बुधवार, 17 मार्च 2010

घर- घर का महाभारत

किसी ने कहा है अन्धा वह ही नहीँ है जो नेत्र नहीँ रखता है अन्धा वह भी है जिसे अपने या उनके दोष दिखाई नहीँ देते जिनसे स्वार्थपूर्ण सम्बन्ध होता हैँ . एक ही बात लेकिन वही बात जब एक कहता है तो बौखला जाते हैँ वही बात जब दूसरा कहता है तो खामोश रह जाते हैँ यहाँ तक कि गलत बात तक पर भी. इन्सान विवेक रूपी दृष्टि कितने रखते हैँ ?भौतिक मूल्योँ मेँ जीते जीते मनुष्य भूल गया है कि वह मनुष्योँ के प्रति कैसी सोँच रखे ? जो व्यवहार वह अपने साथ चाहता है वैसा ही व्यवहार वह दूसरोँ के साथ नहीँ करता है . यह उसकी बेईमानी कमजोरी व असफलता है. परिवार के अन्दर कुशल नेतृत्व का अभाव आज देखने को मिल रहा है जो निष्पक्ष न्याय करने मे असफल होते हैँ या किसी पारिवारिक- सदस्य के हित मेँ कुशल मार्ग -दर्शक तक नजर नहीँ आते. ऐसे विकल्प नहीँ रखते जो साकारात्मक एवं शान्तिपूर्ण निष्कर्ष तक ले जाएँ .परिवार मेँ जिसकी चलती है उसकी खिन्नता, अशान्ति, मनमानी, उदारहीनता , आदि परिवार को शान्त व खुशमिजाज रखने मेँ असफल होती है.ऐसे मेँ महाभारत के बीज....?!लोग राम- भरत मिलाप को पढ़ते हैँ, श्रवण कुमर की कथा को पढ़ते हैँ. यहाँ तक की रंग- मंचन मेँ भी रूचि लेते हैँ.करबा चौथ ,रक्षा बन्धन, भैया -दूज ,आदि पर्व हैँ लेकिन....?लेकिन रोज मर्रे की जिन्दगी मेँ ....?वही टकराव, रोज का टकराव आदि.रिश्तोँ के बीच बढ़ती मानसिक दूरी व खिन्नता को प्रति -दिन सोँचने के ढ़ंग व उदारहीन व्यवहारोँ से ट्रेँड कर विस्तार देते रहते हैँ जिससे घर मेँ अशान्ति व खुशमिजाजहीन वातावरण बना रहता है.हमारे सनातन विद्वानोँ ने परिवार का उद्देश्य धर्म बताया है न कि काम व अर्थ .मोक्ष या शान्ति के लिए काम एवं अर्थ का प्रयोग धर्म की प्रयोगशाला मेँ बताया है.कुप्रबन्धन, श्रम विभाजन का असफल वितरण, त्याग व समर्पण का अभाव,उदार हीनता,परस्पर आवश्यकताओँ मेँ सामञ्स्य का अभाव,एक दूसरे की भावनाओँ के शेयर का अभाव,सभी के अभिव्यक्ति के सम्मान का अभाव,एक दो परिवारिक सदस्योँ की उपेक्षा,आदि परिवार के विखराव व अशान्ति का कारण हैँ.त्याग व समर्पण ...?त्याग व समर्पण के बिना परिवार व देश का उत्थान नहीँ होता.इसके लिए अपने परिवार व देश की कमियोँ को जग जाहिर न कर अन्दर ही अन्दर हल करना आवश्यक होता है.जिन समस्याओँ का हल मुश्किल हो जाए तो आध्यात्मिक, आयुर्वेदिक ,योग, प्राणी सेवा ,आदि पर जीवन लगा देना चाहिए.जिस प्रकार देश के अन्दर की समस्याएँ देश के बाहर निकल कर अन्तर्राष्ट्रीय हो जाती हैँ उसी प्रकार घर की समस्याएं सड़क पर आ जाने के बाद समाज व रिश्तेदारोँ के बीच की समस्याएँ हो जाती हैँ.ऐसे मेँ तीसरे फायदा उठाते आये हैँ.इसलिए अन्दर की समस्याएँ अन्दर ही रख कर अन्दर ही अन्दर सुलझा लेना चाहिए अन्यथा बाहर फीँका पन आता है.अन्दर की असन्तुष्टि बाहरी तत्वोँ के सहयोग से परिवार या देश मेँ अन्तर्सँघर्ष को बढ़ोत्तरी मिलती है.ऐसे मेँ खुली वार्ता ,परस्पर-सहयोग, उदारता ,आदि से ही शान्ति व्यवस्था को बनाए रखा जा सकता है.धृतराष्ट्र तो अन्धे होते ही हैँ गाँधारी भी जब आँखोँ पर पट्टी बाँध ले अर्थात विवेक रूपी दृष्टि से काम न ले तो महाभारत की आवश्यकता आ ही पड़ती है.महाभारत अर्थात प्रकाश मेँ रत बड़ा.

अपने पक्ष को मजबूती से न रख पाने की असफलता के कारण भी मन मेँ खिन्नता उत्पन होती है और ऐसे मेँ भी परिवार की उदारहीनता , सभी को न ले कर चलने की सोँच परिवार आगे नहीँ बढ़ा सकती.कुछ को वैसाखा अर्थात सहयोग की आवश्यकता है लेकिन तथाकथित अपनोँ मेँ भी सहयोग से वंचित रह जाना पड़ता है.स्वयं की अशान्ति कभी कभी पूरे परिवार पर हावी कर दी जाती है . उन्हेँ बस बहाना चाहिए होता है.किसी न किसी बहाने घर मेँ अशान्ति का माहैल बनाय रखते हैँ.नुक्ताचीनी,व्यक्ति को पहचाने की अक्षमता,निरन्तर खिन्ऩता का व्यवहार ,जिन्दगी जीने ढंग से अपरिचित,आदि से क्या शान्ति का वातावरण बनाया जा सकता है?परिवार को महत्व देने का मतलब है त्याग व समर्पण के साथ सबको लेकर चलना.परिवार के अन्दर की अपनी असन्तुष्टि को परिवार के बाहर के लोगोँ से कहना अपने व अपने परिवार को कमजोर करना है.यदि हम चाहेँ कि हमारे चाहे अनुसार सब बदल जाएँ यह मूर्खता है.कहीँ भी एक दम चेँजिग नहीँआती.जब हम खुद की आदतोँ मेँ बदलाव नहीँ ला सकते तो दूसरोँ से कैसे उम्मीद नहीँ रख सकते?किसी परिवार मेँ कोई लड़की व्याह कर आती है तो अपने अनकूल वातारण न पा कर क्या कर सकती है? उसके हिसाब से एक दम बदलाव कैसे हो सकता है?ऐसे धीरज हीन ,नेतृत्वहीन, असन्तोषी,धैर्यहीन, विवेकहीन,आलोचना,बात बनाने की कला से अनभिज्ञता,आदि स्वयं को अशान्ति मेँ डालना है ही परिवार मेँ अपनी छवि को नष्ट करना .

कोई टिप्पणी नहीं: