गुरुवार, 4 मार्च 2010

एक से और खुलासा:अभिव्��क्ति अंश

**डा.नेत्रपाल से एक खुला विमर्श ** 5.00PM,04मार्च2010 ;दिन वृहस्पतिवार!मैँ एक पुस्तक 'महापुरूषोँ की अमरवाणी' लेकर डा.नेत्रपाल की दुकान के सामने से गुजरा तो उन्हेँ देख मैँ उनके समीप जाकर नमस्ते कर खड़ा हो गया."आओ बैठो "-कहते हुए वे अन्दर जा अपनी कुर्सी पर बैठ गये.मैँ जाकर बैँच पर बैठ ही पाया कि अपने स्कूल मेँ ही परीक्षा डयुटी करना,लफड़ोँ मेँ पड़ने की जरुरत नहीँ. तब फिर मैँ भी बोलने लगा था.प्रभु कृपा मैँ क्या क्या बोल गया कुछ पता नहीँ.जो बोला उसका कुछ आधार यह है कि--स्थूल मेँ जो दिखता है वह ही सिर्फ सत्य नहीँ होता.बहुत कुछ अदृश्य भी है जिसे देखने के लिए स्थूल आँखेँ ही काफी नहीँ हैँ.एक ही घटना को देख कर नौ व्यक्ति नौ बातेँ सोँचते हैँ. जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसा ही सोँचता है.और फिर व्यक्ति पहले से ही पूर्वाग्रह से ग्रस्त होता है.ऐसे मेँ समाज की नजर मेँ क्या चरित्र..?महापुरुषोँ की नजर मेँ, प्रभु की नजर मेँ ,कानून व्यवस्था की नजर मेँ अपना चरित्र बनाओ. कबीरदास को एक बार कहना पड़ा था-मैँ जो दुनिया को देने आया हूँ,उसे मेरे पास कौन लेने आता है?दुनिया की चकाचौँध मेँ रहने वाला कब दुनिया से उबर पाया है?जब वे बोले कि ब्रह्मचर्य जीवन जीने वालोँ ने ही जीवन का भला किया है.हमने आपने यह गलती कर दी कि शादी कर ली. तब मैँ बोला-यह कोई गलती नहीँ है.सिर्फ सन्तान पैदा करने के लिए सम्भोग करने वाला भी ब्रह्मचर्य है. हाँ,यह सौभाग्य है कि पत्नी सहयोगी मिल जाए.यदि हमारा पथ धर्म का है लेकिन पत्ऩी काम मेँ आप को ढकेलने वाली तथा सांसारिकता मेँ लिप्त रखने वाली है तो ऐसे मेँ ऐसी पत्ऩी का साथ छोड़ देना चाहिए. अपने लक्ष्यात्मक समूह का ख्याल भी रखना आवश्यक है.लक्ष्य से दूर करने वाला अपना शत्रु होता है और धर्म के रास्ते पर न कोई अपना होता है न कोई पराया.

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