रविवार, 2 मई 2010

कलि औरतेँ-2




'सद्भावना'इमारत के समीप ही एक इमारत थी,जिसके मुख्य गेट पर लिखा था -अतिथि कक्ष.अफस्केदीरन अर्थात आरदीस्वन्दी की माँ नारायण के साथ अतिथि कक्ष मेँ पहुँची .


नारायण के गुरु अर्थात ' महागुरु' जिन्होंने 'सद्भावना' इमारत का निर्माण करवाया था,आखिर उन्होँने सद्भावना मेँ रोबेट स्त्रियाँ अर्थात 'ह्यूमोनायड' क्योँ रखे?

अब से 220वर्ष पूर्व अर्थात सन 4800ई0 के19जनवरी , एक पिरामिड आकार की भव्य बिल्डिँग मेँ मैरून वस्त्रोँ मेँ स्त्री -पुरुष मेडिटेशन मेँ बैठे थे.महागुरु की उम्र उस वक्त 30 वर्ष थी.आज उसके छोटे भाई की शादी लेकिन वह स्वयं बड़ा होकर भी अभी अविवाहित ?क्या लोक मर्यादाएँ- परिवार मर्यादाएँ?गरीब व मजबूर जनता के लिए तो सब घोर कलियुग का परिणाम ..!मुट्ठी भर दस प्रतिशत लोग सिर्फ एश्वर्यवान व सभी शक्तियोँ के अधिकारी थे.अन्तरिक्ष की अन्य धरतियोँ पर यहाँ के पूँजीपति व वैज्ञानिक लगभग सन 2150ई0 से ही जा जा कर रहने लगे थे .विभिन्न कारणोँ से धरती पर आक्सीजन ,आनाज ,फल, सब्जियोँ ,आदि की उपलब्धता नाम मात्र की रह गयी थी .मध्यम वर्ग बिल्कुल समाप्त हो चुका था.उच्च वर्ग व निम्न वर्ग;दो मेँ समाज विभाजित हो चुका था.प्राकृतिक मनुष्योँ से कई गुनी ज्यादा संख्या कृत्रिम मनुष्योँ , साइबोर्ग व ह्यूमोनायड की थी.सन2165ई0 मेँ भारतीय उपमहाद्वीप व चीन को दो भागोँ मेँ विभाजित करने वाली घटना ,जिसने अरब की खाड़ी को चीन के सागर से होकर प्रशान्त महासागर से मिला दिया था; के दौरान भूकम्प मेँ पूरे के पूरे शहर नष्ट हो गये थे.अनेक धर्म स्थल नष्ट हो गये थे .वैसे भी प्रकृति योग स्वास्थ्य मानवता आदि के सामने बाइसवीँ सदी के प्रथम दशक तक स्थापित धर्म स्थलोँ महत्व कमजोर पड़ गया था तथा आश्रम, आक्सीजन केन्द्र, योग केन्द्र का महत्व बढ़ गया था.इक्कीसवीँ सदी के आदर्श पुरुषोँ मेँ से एक डा.ए पी जे अब्दुल कलाम का यह कथन सत्य साबित होने की ओर था कि आने वाली
नस्लेँ हमेँ इस लिए याद नहीँ करने वाली कि हम जाति ,पन्थ, रीति रिवाजोँ के लिए सिर्फ संघर्ष करते रहेँ.इक्कीसवी सदी तक पूजे जाने वाले अनेक जातीय व मजहबी नेता आदि नकारे जा चुके थे.विश्व को सार्बभौमिक ज्ञान, भाईचारा, आदि की ले जाने वालोँ का ही अब सिर्फ सम्मान बचा था.अब फिर जाति के स्थान पर वर्ण व्यवस्था का
महत्व बढ़ गया था.




"आर्य,उन्मुक्त!तुम ख्वाब छोड़ दो कि कोई मिलेगी .ऐसे मेँ तुम्हेँ कोई नहीँ मिलनी .फिर अब वैसे भी सब स्त्री पुरुष मिल जुल कर बेटोक रहते हैँ ."


" फिर भी....."



"तुम जिन अर्थात जितेन्द्रिय नहीँ हो ?कामुकता तुम्मे जोर मार रही है ?अब जब हर परिस्थितियोँ मेँ स्त्री पुरुष के साथ साथ रहने के अवसर है तो काहे की खिन्नता ?जरूर तुम काम के वशीभूत हो?सन्तानोत्पत्ति तुम करना नहीँ चाहते.गृहस्थ जीवन के परम्परागत दायित्वोँ व मर्यादाओँ मेँ भी जी नहीँ सकते ,तब तो फिर वही मेडिटेशन , गीता व कुरआन"

महागुरु का वास्तविक नाम था-उन्मुक्त जिन.


उन्मुक्त जिन मेडिटेशन हाल मेँ अनेक स्त्री पुरुषोँ के बीच मेडिटेशन मेँ बैठा था.मेडिटेशन मेँ वह बैठा जरूर था लेकिन.....उसके कानोँ मेँ आवाज गूँज रही थी -

" आर्य,उन्मुक्त!तुम अभी जिन नहीँ हुए हो ,जिन के नाम पर तुम पाखड़ी हो.तुमको अभी और कठोर तपस्या करनी होगी."

* * * *


उन्मुक्त जिन के अज्ञातबास मेँ जाने के बाद कुख्यात औरतेँ ब्राह्माण्ड मेँ बेखौफ हो आतंक मचाने लगीँ .इन कुख्यात औरतोँ के बीच एक पाँच वर्षीय बालक ठहाके लगा रहा था.

इधर तीन नेत्र धारियोँ की धरती सनडेक्सरन पर आपात कालीन बैठक मेँ अनेक धरतियोँ के प्रतिनिधि उपस्थित थे.जिसमेँ औरतोँ की बहुलता थी.सभी इस बात के लिए चिन्तित थे कि कैसे ब्राह्माण्ड महा सभा मेँ अपना बहुमत बनाया जाये जो कि उन्मुक्त जिन के अज्ञातबास मेँ जाने के बाद कमजोर पड़ने लगा था और कुख्यात शक्तियाँ अपना मुँह फैलाने लगी थीँ.

एपीसोड-2
www.antaryahoo.blogspot.com
लेखक:अशोक कुमार वर्मा'बिन्दु'

कोई टिप्पणी नहीं: