शुक्रवार, 12 मार्च 2010

अपराध की जड़

एक सड़क, लोगोँ का आना जाना लगा था . एक अधेड़ अवस्था का व्यक्ति एक अधेड़ व्यक्ति पर टूट पड़ा और अनेक थप्पड़ व घूँसे चला दिए.जिसके विरोध मेँ पब्लिक आ गयी. पड़ोस मेँ दो सिपाई खड़े थे जो उसे थाने ले गये.दो दिन बाद उसको जमानत पर रिहा कर दिया गया .वह अब दुनिया की नजर मेँ अपराधी था. कोई भी उसकी सच्चाई परिचित नहीँ था.


उसने जिससे मार पीट की थी उसे बर्दाश्त करने की हद आ गयी थी. आखिर उसने उसका क्या बिगाड़ा था कि बार बार उस पर कमेन्टस ,लोगोँ से उसकी झूठी आलोचना, उसकी सफलता के पथ पर रोक लगाना ,आदि. आखिर हद की एक सीमा होती है.बर्दाश्त करने की हद होती हैँ. बर्दाश्त करते करते आदमी पागल सनकी हो जाए, आत्म हत्या कर बैठे तब ठीक है अन्यथा.........?या तो व्यक्ति अपराधी हो जाए या एकान्त मेँ जा कर भजन करने लगे?

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