मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

पी.चिदम्बरम् से सवाल

माननीय चिदम्बरम् जी,

आपको धन्यवाद कि चेन्नई मेँ आपने घोषणा की कि जब तक हमारे शरीर मेँ खून की आखिरी बूंद है ,हम आक्रामकता के साथ आतंकवाद और नक्सलवाद के खिलाफ लड़ेँगे और भरोसा दिलातेँ हैँ कि दो या तीन साल मेँ इन पर पूरी तरह काबू कर लेँगे.

चिदम्बरम् जी हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैँ कि आप सफल होँ.हूँ ! वास्तव मेँ अव्वल दर्जे का दुश्मन है नक्सलवाद! जैसा कि आप ने कहा है .

एक छोटा सा बालक था-रमुआ.उसे लोग चिड़ाते रहते थे.बेचारे की सुन्दर सुशील विधवा माँ , उसे भी काफी कमेन्टस सुनने को मिलते थे.पुलिस भी दवंगोँ व धनवानोँ के संग मजा लेती थी.नेता भी दवंगोँ व धनवानोँ के प्रभाव के सामने सोँचते कि एक वोट की खातिर अनेक वोटोँ को प्रभावित क्योँ करेँ?एक दिन रमुआ की माँ गाँव के कुछ लोगोँ के साथ खेत मेँ गन्ना काट रही थी.लोगोँ के कमेन्टस सुनते सुनते वह बौखला गयी.आखिर बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है.


"अरे,बहुत गर्मी है तू मेँ . बुझा ही देयेँ बैसे भी तेरे आदमी को मरे दस साल बीत गये.किसी से का ठुकवाये नाय का?"फिर कुछ लोग उसे ईख मेँ ले जा कर उसकी इज्जत के साथ खेलने लगे.कुछ औरते चीखी चिल्लायीँ लेकिन दबंगोँ के सामने उनकी क्या चलने वाली?

घायलावस्था मेँ वह रमुआ के साथ कस्वे जाने लगी लेकिन कस्बे से कुछ पहले ही उसने प्राण त्याग दिये.

समय गुजरा,रमुआ की दो बीघा जमीन पर दबंगोँ ने कब्जा कर लिया.जब भी उसने अन्याय व शोषण के खिलाफ अपना सिर उठाने की कोशिस की उसको दबा दिया गया.दबंग उसे पकड़ कर जवरदस्ती धमक मेँ शराब पिला देते.गाँव के कुछ मुसलमान जब उसकी मदद करना चाहेँ तो दबंग साम्प्रदायिकता को भड़काने का प्रयत्न करेँ.आखिर इन्सानोँ की वस्ती निकल रमुआ जंगल मेँ आ गया.रामुआ डाकु रमुआ हो कानून का दुश्मन होगया .उसकी मृत्यु के बाद दबंगोँ पुलिस नेता अपने घर दिवाली मनाएँ. मूल कारण वहीँ के वहीँ.नये रमुआ पैदा हो जाते फिर जब वे मार दिए जाते नये रमुआ पैदा हो जाते.मूल जड़ तक जाने की आवश्यकता नहीँ....?!
खैर...

आदिकाल से अब तक धरती कब आतंकवाद से मुक्त हुई है?या कब तक?

कोई विक्षिप्त हो खुदकुशी कर ले ,शोषित होता रहे वह ठीक है.उठ खड़ा हो वह कोई ,तो वह अपराधी घोषित कर दिया जाए ?इससे पहले कानून व न्याय क्योँ सोता रहता है?हम देख रहे हैँ कि कैसे गरीब मजदूर कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार की कुव्यवस्था मेँ अन्याय व शोषण का शिकार हो विक्षिप्त होकर अपराध की राह पर निकल पड़ता है.आदिबासियोँ के आगे भी कमोबेश इसी तरह की समस्याएँ हैँ.

ओशो ठीक ही कहते हैँ कि अन्य समस्याओँ की तरह आतंकवाद की समस्या की जड़ मनुष्य का मन है.चिदम्बरम् जी अपराधिक मनोविज्ञान व मूल जड़ को भी समझिए .हाँ,आतंकवाद व नक्सलवाद के वर्तमान रुप को आप नष्ट करने मेँ आप अवश्य सफल होँगे लेकिन...?!आखिर कब धरती आतंक से विहीन हुई है?आतंक नये नये रूप मेँ पैदा होता रहा है.कार्ल मार्क्स की कुछ बातेँ यथार्थ मेँ सत्य महसूस होती हैँ. हम देख रहे हैँ कि समाज मेँ अब भी शोषण करने वालोँ या शोषित होने वालोँ की संख्या कम नहीँ है.

चिदम्बरम् जी जयप्रकाश का मानना था कि दबंगवाद ,जातिवाद, एवं भीड़तन्त्र के रहते प्रजातन्त्र का शुद्ध रुप स्थापित नहीँ हो सकता.

1 टिप्पणी:

arvind ने कहा…

bahut satik, 100% sahamat, kash ye baat chidambaram ji samajh pate.economics ke vidwaan hain lekin samaj saastra our manovigyan ki bhi padhai ve kar le.. achha rahega.