गुरुवार, 3 नवंबर 2011

महिला सशक्तिकरण के अभिशाप !

नारी सशक्तिकरण का परिणाम है कि वर्तमान मेँ नब्बे प्रतिशत दहेज
प्रकरण झूठे हैँ . मानव सत्ता के स्वस्थ विकास के लिए न नारी सशक्तिकरण
चाहिए न ही नर सशक्तिकरण वरन चाहिए सम सह अस्तित्व . निरे नारी सशक्तिकरण
से न निरे नर सशक्तिकरण से समाज मेँ विक्रतियां ही उत्पन्न हुई हैँ .

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रविवार, 23 अक्तूबर 2011

अपना दर्द जो उसका इन अपनों को एहसास न होता है!

अपनों के बीच में बेगानापन महसूस होता है

अपना दर्द जो उसका इन अपनों को एहसास न होता है.

इन अपनों के बीच यदि घुट घुट जीना है

तो इससे अच्छा तो दुश्मन से गले लगाना है..


अपने दर्द को किसने दी सहानुभूतियोँ की हबा

कौन अपना कौन पराया समझ न आया

तब अन्जानों के प्यार को
सहजना चाहा है

अन्जानों को अपना बना बना दूर जाता रहा है..


भटकते रहे सुकून की तलाश मेँ
कब मिट सके दर्द मेरे इस जहाँ मेँ

दर्दोँ को दिल समेटे मुस्कुराते रहे

मेरे छिपे दर्द को जानने की फुर्सत किसे..


एक वो हादसा ख्वाब मेँ आता है रोज रे

मौत को बुलाता हर रात रोज मैँ

एक हैं वो जो जिएं औरों के प्यार मेँ

और एक हम हैँ लगे जो खुद को संवारने मेँ...


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स्थूल मरता है!

जन्म हुआ तो मौत होगी ही,
उम्र तो ढलेगी ही .

तश्वीर तो उसी की ही होगी-
स्थूल तन है जिसका.

स्थूल तन होगा उसका ही-

जो जन्मा और जिसकी

मौत होगी ही.


बहुत से भगवान हैं जमाने मेँ,
जिनकी तश्वीरें हैं जमाने मेँ.

तश्वीरे तो उसी की होती हैँ-

जो जन्मेँ हैं इस जमाने मेँ.

जो जन्मेँ हैं तो फिर वो मरेंगे भी

स्थूल तन तो मरेंगे ही,उम्र तो.....

राम नाम किसका ?

कृष्ण नाम किसका?

तन का. सिर्फ तन का.

शक्ल होती है स्थूल की

जो मरेगा ही ढलेगा ही.

ब्रह्मा विष्णु महेश की शक्ल...?

शक्ल तो स्थूल की ही,

स्थूल कौन?जो जन्मा और मरा भी..?!

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मन पाए विश्राम जहाँ: दादी ! प्यारी दादी

मन पाए विश्राम जहाँ: दादी ! प्यारी दादी

मतदाता जागृति कैसे :जनता का अनुशासन?

जनता गुटों, भीड़ों. समूहों,जातियों,मजहबों,आदि में विभक्त हैं.वह
अपने छोटे छोट परम्परागत अर्द्धसत्यों मेँ जीती हैं उससे इससे मतलब नहीं
कि सारी मनुष्यता के लिए क्या मान्यताएं हैँ?संविधान की क्या मान्यताएं
हैँ?विभिन्न गुट, समूह,जाति,मजहब, एवं परस्पर व्यक्तियों के स्वार्थ,
मानसिकताएं,मतमतान्तर टकराते हैँ,मतभेद पैदा होते हैं और अनुशासन भंग
होता है.शान्ति भंग होती है.व्यवस्थाएं भंग होती हैं.


जनता कैसे अनुशासित हो?
इस प्रति सजग होना हर बुद्धिजीवी व्यक्ति,शासन प्रशासन, मेँ बैठे
व्यक्तियों,धर्म व समाज के ठेंकेदारों का दायित्व है.लेकिन हो भी कैसे
अनुशासित जब हम अपने निजी कूपमण्डूक अर्धसत्यों को जी रहे
हैँ.शान्ति,अनुशासन,मनुष्यता,जीवन के सत्यों से हमेँ कोई मतलब नहीँ....?!

जब मातापिता,शिक्षक,पुलिस, मिलेट्री,वकील,आदि ही यदि
अनुशासित,शान्तिप्रिय,संविधानप्रिय.आदि नहीं तो आम जनता क्या
करे?स्वार्थ,स्नेह,लाड़प्यार,आदि का प्रदर्शन न हो तटस्थता का व्यवहार
होना चाहिए.शख्त अनुशासन मातापिता शिक्षक पुलिस वकील आदि मेँ नजर आयें तो
जनता मेँ अनुशासन बन सकता है.
डर कर ईमानदारी प्रति साहस का प्रदर्शन न कर पाना ही जनता की अनुशासन
हीनता का कारण है.

संविधान का समाजीकरण:-

हिन्दुस्तान का नागरिक संविधान को पंद्रह प्रतिशत तक भी अपने आचरण मेँ
नहीं उतार पाया है तो काहे की नागरिकता,काहे की देशभक्ति...?आम आदमी के
द्वारा संविधान का इस्तेमाल भी अब सिर्फ अपने विपक्ष को नीचा दिखाने के
लिए किया जाता है. रोजमर्रे की जिन्दगी मेँ संविधान का प्रयोग करना तो
दूर संविधान की एबीसी तक नहीं जानते.यहां के जनप्रतिनिधि संविधान की शपथ
तो खाते हैं लेकिन वे भी संविधान की एबीसी नहीं जानते.ऊपर से संविधान की
धज्जियां उड़ाते हैँ.

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

कथांश:नशे की छांव!

रमन छ: वर्ष का एक बालक,जो कक्षा दो मेँ पढ़ता था.विद्यालय से आकर वह
अपना वस्ता अल्मारी मेँ रख हाथ पैर धोकर अपनी मां के पास पहुंच गया और
बोला-"मम्मी,खाना परस दो."

