रविवार, 2 मई 2010

वैज्ञानिक अध्यात्म: ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान प्रस्तुति:अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'




05जून1979ई0 को मेँ लगभग छ: वर्ष का था.बीसलपुर (पीलीभीत)स्थित बाला जी की मढ़ी,जहाँ सरस्वती शिशु मन्दिर विद्यालय भी स्थित था.जहाँ हमारे पड़ोस मेँ रहने वाला एक हमउम्र बालक सन्तोष गंगवार कक्षा दो पास होकर तीन मेँ आया था.मैँ उसके साथ वहाँ जाने लगा था.गायत्री परिवार एवं आर्य समाज के लोगोँ के सम्पर्क मेँ भी आ चुका था.इसी दौरान.....?!

शान्ति कुञ्ज द्वारा वैज्ञानिक अध्यात्म की अध्ययन अनुसंधान यात्रा की शुरुआत 05जून1979ई0 को ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना के साथ हुई.उस वक्त पं. श्री राम शर्मा आचार्य ने कहा था

" आज हम सब ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के रूप मेँ जिस वैज्ञानिक अध्यात्म की अनुसंधानशाला की स्थापना कर रहे हैँ,वह कल इक्कीसवीँ सदी के उज्जवल भविष्य का वैचारिक, दार्शनिक एवं वैज्ञानिक आधार बनेगी..... ...भविष्य मेँ इसी का विकास महान विश्वविद्यालय के रुप मेँ होगा." श्री राम शर्मा आचार्य का स्वपन साकार हुआ.देव संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना हुई.जहाँ अब 'वैज्ञानिक अध्यात्म विभाग' की स्थापना भी हो चुकी है.


काफी वर्ष पहले रुस मेँ एक ऐसा कैमरा विकसित हुआ जो व्यक्ति के आभा मण्डल की तश्वीर खीँचता है.जिसके माध्यम से हम विविध जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैँ-व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर किस स्तर का है,उसे भविष्य मेँ कौन से रोग हो सकते हैँ.आभा मण्डल के माध्यम से अनेक निष्कर्षोँ तक पहुँचा जा सकता है.आप सब को ज्ञात होना चाहिए कि रंग सुगन्ध ध्वनि प्रकाश तरंग आदि का सूक्ष्म जगत मेँ काफी महत्व है जो स्थूल शरीर व जगत को भी प्रभावित करता है.इसी सिद्धान्त के तहत अब कलर थेरेपी ,साउण्ड थेरेपी, सुगन्ध थेरेपी, आदि का विकास सम्भव हो सका है.तरंग ,प्रकाश व रंग को प्रभावित करने वाली भौगोलिक घटनाओँ ,ग्रहोँ, आदि की स्थितियोँ ने ज्योतिष विज्ञान, रत्न विज्ञान ,आदि को जन्म दिया.शरीर जिन पंच तत्वोँ से बना है,उन पाँच तत्वोँ का भी अपना अपना रंग होता है.

अमेरीका स्थित एक संस्था सूक्ष्म शरीर पर शोध कर रही है जिसे भूत कहा जा सकता है.एक पुस्तक' लाइफ आफ द लाइफ'मेँ ऐसे व्यक्तियोँ के अनुभवोँ को संकलित किया गया है जो चिकित्सकोँ की दृष्टि मेँ मर चुके थे लेकिन फिर जिन्दा हो गये. विज्ञानवेत्ता स्टुअर्ट हाल रायड ने अपनी पुस्तक 'मिस्ट्रीज आफ इनरसेल्फ'मेँ कहा है कि ओ .ब .ई( शरीर से बाहर अनुभव)की अधिकतर घटनाएँ दूरी का अतिक्रमण करके स्थान के सम्बन्ध मेँ पायी गयी हैँ,लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी पाई गई हैँ जिसमेँ समय का भी अतिक्रमण हो सकता है.दुनियां के तमाम पन्थ आत्मा और सूक्ष्म शरीर(भूत)के अस्तित्व को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करते हैँ.खैर.....


अन्ध विश्वासोँ से निकल कर अपने पन्थ -जाति, आदि के रीतिरिवाजोँ -विचारों को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतारने के बाद जो शेष बचता है वही वैज्ञानिक अध्यात्म है. वैज्ञानिक अध्यात्म के जगत मेँ
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का योगदान सराहनीय रहेगा जिसने वैज्ञानिक अध्यात्म युग का श्रीगणेश किया है.हाँ अब कुछ गाय पर भी कुछ कह दूँ.


