मन मानसिक- दूरियाँ, अलगावाद ,भेद ,आदि भरा हो तो........?! गलियोँ चौराहोँ पर धर्म नहीँ व्यक्ति की उदारता नहीँ साम्प्रदायिकता एवं उन्माद भड़कता है.एक दूसरी जाति एवं सम्प्रदाय को नीचा दिखाने तथा अपनी हिँसा का शिकार बनाने को इस्तेमाल करते हैँ.दोष हमारे मन का है,जिससे उदारता, नम्रता ,शालीनता, सद्भावना ,भाई- चारा, आदि विदा हो चुका है.मानसिक रूप से व्यक्ति अब भी विक्रत, असभ्य ,अराजक, आदि है. बहुलवाद मेँ जीने का मतलब यह नहीँ कि एक दूसरे के विरोध मेँ हम खड़े हो जायेँ. शुद्ध प्रजा तन्त्र के सामने अभी अनेक समस्याएँ हैँ जिससे निपटने के लिए अभी भारतीय व्यक्ति योग्य नहीँ है.(अपने आगामी लेख ' अमेरीकी फौजोँ भारत आओ' मेँ इसे और स्पष्ट करुँगा) शूद्रता एवं दुष्टता के दमन करते रहने के लिए साम दाम दण्ड भेद का इस्तेमाल आवश्यक है.संवैधानिक वातावरण के लिए तो वोट की राजनीति से हट कर कठोर निर्णय आवश्यक है. भाई भाई को एक जाति दूसरी जाति को एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय को बर्दाश्त करने को तैयार नहीँ.हमेँ यह सीखना ही चाहिए कि घर से बाहर निकलने के बाद हम अपने रीति रिवाज सम्प्रदाय को घर पर ही छोड़ आयेँ और संवैधानिक तथा मानवीय व्यवहार करेँ. साम्प्रदायिक दंगे भड़काने वाले अफवाहोँ को बल देने वाले क्या कभी स्वस्थ इन्सान कहे जाने योग्य हैँ?हमेँ समझना चाहिए कि समाज के धर्म धर्म नहीँ हैँ,सम्प्रदाय है रीति रिवाज आदि हैँ. मनुष्य का धर्म तो एक ही होता है.जो त्याग -समर्पण, परहित ,नम्रता, आदि के बिना प्राप्त नहीँ किया जा सकता.साम्प्रदायिक दंगे ,उन्माद, आदि व्यक्ति के धर्म की पहचान नहीँ, अपराधी मन की पहचान है.

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