शनिवार, 13 मार्च 2010

डिग्रियाँ तथा धन एकत्रित करना ही काफी क्या ?

सभी समस्याओँ के जड़ मेँ है-व्यवहार एवं ज्ञान मेँ सामाञ्जस्य का अभाव तथा मन पर शंका भ्रम अफवाह पूर्वाग्रह कूपमण्डूकता आदि का प्रभाव.हमारे एक सम्पर्की परिवार मेँ सभी अपने परिवार के ही एक सदस्य जो कि तेरह वर्षीय एक बालक . उसकी आदतोँ से सभी परेशान हैँ लेकिन......?!किताबेँ रट कर अच्छे अंक पाने की होड़ तथा भौतिक चमक दमक से हट कर है बच्चोँ मेँ अच्छी आदते डालने की परम्परा. परिवार एवं देश मेँ कुप्रबन्धन का एक कारण यह भी है कि भौतिक एवं मानवीय मूल्योँ मेँ असन्तुलन का होना . एक समय ऐसा होता है कि परिवार के किसी सदस्य के व्यवहारोँ को अपने प्रतिकूल (क्योँ न वे व्यवहार आदर्शवादी होँ) पा कर उसे उपेक्षित असम्मानित कमेन्टस असहयोग आदि कर निरुत्साहित रोगी आदि बना दिया जाता है वहीँ फिर आगे चल कर एक बच्चे मेँ पड़ती आदतोँ को नजर अन्दाज कर उसे रटन्तिविद्या तक सीमित कर उसके दशा दिशा को भी विचलित कर दिया जाता है.
उस परिवार मेँ वह बालक आज उस परिवार मेँ एक समस्या बन चुका है लेकिन इसके लिए दोषी कौन है?

जब हम यह सोँच रखे कि हम जो कर रहे है ठीक कर रहे हैँ चाहे क्योँ न उस कारण कोई हम से मानसिक दूरी बढ़ाती जा रही हो,मन मेँ अन्य विकार पैदा होते जायेँ . देखा गया है कि 13 - 14 वर्ष के बाद बालक को बिगड़ते देखते हैँ तो संगत या उसके किसी मित्र को दोष देते हैँ लेकिन मेरा अनुभव कहता है इसके लिए बालक का मन दोषी होता है. एक मनोवैज्ञानिक ने कहा है बालक जो बनना है वह 12साल तक बन चुका होता है बस उसका प्रदर्शन बाकी रह जाता है.

एक ओर इन्सान की बुराईयोँ को मारने की असफलता मेँ इन्सान को ही जिन्दा लाश बना देना दूसरी ओर विभिन्न भौतिक एन्द्रिक लालसाओँ या मोह के कारण किसी इन्सान की बुराईयोँ को नजर अन्दाज कर देना.....?! ऐसे मेँ कैसी भावी पीढ़ी की उम्मीद की जा सकती है?क्या अच्छे इन्सान की पहचान सिर्फ यही है कि इन्सान जैसे तैसे आगे चल धन कमाने लगे? धनवान होना अलग बात है अच्छा इन्सान होना अलग बात है. किसी के डिग्रियोँ या आमदनी को देख कर उसकी बुराईयोँ को नजरान्दाज कर देना या किसी की कम आमदनी या अशिक्षा को देख कर उसके भले होने के बाबजूद उसे उपेक्षित कर देना अपराध है.परिवार एवं देश की वास्तविक सम्पत्ति व्यक्ति का उत्साह चरित्र मधुरता न्याय भाईचारा ईमानदारी स्वाबलम्वन साहस परस्परसहयोग आदि है.भौतिक चकाचौँध मेँ जिसे भूल अमानवीय व्यवहार करने का परिणाम क्या हो सकता है? बच्चो के सामने गाली की भाषा मतभेद कटुकथन आदि की प्रस्तुति करने वाले अभिभावकोँ को तब अपने बच्चोँ के व्यवहार गलत लगने लगते हैँ जब बड़े होकर बच्चे वही व्यवहार करते हैँ जो वे बच्चो के सामने अन्य के सामने करते आये थे.हम देख रहे है कि अभिभावक ही कैसे भौतिक चकाचौँध मेँ शिष्टाचार को भूलते जा रहे हैँ और अपने बच्चोँ को अच्छे अंकोँ की चाहत की होड़ मेँ देख बच्चोँ की अशिष्टता तक को नजरान्दाज करते जा रहे हैँ . जब तक होश आता है कमान हाथ से निकल चुकी होती है.

अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'
शाहजहाँपुर (उ.प्र.)

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