जब व्यक्ति के मन मेँ विकार आते हैँ व्यक्ति सिर्फ भोगवादी भौतिकवाद मेँ जीता है-प्रकृति का विदोहन बढ़ जाता है.
धर्म व मोक्ष से हट अर्थ व काम महत्वपूर्ण हो जाता है.प्रकृति असन्तुलन बढ़ जाता है.मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है.कहते हैँ कि गाय के सीँगोँ पर पृथ्वी टिकी है....क्या कहा गाय के सींगोँ पर..?!हाँ!जरा इसे विज्ञान की कसौटी पय कसिए तो....

हजरत मोहम्मद साहब ने कहा है कि गाय का दूध गिजा है घी दबा और गोस्त बीमारी है.महात्मा गाँधी ने कहा है कि गाय की रक्षा करना ईश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है.

गाय का सम्मान(सीँग)जब थक जाते है अर्थात कमजोर पड़ जाते हैँ तब धरती हिलती है.समृद्ध भारत का इतिहास गाय के सम्मान व सेवा के जिक्र के बिना अपूर्ण है. अनेक वैज्ञानिक सिद्ध कर चुके हैँ कि कृत्रिम वर्षा कराने मेँ सहायक प्रोपलीन आक्साइड गैस हमेँ गाय के घी को हवन से प्राप्त होती है.गाय के दूध मेँ STRONTIONतत्व पाया जाता है जो अणु विकरण का प्रतिरोधक है.कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाने पर भी गाय के दूध से बना घी नुकसानदायक नहीँ होता है. गाय के मूत्र मेँ विटामिन बी तथा कार्बोलिक एसिड होता है जो रोगाणुओँ का नाश करता है.

वैज्ञानिक कहते
है कि अगला युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा मै कहता हूँ कि इसके बाद का युद्ध गाय के लिए लड़ा जाएगा.मनुष्योँ मेँ प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने तथा भावी पीड़ी के स्वास्थ्य के लिए हर घर मेँ गाय का पालन आवश्यक है.प्रति व्यक्ति पाँच वृक्षोँ अर्थात पंचवटी का निर्माण आवश्यक है.

कलि औरतेँ-2




'सद्भावना'इमारत के समीप ही एक इमारत थी,जिसके मुख्य गेट पर लिखा था -अतिथि कक्ष.अफस्केदीरन अर्थात आरदीस्वन्दी की माँ नारायण के साथ अतिथि कक्ष मेँ पहुँची .


नारायण के गुरु अर्थात ' महागुरु' जिन्होंने 'सद्भावना' इमारत का निर्माण करवाया था,आखिर उन्होँने सद्भावना मेँ रोबेट स्त्रियाँ अर्थात 'ह्यूमोनायड' क्योँ रखे?

