रविवार, 7 मार्च 2010

जीवन:त्याग एवं संयम

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है.ऐसे मेँ उसका समूह मेँ जीना आवश्यक है.व्यक्तिगत जीवन मेँ जो समूह महत्वपूर्ण है, वे हैँ-परिजन,सम्बन्धीजन,कार्यक्षेत्र,लक्ष्य.जिसकी कार्यात्मक संरचना आदर्श होना आवश्यक है.जहाँ पर निर्जीव वस्तुओँ की अपेक्षा सजीव वस्तुओँ ,व्यक्ति सम्मान, स्वास्थय ,शान्ति ,नम्रता ,विवेक,आदि आवश्यक है.जो त्यग एवं संयम के बिना सम्भव नहीँ है.जो सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थ मेँ जीना जानते वे क्या जाने त्याग एवं संयम का मजा.समूह मेँ रहने के लिए अन्य के हित मेँ त्याग संयम आवश्यक हो जाता है.समूह हट एकान्त प्रिय व्यक्ति विकार युक्त होता है.

09.18PM; मैँ इस वक्त शहबाजनगर स्टेशन पर हूँ,ट्रेन से बीसलपुर जा रहा हूँ.आज सुबह सुबह पत्नी ने मोबाइल पर बताया कि परसोँ रात्रि पिता जी की काफी तबीयत खराब हो गयी, लखनऊ पीजी आई के एमरजेँन्सी मेँ एडमिट हैँ. नाक व लैट्रीन से खून निकलना बन्द नहीँ हो रहा है.प्रकृति (शरीर)मेँ वह घटित होना ही है जिसके कारण उपस्थित हो चुके हैँ .चाहेँ उन करणोँ हेतु मनुष्य दोषी न हो.यहाँ पर भी त्याग संयम आवश्यक है.चलो संयम तो समझ मेँ आता है लेकिन त्याग......कैसा त्याग?त्याग तामसी भोजन- आचार- बिहार -सोँच- आदि का.आज भी उदाहण हैँ-जीवन पर्यन्त शुद्ध सादा शाकाहारी भोजन, सत्संग, स्वाध्याय ,योगासन, प्रातभ्रमण ,प्राणायाम, पारिवारिक शान्तिपूर्ण धार्मिक वातावरण,आयुर्वेदिकता, आदि से हर हालत मेँ जुड़े रहे तथा त्याग संयम विवेक बनाये रखा,अब भी सब ठीक ठाक चल रहा है.कोई समस्या आयी भी तो उलझे नहीँ,निदान खोज लिया या छोटे छोटे नुस्खोँ को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना लिया,पथ्य अपथ्य पर ध्यान देना शुरु कर दिया या ईश्वर पर सब छोड़ कर आध्यात्मिक क्रिया विचारोँ को अपने ऊपर थोप लिया था.कभी कभी देखा गया है कि समाज सेवा योगासन पथ्य अपथ्य आदि से असाध्य रोग तक समाप्त होते देखे गये हैँ.यहाँ पर भी त्याग संयम काम करता है.मनुष्य अपने मेँ कुछ ऐसी आदतेँ डाल लेता है जिसके लिए वह तर्क भी खोज लेता है हालाकि वे आदतेँ आदर्श नहीँ होतीँ.ऐसी जीवन शैली एवं खान पान हम क्योँ रखेँ कि जिसके विरोध मेँ डाक्टर को सलाह देनी पड़े.

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