मंगलवार, 16 नवंबर 2010

नक्सली कहानी:गम छिपाते रहो

झारखण्ड का एक गाँव 'नवीराम कुर्मियात '.



आसपड़ोस व गाँव के अन्दर सैन्य बलोँ की गस्त तेज हो गयी थी. कुछ नक्सलियोँ ने गाँव के एक मकान मेँ आश्रय ले रखा था.


सभी नक्सली एक कमरे मेँ बैठे वीडियो देख रहे थे,जहाँ राजेन्द्र भी उपस्थित था.



"जिन्दगी गीत है उसको गाते रहो


गम छिपाते रहो,मुस्कुराते रहो. "


जब यह गाना प्ले हुआ तो एक नक्सली उठ बैठा.

राजेन्द्र बोला-" कहां चले ,महतो ?"


" बाहर बरामडे मेँ आराम करता हूँ."



महतो कमरे के बाहर आ कर बरामडे मेँ पड़ी चारपाई पर लेट गया.उसका मन अन्तर्द्वन्द से ग्रस्त हो चुका था.

"गम छिपाते रहो ,
मुस्कुराते रहो."
-गाना अब भी सुनाई दे रहा था.


महतो का दिल दिमाग डिस्टर्व हो चुका था.


कैसे मुस्कुराएं?कब तक मुस्कुराएं?हूँ!गम को छिपाते चलेँ?फिर छिप छिप कर यह गम भड़ास बन जाएँ?
भड़ास भी अब......... आक्रोश ....खिन्नता....चिड़चिड़ापन....हिँसा ..... जबरदस्ती....हूँ!


काश! कोई हमको चाहता, हम भी चाहते किसी को.
हम भी कहते दिल की,
मरहम हमको मिलते.
आंसू न बहे तो क्या,

हमारे खिलखिलाने के पीछे,

मेरे'पीछे' को कौन समझे?


कोई तो 'नम आंख 'को समझते.



हूँ!सामाजिकता के दंश ! परिवार के दंश!
और न जाने क्या क्या दंश....?मैँ आज परिवार समाज कुप्रबन्धन के खिलाफ खड़ा हूँ लेकिन खुद क्या कर रहा हूँ?


पहली पाठशाला है परिवार,बालक दर्पण है परिवार का!! हूँ, जानते हैँ लेकिन ....?!एक यह भी परिवार है,दूसरा मेरा परिवार था.बाप ने अपने बड़े भाई से भी सीख नहीँ ली.
रुपया ही नहीँ,शान्ति सुकून व प्रेम भी चाहिए.इस परिवार मेँ कुल चार व्यक्ति हैँ.एक अधेड़ दम्पत्ति व दो बच्चे.एक बीस वर्ष का युवक राजेन्द्र दूसरा सात वर्षीय दीपेश.कितना प्रेम है इन लोगोँ मेँ! यहाँ तक की अन्जान मजबूर ,गरीबोँ, भिखरियोँ,आदि पर भी अपना प्यार लुटाते फिरते हैँ.और अच्छे इन्सान की पहचान भी क्या है? 'लोगोँ ' को भी कमाना.तन व जन से बढ़कर और क्या धन ?



जब परिवार का नेतृत्व परिजनोँ दुख दर्द मेँ संवेदनाएँ न बांट अपनी धुन मनमानी व स्वार्थ मेँ जिए तथा परिवार मेँ शान्तिपूर्ण व सौहार्द पूर्ण वातावरण न दे सके तो परिवार की कब तरक्की ?

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

ठीक है!

www.akvashokbindu.blogspot.com