अब से 220वर्ष पूर्व अर्थात सन 4800ई0 के19जनवरी , एक पिरामिड आकार की भव्य बिल्डिँग मेँ मैरून वस्त्रोँ मेँ स्त्री -पुरुष मेडिटेशन मेँ बैठे थे.महागुरु की उम्र उस वक्त 30 वर्ष थी.आज उसके छोटे भाई की शादी लेकिन वह स्वयं बड़ा होकर भी अभी अविवाहित ?क्या लोक मर्यादाएँ- परिवार मर्यादाएँ?गरीब व मजबूर जनता के लिए तो सब घोर कलियुग का परिणाम ..!मुट्ठी भर दस प्रतिशत लोग सिर्फ एश्वर्यवान व सभी शक्तियोँ के अधिकारी थे.अन्तरिक्ष की अन्य धरतियोँ पर यहाँ के पूँजीपति व वैज्ञानिक लगभग सन 2150ई0 से ही जा जा कर रहने लगे थे .विभिन्न कारणोँ से धरती पर आक्सीजन ,आनाज ,फल, सब्जियोँ ,आदि की उपलब्धता नाम मात्र की रह गयी थी .मध्यम वर्ग बिल्कुल समाप्त हो चुका था.उच्च वर्ग व निम्न वर्ग;दो मेँ समाज विभाजित हो चुका था.प्राकृतिक मनुष्योँ से कई गुनी ज्यादा संख्या कृत्रिम मनुष्योँ , साइबोर्ग व ह्यूमोनायड की थी.सन2165ई0 मेँ भारतीय उपमहाद्वीप व चीन को दो भागोँ मेँ विभाजित करने वाली घटना ,जिसने अरब की खाड़ी को चीन के सागर से होकर प्रशान्त महासागर से मिला दिया था; के दौरान भूकम्प मेँ पूरे के पूरे शहर नष्ट हो गये थे.अनेक धर्म स्थल नष्ट हो गये थे .वैसे भी प्रकृति योग स्वास्थ्य मानवता आदि के सामने बाइसवीँ सदी के प्रथम दशक तक स्थापित धर्म स्थलोँ महत्व कमजोर पड़ गया था तथा आश्रम, आक्सीजन केन्द्र, योग केन्द्र का महत्व बढ़ गया था.इक्कीसवीँ सदी के आदर्श पुरुषोँ मेँ से एक डा.ए पी जे अब्दुल कलाम का यह कथन सत्य साबित होने की ओर था कि आने वाली
नस्लेँ हमेँ इस लिए याद नहीँ करने वाली कि हम जाति ,पन्थ, रीति रिवाजोँ के लिए सिर्फ संघर्ष करते रहेँ.इक्कीसवी सदी तक पूजे जाने वाले अनेक जातीय व मजहबी नेता आदि नकारे जा चुके थे.विश्व को सार्बभौमिक ज्ञान, भाईचारा, आदि की ले जाने वालोँ का ही अब सिर्फ सम्मान बचा था.अब फिर जाति के स्थान पर वर्ण व्यवस्था का
महत्व बढ़ गया था.




"आर्य,उन्मुक्त!तुम ख्वाब छोड़ दो कि कोई मिलेगी .ऐसे मेँ तुम्हेँ कोई नहीँ मिलनी .फिर अब वैसे भी सब स्त्री पुरुष मिल जुल कर बेटोक रहते हैँ ."


" फिर भी....."



"तुम जिन अर्थात जितेन्द्रिय नहीँ हो ?कामुकता तुम्मे जोर मार रही है ?अब जब हर परिस्थितियोँ मेँ स्त्री पुरुष के साथ साथ रहने के अवसर है तो काहे की खिन्नता ?जरूर तुम काम के वशीभूत हो?सन्तानोत्पत्ति तुम करना नहीँ चाहते.गृहस्थ जीवन के परम्परागत दायित्वोँ व मर्यादाओँ मेँ भी जी नहीँ सकते ,तब तो फिर वही मेडिटेशन , गीता व कुरआन"

महागुरु का वास्तविक नाम था-उन्मुक्त जिन.


उन्मुक्त जिन मेडिटेशन हाल मेँ अनेक स्त्री पुरुषोँ के बीच मेडिटेशन मेँ बैठा था.मेडिटेशन मेँ वह बैठा जरूर था लेकिन.....उसके कानोँ मेँ आवाज गूँज रही थी -

" आर्य,उन्मुक्त!तुम अभी जिन नहीँ हुए हो ,जिन के नाम पर तुम पाखड़ी हो.तुमको अभी और कठोर तपस्या करनी होगी."

* * * *


उन्मुक्त जिन के अज्ञातबास मेँ जाने के बाद कुख्यात औरतेँ ब्राह्माण्ड मेँ बेखौफ हो आतंक मचाने लगीँ .इन कुख्यात औरतोँ के बीच एक पाँच वर्षीय बालक ठहाके लगा रहा था.

इधर तीन नेत्र धारियोँ की धरती सनडेक्सरन पर आपात कालीन बैठक मेँ अनेक धरतियोँ के प्रतिनिधि उपस्थित थे.जिसमेँ औरतोँ की बहुलता थी.सभी इस बात के लिए चिन्तित थे कि कैसे ब्राह्माण्ड महा सभा मेँ अपना बहुमत बनाया जाये जो कि उन्मुक्त जिन के अज्ञातबास मेँ जाने के बाद कमजोर पड़ने लगा था और कुख्यात शक्तियाँ अपना मुँह फैलाने लगी थीँ.

एपीसोड-2
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लेखक:अशोक कुमार वर्मा'बिन्दु'