शुक्रवार, 12 मार्च 2010

भारतीय संस्कृति: अरण्य जीवन

भारतीय आदि संस्कृति प्रकृति सहचर्य के साथ आयुर्वेदिक एवं योग परम्परा को दिनचर्या का हिस्सा बनाने की प्रेरणा देती है.भारतीय पर्व एवं उत्सव अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति व आयुर्वेद से जुड़े हैँ.


कहा जाता है कि यदि माँ सीता रावण की अशोक वाटिका मेँ न रहतीँ तो लव कुश को नहीँ जन्मा होता.भारतीय संस्कृति अरण्य जीवन की प्रेरणा देती है.काम देव के पाँच वाण -अशोक ,नील कमल,आम्र मंजरी,लाल कमल,रजनी गंधा.जिसका आयुर्वँद मेँ बड़ा महत्व है.इसी प्रकार शिव लिँग पर बेलपत्री बेर गन्ने के छिले टुकड़े धतूरा आदि चढ़ाना का अपना महत्व है.

पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि का प्रथम दिवस कहा गया है.इस दिन से संवत्सर का पूजन नवरात्र घटस्थापन ध्वजारोपण वर्षेश का फल पाठ आदि विधि विधान किए जाते हैँ.
कलश स्थापना एवं नए मिट्टी के बर्तन मेँ जौँ बोना नीम की कपोलोँ के साथ मिश्री खाने का विधान आयुर्वेदिक महत्व भी छिपाए है.
गाय के सीँगोँ अर्थात सम्मान पर पृथ्वी टिकी है इसका मतलब अब शोध स्पष्ट कर रहे है.सृष्टि के अन्त व प्रारम्भ पर गाय वास्तव मे कामधेनु है.

मैँ मुस्लिम भाईओँ आर्य समाजियोँ विज्ञानवादियोँ बुद्धिवादियोँ आदि से कहना चाहूँगा कि मतभेदोँ मेँ जीने की अपेक्षा अध्यात्म विज्ञान मेँ जीना आवश्यक है.अध्यात्मविज्ञान क्या है?अध्यात्म विज्ञान है- परम्पराओँ को विज्ञान की कसौटी पर कसना.अन्वेषण तथा सत्य मेँ जीना.


शेष फिर........

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