रमन ने भोजन खाना ही शुरु किया कि अपने पिता को एक कमरे से बाहर निकलते
देख वह बोला-"पापा,सर फीस जमा करने को कहते थे."


"ऐ रम्मन्ना!" - लड़खड़ाते हुए रमन का पिता चीखा.


उसका पिता नशे में था. वह आया और भोजन की थाली पर ठोकर मार दी.रमन को
उठा कर चारपायी पर पटक दिया .

"पढ़ना लिखना कुछ भी नहीं.फीस फीस फीस....!"

"अपना नशा अपने पास रखा करो . " - रमन की मां बोली.


"ये,तू क्या पिटेगी?"


"आ........आ........!" -रमन का गला बंद हो गया . उसकी माँ
तुरन्त गिलास मेँ पानी ले रमन के पास पहुँची और रमन का गला व सीना सहलाते
हुए पानी पिलाने लगी . कुछ समय बाद रमन ने राहत की साँस ली .

* * *


रात्रि के बारह बज रहे थे.


रमन का पिता कालोनी के लड़कों व युवकों के साथ जुआँ खेल रहा था.

और रमन.....!?

रमन चारपायी पर खड़ा हो खिड़की से बाहर झांक रहा था.बाहर बरामडे मेँ उसका
पिता अन्य लड़कों व युवकोँ के साथ जुआं खेल रहा था.

वह सोंचने लगा-विद्यालय मेँ प्रर्थना बाद जब पहला पीरियड लगा तो
क्लासटीचर रजिस्टर लेकर क्लास मेँ आते आते ही रमन को देख कर बोले-"रमन,तू
फिर आ गया आज.तुझे कितनी बार कहा कि फीस लेकर आना या फिर मम्मी या पापा
को साथ लेकर आना ."

रमन झुंझला कर चीख पड़ा-

"कहता तो हूँ रोज घर पर.मैं क्या करुँ?निकाल दो मुझे क्लास से.रोज रोज फीस फीस."

फिर रमन रोने लगा.


और ऊपर से रमन के पास जाकर क्लासटीचर ने उसके गाल पर एक तमाचा मार दिया.


"मार लो,मार लो,और मार लो."


रमन को लेकर क्लासटीचर प्रिन्सिपल आफिस पहुँच गया.जहां मैं बैठा
प्रिन्सिपल से बात कर रहा था.मैं प्रकरण को जानता था.मन ही मन वौखलाहट से
भर गया,इन नन्हेँ मुन्ने बच्चों को कितना कष्ट होता है?इनकी कोमलता का
एहसास किसे है?


"रमन,यहां आओ." - मैने रमन का हाथ खींच कर उसे अपने पास खड़ा कर लिया.


"मैने कितनी बार समझाया है- रमन? परेशान न हुआ करो."

"मैं क्या करुँ?"


"आपको कुछ भी करने की जरुरत नहीं है?"


मैने प्रिन्सिपल की ओर देख कर कहा-"आपसे मैं कह चुका हूँ . अभिभावकों
के व्यवहारों की सजा बच्चों को देना ठीक नहीं."क्लासटीचर से प्रिन्सिपल
बोले-"आपने इसके घर पर जाकर सम्पर्क किया?"


"नहीं!क्या करुं जाकर वहाँ ?इसके पिता जी.... ."


"मार तो डालेंगे नहीँ.यही बात है तो दो तीन अन्य अध्यापकों को लेकर
जाओ . अच्छा रमन, आप क्लास में जाओ."


रमन क्लास मेँ आ गया.


* * *

" हा.......हा.........! "-सब ठहाके लगा रहे थे.रमन का पिता लोगों
के साथ नशे में होते हुए भी शराब पिए जा रहा था.


कि -


रमन के पिता ने जब अपने होंठों पर अंगुली रख दी तो सब चुप हो गये.अब रमन
का पिता कमरे के अन्दर से आ रही रमन की आवाज को सुनने
लगा-"पापा-पापा-फीस!"


रमन के पिता ने उठ कर खिड़की से झांका , रमन सो रहा था.


"साला,स्वपन में भी फीस फीस रटता है."


फिर वह कमरे की ओर चल दिया.

"पापा,फीस.बच्चे भी मजाक बनाते हैं."


अन्दर जा कर रमन के पिता ने रमन को झकझोर दिया और-
"साला!सपने में भी फीस....फीस... ."


रमन की मां चीख पड़ी-

"जाओ यहाँ से.खुद सोते नहीं औरों को भी नहीं सोने देते ."


रमन का पिता खामोश हो कमरे से बाहर निकल गया.

सोमवार, 5 सितंबर 2011

शिक्षक दिवस सन 2011ई0की झलकियां

आदर्श बाल विद्यालय इण्टर कालेज मीरानपुर कटरा (शाहजहांपुर) मेँ बच्चों के द्वारा मनाए गये शिक्षक दिवस की कुछ झलकियां!

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रविवार, 4 सितंबर 2011

शिव धाम मदनापुर शाहजहांपुर यात्रा की कुछ स्मृतियां

हम सभी 12.30PMपर हम मदनापुर (शाहजहांपुर)स्थित शिव धाम पहुंच गये थे .

आज दिन रविवार, मुक्ताभरण सप्तमी ! भाद्रपद शु. 7.विक्रम सम्वत 2068.

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शनिवार, 3 सितंबर 2011

पुष्प पर चोट!

उन दिनों की बात है जब मैं पुवायां स्थित शिशु मंदिर मेँ शिक्षण
कार्य करता था.उन दिनों प्रधानाचार्य थे-राजेन्द्रनगर बरेली के निवासी
क्रान्तिगिरि गोस्वामी.कक्षा दो मेँ एक छात्र था-पुष्प.मुझे ध्यान है एक
बार जब वह तीन दिन लगातार विद्यालय नहीं आया तो मैं उसके घर पहुंचा.
ज्ञात हुआ कि वह बीमार है .उसकी माँ से पता चला कि इसने तो रात के दो बजे
सबको परेशान कर दिया .ड्रम मेँ जा कर छिप गया था.लोगों ने काफी ढूंढा .दो
दिन बाद पुष्प विद्यालय पुन: आ गया था.वह झूलों के पास खड़ा अन्य बच्चों
को झूलते देख रहा था.वह मात्र देख रहा था...?!कुछ बालक बालिकाएं एक दूसरे
से जिद्द कर रहे थे कि हम पहले झूलेँगे हम पहले झूलेंगे.जब मैं वहां
पहुंचा बच्चों ने मुझे घेर लिया और मुझसे झुलवाने के लिए कहने लगे.मेरी
निगाह कुछ दूरी पर खड़े पुष्प पर थी."पुष्प को देखो तुम लोग.कैसा खड़ा है
शान्त?और तुम लोग हो कि जिद्द किए जा रहे हो."एक बालिका बोली-"वह तो पागल
है." "अच्छा,सब पुष्प के पीछे एक पंक्ति मेँ आओ.एक एक कर सबको झुलवाया
जाएगा.."
एक झूले पर मैने पुष्प को बैठा दिया.वह झूलता रहा.मैँ बस,उसे मुस्कुराते
हुए देखता रहा.तब वह भी मुस्कुरा देता,हालांकि उसके चेहरे पर हल्का आ
टपका था.उस दिन के बाद पुष्प मेरे से खुला और मुझसे बातचीत करना शुरु कर
दिया.एक दिन अवकाश के बाद उसे मैं एक खाली पड़े रुम मेँ ले गया और उससे
बातचीत करने लगा.फिर धीरे धीरे गीत कहानियों की चर्चा के बाद हल्के
हल्के उस पर मुटठी से वार करने के अभिनय के साथ ढिशुम ढिशुम कहने लगा.मैँ
बोला-"अरे हीरो तो पिट रहा,हीरो तो पिट रहा." तब वह फिर मुस्कराकर
बोला-"पिटा थोड़े ही हूँ.हीरो तो बाद मेँ मारता है."वह अपने नन्हें हाथों
की मुटठी बना कर मुझपे वार करने लगा.मैं मन ही मन मुस्कुराया....
समाज मेँ शिक्षा शिक्षण शिक्षक का क्षेत्र एक दायरे तक सीमित हो सकता है
लेकिन बालक के बालक के सर्वांगीण विकासार्थ ऐसा नहीं.बालकों के अन्दर जो
दायरे पनप रहे,दबाव जो पनप रहे वे टूटने ही चाहिये.चाहें वे कैसे भी
टूटें सिर्फ नैतिकता बनी रहे,बस.उस रात्रि ड्रम ......?!
चौथे दिन बालक ने उस रात का जो जिक्र किया,वह प्रस्तुत है-उन दिनों बरसात
के दिन थे.वह छत पर अपनी माँ के साथ सोया हुआ था.लेकिन ...?!
वह जो स्वपन देख रहा था,वह भयावह था और जब तेज बादलों की गरज एवं बिजली
की चमक हुई तो वह चौँक कर जाग गया.अंधेरी रात में वह अपने की अकेला पा कर
और डर गया.हल्की हल्की बूंदे पड़ने लगी थी.वह छत पर एक कोने मेँ जाकर
दीवार से सट कर खड़ा हो गया.जब उसका भींगना तेज हो गया तो वह फिर छत पर
पड़े एक ड्रम मेँ जा कर बैठ गया और ड्रम का ढक्कन नीचे कर ड्रम को बंद
करलिया.उस समय उसे इतनी सुधि न थी कि वह नीचे चला जाए.लेकिन नीचे कैसे
चला जाता?अकेले बांस की सीढ़ी चढ़ते ओर उतरते डर जो लगता था उसे.मैने पुष्प
को सीने से लगा लिया और बालक ध्रुव की कहानी का मैने यहाँ उपयोग किया.एक
दिन पुष्प बोला-"मोहल्ले मेँ मुझे एक बालक बहुत चिढ़ाता है."उसकी शिकायत
नहीं की? " "डर लगता है." "वह क्या कहता है?" "कभी पागल कहता है.कभी
डरपोक कहता है." "और क्या कहता है?" "जी,....."- वह चुप हो गया.
"जिसका जो कार्य है,वह करेगा.तुम्हारा क्या कार्य है?डरना!"
"न....ह.....! " "तो क्यो डरते हो?तुमको तो अच्छा बनना है.जो बुरा बनना
चाहे वही तो बुरा करेगा." "जी....! " "उससे कहना,मेरे सर हैं
न,वे.....!नहीँ(रुककर)उससे कहना मेरा ईश्वर है न वह सब जानता है.तू क्या
जाने कौन पागल है कौन डरपोंक?तू गलत कहेगा तो क्या ईश्वर खुश होगा?"
मुझे पुष्प से यही कहना चाहिए था कि कुछ और...? मैँ नहीं समझ पाया.मैं
अनेक प्रश्नों का जबाब शून्य में जा कर देता हूँ .मैं पुष्प को विचार
देना चहता था.एक दिन मैं विद्यालय नहीं गया.दूसरे दिन जब विद्यालय पहुंचा
तो पुष्प बोला-"आप कल नहीं आये थे.कल मेरे सिर में दर्द था.इंटरवेल मेँ
घर भी जाना था क्योंकि पापा के साथ शाहजहांपुर से दवायी लानी थी.""तो
मेरे न आने से क्या हो गया?""मैं इंटरवेल में पूछता किससे?छठी वेला में
पापा जी आकर ले गये.(रुक कर)घर पर पापा जी ने डांटा.कहा कि क्या आ नहीं
सकता था?"
एक दिन वह मुझसे बोला-"मेरे घर बड़ी बड़ी मूंछों वाले आते हैं,दाड़ी वाले
सरदार आते हैँ और पापा के संग शराब पीते हैं.रात में जाग जात हूँ तो मुजे
डर लगता है." "डर तो तब भागेगा जब तुम निडर बनोगे." "कैसे बनूँ?" "कैसे
बनो?"- और फिर मैं रुक गये.जमाने के प्रश्नों के सटीक उत्तर नहीं होते,जो
उत्तर होते हैं आवश्यक नहीं सामने के व्यक्ति को संतुष्ट कर सकेँ?
"देखो,ध्रुव की कहानी पता है.वह कहीं डरा.वह तो जंगल में तपस्या कर रहा
था.ईश्वर और प्रेम से बढ़कर इस जगत मेँ कुछ नही.जमाने की वस्तुओं से क्या
डरना?गुरु गोविन्द सिंह के पुत्रों की कहानी सुनी है,उन्हें तो मृत्यु से
भी डर नहीं लगा.किसके लिए डरें?यह शरीर हमारा थोड़े ही है,ईश्वर का
है,ईश्वर जाने.इसका मतलब यह नहीं कि हमेँ शरीर का ख्याल नहीं रखना."
मुझे नहीं पता था कि पुष्प ये सब समझ रहा है कि नहीं लेकिन मैं बोलता जा
रहा था.स्टाप के अन्य व्यक्तियों के साथ मैं पुष्प के घर जाता रहता
था.डायरेक्ट इनडायरेक्ट रुप मेँ मेरी बातों की ब्याख्या को पुष्प के माता
पिता को स्टाप के समझाते रहते थे.मेरा विचार रहा है कि बालकों पर बात बात
मेँ गुस्सा दिखाना बालकों के आत्मबल कमजोर करता है और बालक निरुत्साहित
होता है.तीन साल बाद मेरा पुवायां से नवाबगंज ट्रांसफर हो गया.जिस कारण
अब पुष्प हमसे दूर था.नवाबगंज पहुंचने के एक वर्ष बाद पुष्प की मां का
मेरे पास एक पत्र आया-"आप थे तो अच्छा लगता था.आप घर पर आते थे तो और
अच्छा लगता था.यह तो दुनिया है अब भी अच्छा लगता है,अन्यथा फिर आपका
शिष्य कैसे कहलाऊँगा?आपने कहा था कि सिर्फ ईश्वर अपना.आत्मा अपनी
है..पुष्प के कथन अपने शब्दों मेँ लिख रही हूँ.बचपन से अपने खिन्न पिता
की कठोर निर्दयी बातों को झेलझेल व पिट पिट...ऐसे में उसके अस्तित्व पर
बार बार चोटें .."

बुधवार, 17 अगस्त 2011

ASHOK BINDU : THAT IS...

मैं कालेज के आफिस मेँ बड़े बाबू के पास बैठा था.
"सात्विक हो जाना मानव के जीवन मेँ एक क्रान्तिकारी घटना है लेकिन है
कौन?"मैं खामोश हो मन ही मन सोंच रहा था.
"खानपान कैसा है?यह हमारे नजरिया पर निर्भर है."-बड़े बाबू बोले.
मैं सोंचने लगा था -"व्यक्ति के सात्विकता की पहचान क्या है?सिर्फ
शाकाहारी व दूध उत्पाद का सेवन करने वाला?यदि कोई शाकाहारी नहीं है लेकिन
वह मधुरता,उदारता,ईमानदारी,दया,सेवा,सत,आदि भाव में जीकर आचरण करता है वह
क्या सात्विक नहीं है?जो शाकाहारी भोजन करता है क्यों न वह
असत्य,अन्याय,शोषण,कष्ट,अपराध,आदि के लिए जीता हो?गायों ,बकरियों,आदि के
दूध पर उनके बच्चों का हक मार स्वयं इस्तेमाल करना क्या सात्विकता है?"
तीन व्यक्ति जब बड़े बाबू से मिलने आ गये ,जिनमेँ से एक थे-मुनीष पाल सिंह
;मैं आफिस से निकल कर बाहर आ गया.

मैं अब भी विचारों मेँ था-"हिंसा ,जबरदस्ती ,दूसरे के कर्त्तव्यों में
अवरोध ,आदि क्या सात्विक कर्म है?"

मैं फिजिक्स लैब में आकर बैठ गया था.जब अंग्रेजी प्रवक्ता पाण्डेय जी
साईकिल पर सवार होकर लैब के अन्दर ही आ पहुंचे तो मैने उनसे नमस्ते कर
दैनिक जागरण अखबार मांगा तो -"पहले बड़े गुरुजी के सामने रख दूँ फिर चाहें
वहां से उठा लेना."
कह कर वे अखबार लेकर प्रधानाचार्य कक्ष की ओर चल दिए तो मैं भी उनके
पीछे पीछे हो लिया.प्रधानाचार्य कक्ष मेँ प्रवेश से पहले ही शर्मा जी
अध्यापक ने उनसे अखबार ले लिया.

पाण्डेय जी मेरा चेहरा देखने लगे.


* * *
मै अपने कालेज जीवन की एक घटना में खो गया.
मेरे मकान पर कुछ वर्षों से तीन विद्यार्थी किराये पर रह रहे थे,जिनमेँ
से दो बहिने व एक दोनों का भाई था.मकान परिवर्तित करते वक्त वे एक थैली
मेँ रखा सामान भूल गये थे.तीन चार घण्टे बाद भाई मकान पर आ पहुंचा.दरबाजा
मैने ही खोला था.वह बोला था-"भैया,एक थैली यहीं भूल गया हूँ." मैँ बोला
था-"हां,है तो."

लेकिन-
जब वह अन्दर मेरे परिजनों के बीच गया तो -"कैसी थैली?कौन सी थैली?देख लो
कमरे मेँ....हमेँ तो कोई थैली नहीं मिली.."

"भैया भी कह रहे हैँ कि हाँ,है तो."

"तो देख ले जाकर कमरे मेँ.हम लोगों ने तो देखा नहीं.भाई तो पागल
है.हाँ,कूड़े भरी थैली जरुर कमरे मेँ एक कोने पर पड़ी थी."


मैं कक्षा पांच में था तभी से सोचना प्रारम्भ कर दिया था.यह दुनिया
मुझे भ्रम लगने लगी थी.कक्षा सात तक मेरे टीचर रहे थे-ठाकुर हरिपाल
सिंह.जिनकी बोध कथाएं हमेँ प्रेरणा देती रहीं थीं लेकिन दुनिया को सोचना
नहीं चाहिए यह मैं इण्टर क्लास के दौरान ओशो साहित्य से जाना.खैर सोंचना
मेरे जीवन का एक खास गुण हो गया.


मैं छत पर जा कर मेडिटेशन करने लगा था.

* * *

देश में आपातकाल लागू था.इस दौरान मेरा मुण्डन संस्कार हुआ.मुण्डन
संस्कार के दौरान हवन और बकरे की बलि...?!गांव मेँ रह रहे एक साधु जो कि
मेरे मुण्डन संस्कार के दौरान उपस्थित थे,को मैं भूल चुका था.अचानक एक
दिन जब मैं कक्षा सात का विद्यार्थी था,गांव में गांवपूजा के दौरान वे
मिल गये.
"बेटा,मैने तेरे मुण्डन संस्कार के दौरान बकरा बलि कारण पैदा हुई तेरी
परेशानी मेँ तुझे समझाया था कि तू जिन लोगों के बीच है उनसे काफी ऊपर उठ
कर है.मैं देख रहा हूँ तेरे खानदानी भक्ति से निकल कर संसारी हो रहे
हैं.तेरे रास्ते के रोढ़े ये तेरे खानदानी ही होगे और फिर इस दुनिया से
क्या उम्मीद रखना?तुझे अकेला नितान्त अकेला चलना पड़ेगा जीवन मेँ.तू सिर्फ
सेहत भजन व पढ़ाई पर ध्यान लगा आगे बढ़ सकता है.संसार में माया मोह लोभ से
नही. "

"बलि की परम्परा गलत है इसके खिलाफ मेरे पिता जी आये और भाई अनूप के
मुण्डन संस्कार मेँ बकरे की बलि नहीं चढ़ने दी लेकिन ये खानदानी अब कहते
है कि भाई अनूप फिर एक साल के अन्दर इस लिए मर गया कि......."


"जो कह रहे हैं कि बलि नहीं दी गयी इस लिए तेरा भाई मर गया वे धार्मिक
लोग नहीं हैं.हां जिन्दा भूतयोनि के हो सकते हैँ.देव योनि व इससे ऊपर की
शक्तियों को समर्पित व्यक्ति ऐसा नहीं कह सकते."


अशोक बिन्दु : यानि कि......

सन 1993ई के नवम्वर ! एस एस कालेज,शाहजहांपुर में साहित्यकार आकुल जी व
बाल साहित्यकार नागेश पाण्डेय 'संजय' से मुलाकात हुई.यहीं मेरा उप नाम
रखा गया -अशोक बिन्दु.इसके साथ जुड़ चुका था एक स्वपन.
सन 2008ई के आते आते वह स्वपन चकनाचूर.उस स्वपन के अनुकूल परिस्थितियां
बनी थीं लेकिन फायदा न उठा पाया.अबसर को पकड़ न पाया.

मैं लिखता क्यों हूँ?


कुछ लोगों को मेरे लिखने से शिकायत रही है.जब मैं पूछता हूं लोग क्यों
लिखते है?तो इसका उत्तर उनके पास नहीं होता.


मैं कौन हूँ ....?

हम क्या अपने से परिचित हैं?हम क्या हडडी मांस का बना शरीर हैं?मनुष्य
अपने अनेक जन्म अपने स्थूल शरीर के लिए गंवा देता है.मनुष्य के शरीर को
चार भागों मेँ बांट सकते हैं-स्थूल,भाव,सूक्ष्म,मनस.आत्मा इन चारों के
ऊपर है.मनुष्य जिन्दगी भर सिर्फ स्थूल शरीर में गंवा देता है.रोटी,कपड़ा,
मकान,सेक्स,आदि का सम्बन्ध स्थूल शरीर से है.इलाज भी कर रहे हैं तो
सिर्फ अपने शरीर का,जो हमारे सम्पूर्ण ब्यक्तित्व का सिर्फ सातवां भाग
है.हमारा ब्यक्तित्व मन ,बुद्धि ,भावनाएं, आत्मा ,देवत्व,ब्रह्म,आदि से
मिल कर बनता है.हमारे दुख व रोगों का कारण यह है कि हमने नगेटिव व पाजटिव
में साम्य स्थापित नहीं किया.हमने अपने अन्दर स्व इच्छाएं तो पाल लीं
लेकिन पर इच्छाएं नहीं पालीं,हमने अपने अन्दर द्वेष तो पाल लिया लेकिन
प्रेम न पाला,हमने अपने अन्दर खिन्नता तो पाल ली लेकिन नम्रता न
पाली.....हम जिन्दगी जीते जी मौत के करीब आ जाते हैं लेकिन माया मोह लोभ
से मुक्त नहीं हो पाते.मिठाई पर चिपकी मक्खियों की तरह हो जाते हैं
हम.हमारी कोई मानसिक तैयारी नहीं होती संसार से जाने की.शरीर कष्टों व
नगेटिव मन के शिकार हुए ही प्राण त्याग देते हैँ .शान्ति व सुकून मेँ
मरने की कला से हम अन्जान होते है क्योंकि हम खुद को न जाने.

रविवार, 14 अगस्त 2011

सन 1947ई की स्वतन्त्रता के मायने...?

अच्छा है देश की कुछ संस्थाएं प्रतिवर्ष 15अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस मनाती है.इस अवसर पर देश के कितने प्रतिशत नागरिक वास्तव में उत्साहित होते हैं इस पर चर्चा बाद मेँ कभी करेंगे.हमें कागजी घोड़े दौड़ाने , भाषणबाजी व कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों से हट कर सन1947ई से लेकर अब तक के प्रत्येक पहलुओं पर ईमानदारी से विश्लेषण आवश्यक है.समाज मेँ प्रयोग किये जाने वाले अनेक शब्दों की तरह 'स्वतन्त्रता' शब्द के मायने अधिकतर लोग नहीं जानते. आम आदमी अभी किस दृष्टि से स्वतन्त्र है?हमें तो यही लगता है कि आम आदमी अभी स्वतन्त्रता से काफी दूर है?अपराधियों,रिश्बतखोरियों,मिलावटखोरों,दहेज एक्ट दुर्पयोगियों,आदि के खिलाफ देश मेँ शासन प्रशासन ही साहस के साथ खड़ा नहीं हो पा रहा है.दुनिया मेँ लगातार मैसेज जा रहा है भारत में सरकारें भ्रष्टाचार के खिलाफ ही कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहती है.देश की आजादी की नींव ही भ्रष्टाचार पर खड़ी हुई है.जिसके लिए पूर्णतया नेहरु दोषी हैँ.सरस्वती कुमार,दादूपुर,वाराणसी का कहना है कि ...इस परिवार के लोगों को अपने नाम के आगे गांधी शब्द लिखना सबसे बड़ा धोखा है.पूंजीवाद व सत्तावाद देश को लूटे.

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मंगलवार, 9 अगस्त 2011

व्यक्ति निर्माण : मातापिता व शिक्षक

मातापिता व प्राईमरी शिक्षक का व्यक्तिनिर्माण मेँ महत्वपूर्ण स्थान होता है .यही बालक में समृद्ध नजरिया बनाने मेँ सहायक होते हैँ. भौतिक अभाव के बीच भी माता पिता को परिवार का वातावरण शान्तिपूर्ण,प्रेमयुक्त,परस्पर सहयोगी बनाये रखते देखा गया है.सभी संसाधनों से युक्त परिवार में तक माता पिता शान्ति प्रेम का वातावरण बनाये रखने मेँ असफल हैं.बस,सब नजरिया व सोंच का खेल है.जहां दूसरे के लिए त्याग व समर्पण की भावना नहीं होती ,एक दूसरे के दुख दर्द को समझने की समझ नहीं होती वे परिवार को क्या चलायेंगे?केवल रोटी कपड़ा मकान ही काफी नहीं है.


माता पिता के बाद व्यक्ति निर्माण में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है .विशेष कर प्राईमरी शिक्षक की.समाज व इन्सान इन्सान के बीच स्वस्थ सम्बन्धों प्रति नजरिया प्राईमरी ऐजुकेशन से ही बनना प्रारम्भ हो जाता है.


दोष हमेशा नई पीड़ी को दिया जाता है लेकिन दोषी पुरानी पीड़ी होती है या सब विधाता का खेल .माता पिता चाचा चाची आदि बुजुर्गों व अन्य के साथ जैसा व्यवहार करते हैं उसका प्रभाव नई पीड़ी पर जरुर पड़ता है .वैसी ही आदते बनती हैं व समझ पैदा होती है .

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शनिवार, 7 मई 2011

अपना पराया!

कौन है अपना कौन है पराया,

इसको मैं समझ न पाया..

जिसने खुशियों को रौंदा

जिसने शौकों को तोड़ा

उत्साह जिसने मारा,

वो नहीं अपना है वो पराया..

ग्रन्थों की बातें हैं झूठी

या इन अपनों की बातें ?


इन अपनों की बातों से उलझे

ग्रन्थों की बातों से सुलझे;

आत्म ज्ञान ने किया सबेरा,


जिसने माया मोह में फंसाया,

वो है अपना या है पराया..


जिन्होने की ग्रन्थों की बातें

उन्हें मात पिता ने भी झुठलाया

पत्नियां भी ऐसे में न अपनी

धर्म पथ पर खुद को अकेला पाया,


कौन है अपना कौन पराया..

रामानुजन गणित का दीवाना

मात पिता ने ही उसे पागल समझा


कैम्ब्रिज जा नाम कमाया

वहाँ सम्मान वहाँ अपनपन पाया

कौन है अपना कौन पराया..

अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

शनिवार, 26 मार्च 2011

सनातन यात्रा का एक पड़��व-मुसलमान !

धर्म व अध्यात्म प्राणियों के बीच द्वेष व मतभेद नहीं रखता.हम हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य,सेवा व दया भाव का जिक्र सभी जगह पर मिलता है.मन्दिर, मस्जिद, आदि धर्मस्थल व सम्प्रदाय ,आदि तो सनातन यात्रा के विभिन्न स्तरोँ ,चक्र,लतीफ,system,आदि के आधार पर पड़ाव है,हमारे अन्तस्थ धर्म के.


जन्म के बाद
इस संसार मे अन्तस्थ यात्रा का पहला पड़ाव है-स्थूल,मूलाधार चक्र अर्थात reproductory.हमे लगता है अधिकतर लोग इसी स्तर पर आकर रुक गये हैँ.शहद के बर्तन मेँ चिपकी मधुमक्खी की तरह हो गये हैं,जो चिपक मे ही आनन्दित हो भूत व नरकीय योनि की सम्भावनाओं मेँ जी रहे है.'लतीफा-ए-उम्मुद-दिमाग 'अर्थात सहस्राधार चक्र तक की यात्रा का ख्वाब तक नहीं रखते .इनमे से कुछ यल्ह अर्थात अल्हा का अपने भौतिक दुखों व भौतिक लालसाओं के कारण स्मरण संसार की निर्जीव वस्तुओं से निर्मित चित्रों, मूर्तियों, मजारों ,मजहब- स्थलों ,आदि में उलझ कर रह जाते है. वे यह नहीं जानते कि आत्मसाक्षात्कार के बिना हम यल्ह तक नहीं पहुंच सकते.




इससे हट कर अपने ईमान पर पक्का होना क्या गलत है?मुसलमान का अर्थ क्या है ?अपने ईमान पर पक्का होना न ! क्षेत्रीयता(हिन्दू शब्द की शाब्दिक परिभाषा में जायें) ,जाति,छुआ छूत,मजहब स्थलों,सम्प्रदाय,मूर्तियां,आदि से ऊपर उठ कर इन्सानियत,दया,सेवा,आत्म साक्षात्कार,अपने पराये भाव से मुक्ति,नमाज (सूर्य नमस्कार) ,दान,हज,आदि के माध्यम से यल्ह अर्थात ईश्वर तक पहुंच सकते हैं.



सऊदी अरब की मक्का मस्जिद के इमाम ए हरम शेख अब्दुर रहमान बिन अब्दुल अजीज अल सुदेस ने कहा कि दुनिया को इस वक्त अमन की सर्वाधिक दरकार है.इसी रास्ते पर चल कर इंसानियत महफूज रह सकती है.अमन की पहल मुसलमान करें.



वास्तव में जो अपने ईमान पर पक्का है ,वही दुनिया में अमन चैन व बसुधैव कुटुम्बकम की बात कर सकता है.तमाम मुल्कों के शरहदों को नकारते हुए दुनिया के इन्सान की हिफाजत की बात वही सोंच सकता है जो अपने ईमान पर पक्का है.हमे इस पर चिन्तन करना चाहिए कि तमाम मुल्कों की शरहदें आम आदमी के लिए खोल देनी चाहिए.शरहदें सिर्फ प्रशासनिक हों.



सच्चे मुसलमान थे मोहम्मद साहब लेकिन उनके गुजर जाने बाद सनातन यात्रा मेँ रुकावट आ गयी .इसके बाद मुस्लिम सम्प्राय तो बढ़ा लेकिन सनातन धर्म के यात्रा में रुकावट आ गयी.समूर्ण इंसानिय त के स्थान गुट,मस्जिद ,मजारों,आदि पर इनके अनुयायी भी आ टिके.अन्तर्यात्रा में रुकावट आ गयी.




दुनिया मे हमे एक ऐसा मंच चाहिए जहाँ गैरमुसलमानों का भी अपना दर्जा हो.हम आगे बढ़ गये है,अगले पड़ावों की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम निचले पड़ाव पर खड़े व्यक्तियों को वक्त न देँ. जो अ, आ ,इ ,ई,......ध्वनियां सीखने के लिए अमरुद,आम,इमली,ईख,.......आदि में उलझे हैं ,उनका हम विरोध भी नहीं कर सकते.




बरेली,उप्र में प्रस्तावित श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी) से 20 दिसम्बर 2010ई0 को मुलाकात हुई,सब कुछ ठीक था.ईमान पर पक्के होने की बात उनमें थी ,वहां ओम तत् सत् की बात थी.लेकिन हम चित्रों ,मूर्तियोँ ,धर्म स्थलों ,आदि मेँ क्यों उलझें ?लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि बच्चों को काफिर कह उनसे द्वेष रखें.हाँ,वे अभी बच्चे ही हैं जो कि चित्रों ,मूर्तियों, मजारोँ ,धर्म स्थलों ,आदि में उलझे हैं,उनसे मुख मोड़ लें. उन्हें भी प्रेम व स्नेह दो .इसका फायदा भविष्य में हो सकता हैँ.चलो ,यह तो है कि वे ईश्वर को याद तो कर रहे है.शायद भविष्य मेँ वे शेष अगली यात्रा तय कर सकें?



इन दिनों यहां मीरानपुर कटरा में महान प्रसिद्ध सूफी संत हजरत सैय्यद दूल्हा मियां कलीमी व हजरत सैय्यद मसरुर मियां कलीमी का 23मार्च से सालाना उर्स चल रहा है.जहां बंगाल ,बिहार ,कलकत्ता ,मुम्बई ,दिल्ली सहित तमाम प्रान्तों से हजारों की संख्या में जायरीनों का आना चालू है.जिसके इन्तजाम में कुछ गैरमुस्लिम भी लगे हैं.सम्पूर्ण व्यवस्था प्रमुख रूप से दरगाह मुतावल्ली हजरत सैय्यद मसूद अहमद कलीमी देख रहे हैं.बंगाल के कुछ जायरीन से मैने मुलाकात की ,उन्होने माना कि दुनिया के तमाम मजहब तो रास्ता हैं जो इंसान को सनातन धर्म की यात्रा पर डालते हैं.दोष तो इंसान में होते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार को न पकड़ संसार की निर्जीव वस्तुओं के सहारे आगे की यात्रा न तय कर निर्जीव वस्तुओं या संसार में उलझ कर रह जाते हैं और आगे की यात्रा तय न कर खुदा से सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते.



ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



miranpur katra,

shahjahanpur,U.P.

गुरुवार, 24 मार्च 2011

गांधीवादी के जुबान पर शिवाजी ....?

गांधीवादी के मुँह से यह बात कि गांधी नहीं शिवा जी के रास्ते से दूर होगा भ्रष्टाचार !



लोगों को आश्चर्य है कि जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने कहा भ्रष्टाचार का समूल नाश करने का उनका उद्देश्य महात्मा गांधी के विचारो के रास्ते पर चल कर पूरा नही होगा बल्कि इसके लिए मराठा राजा शिवा जी के मार्ग का अनुसरण करना पड़ेगा.




'भय बिन होय न प्रीति' पर मै विश्वास नहीं रखता , लेकिन यह भी सत्य है कि कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ हर समय ऐसा भय आवश्यक है जो कि व्यक्ति को अनुशासन व मानवता मे बाँधे रखे.इसके साथ ही हर वक्त व्यक्ति को सत्संग मे रखना भी अनिवार्य है.हर व्यक्ति के अन्दर हर वक्त सत्संग चलता रहना चाहिए न कि तम्संग.मन का आदर्श होना आवश्यक है.इस लिए देश मे हर वक्त वार्ड स्तर पर ऐसी समितियों का गठन होना चाहिए जिसके सदस्यों के एक हाथ मे तलवार व दूसरे हाथ दर्शन शास्त्र हों.प्रबन्धन व व्यवस्थाओं के प्रति हर वक्त वर्तमान मे शिवा जी व गुरु गोविन्द सिँह जैसे व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है. क्योकि व्यक्ति या तो भय मे अनुशासित रहना चाहता है या भयहीनता मे मनमानी आदि व ईमानदार व सीधे साधों को सनकी दीवाना आदि कह कर उनको उपेक्षित रखता है.व्यक्ति या तो शोषित होता है या शोषण करता है ,तटस्थ रहने वालो से शोषणहीन व न्यायवादी प्रबन्धन व व्यवस्था नहीं बनती.बुद्ध व गांधी जैसे कौन हो सकते हैं?आज के बुद्धों से अंगुलिमान शान्त नहीं होते वरन भड़कते हैं. और फिर अकेला बुद्ध या गांधी एक साथ पूरे तन्त्र में सुधार नहीं कर सकता.इसके लिए उनके साथ एक तन्त्र ही हो.एक एक कर बुद्ध कितने अंगुलिमानों को बदल सकता है?यदि पचास साल उसकी सक्रियता मानी जाए तो 36500 व्यक्तियों को शायद अपने जीवन मे सुधार पाये.व्यक्ति को तो सुधार सकता है,पूरी की पूरी भीड़ को सुधारने के लिए भीड़ ही चाहिए.उस भीड़ को सुधारने के लिए जिस पर सिर्फ बातों का असर नहीं पड़ता.हमारे यहां एक कहावत है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते.हमने देखा है कि दबाव मे आकर ही लोग अच्छा कार्य करने के लिए तैयार होते हैं ,ऐसे लोग वास्तव मे असभ्य होते ही है.हाँ,अभी अस्सी प्रतिशत लोग असभ्य है.जो कि कायर, मूर्ख व अज्ञानी है.जिनके बीच मे वे बेहतर होते है जो कि इनके ऊपर धन बल आदि से अपना दबाव बनाए रखते हैं.शेष के सामने यही मनमानी दिखाते फिरते हैं और इन शेष व्यक्तियों को असफल कायर सनकी आदि कहते फिरते है.हालांकि यह शेष व्यक्ति अपने स्थान(ईमानदार, अनुशासित, सौम्य,आदि वातावरण में)सम्मानित होते है. ऐसे मे निन्यानवे प्रतिशत असभ्य समाज मे हर वक्त शिवा जी की आवश्यकता होती है.अन्ना हजारे का कहना ठीक है,गांधी नहीं शिवा जी के रास्ते की आवश्यकता है.वर्तमान प्रबन्धन व न्याय व्यवस्था मेँ गांधी असफल हो जाते है. वे व्यक्ति मेँ उदारता व मानवता लाने के ही कुशल प्रशिक्षक हो सकते है सिर्फ.वे राम रहीम के बटवारे के बीच जिद्दी रहीम को राम के हिस्से का भी टुकड़ा देकर रहीम को सिर्फ शान्त कर सकते है लेकिन त्याग व संयम का पाठ सिर्फ राम को सिखा सकते है लेकिन रहीम को नहीँ.

बुधवार, 23 मार्च 2011

23मार्च 'शहीदी दिवस 'पर भ्रष्टाचार व काले धन ��े खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान !

बताया जा रहा है कि 400लाख करोड़ रुपये काला धन के रुप मे विदेश मे जमा है. यदि यह धन भारत आ जाए तो देश की स्थिति क्या होगी ?



देश के अन्दर 6लाख38हजार 365 गाँव हैँ .यदि कैस भी यह काला धन भारत आ जाए और प्रत्येक गाँव को एक एक करोड़ ही रुपया दे दिया जाए तो गाँव का विकास सम्भव हो जाएगा.वापस आये इस काले धन से प्रत्येक गरीब परिवार के नाम पर अर्द्धसरकारी उपक्रम,कुटीर लघु उद्योग,आदि स्थापित कर भारत को पुन:सोने की चिड़िया बनाया जा सकता है.



स्वामी रामदेव व उनके सहयोगियों के इस अभियान मे यदि देश के नागरिक सहयोग नही करते है तो यह भविष्य मे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए सवसे बड़ा अफसोस होगा.


प्रत्येक नागरिक को इस अभियान प्रति समर्पित होना ही चाहिए.एक बार जय गुरुदेव व उनके शिष्य राजनीति मे कोशिस कर चुके हैं लेकिन क्या हुआ?जब मैं स्वामी रामदेव के अभियान की बात करता हूँ तो लोग कहते है कि देश के कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई मे कोई रुचि न रख कर अब भी गुलामी मानसिकता पर चोट करनी होगी लेकिन वह चोट ऐसी हो कि आम आदमी उल्टा हमारे खिलाफ ही न हो जाए.



देश की जनता जाति,मजहब,क्षेत्रवाद व अन्य संकीर्णताओं मे अब भी उलझी है. अब भी वह चन्द् लोभ मे आ कर अपने वोट का सौदा कर बैठती है. इस पर स्वामी रामदेव बाबा को विचार करना चाहिए.बिना त्याग समर्पण के अभियान तेज होने वाला नहीँ. मै लोगो से स्वामी रामदेव बाबा के अभियान मे सहयोग की बात करता हूँ तो वे अपनी मजबूरियाँ गिना देते हैं.अपनी मजबूरियाँ गिनाने वाला कभी भी देश ,धर्म व कर्त्तव्य प्रति सजग नहीं हो सकता है.उसको झकझोरने के लिए काफी ओज चाहिए.जो विभिन्न संकीर्णताओं को बहा ले जाए .


हर कोई देश मे भगत सिह तो चाहता है लेकिन अपने घर मे नही . सभी गाण्डीव रखे अर्जुन की तरह माया मोह मे फँसे हुए है.



समाचार पत्रों ने आज प्रकाशित किया-'आज से शुरु होगा जाटों का गुरिल्ला आन्दोलन . 'देश का प्रजातन्त्र अब भी भीड़तन्त्र व स्वार्थतन्त्र के रुप में
विराजमान है.जिसका वोट की राजनीति पक्ष लेती दिखती है.ऐसे मे देश के हित मे कठोर निर्णयों के लिए जनता को एक मत करना बड़ा मुश्किल काम है.



आज 23मार्च !


आज के ही दिन सन 1931 ई0 में भगत सिंह ,राजगुरु व सुखदेव,आदि जैसे क्रान्तिकारियों की लड़ाई भी कुप्रबन्धन के खिलाफ थी न कि सिर्फ ब्रिटिश शासन के खिलाफ ही.देश मेँ अब भी कुप्रबन्धन के खिलाफ अनेक शहादतों की आवश्यकता है.इस नजरिये के साथ जब तक हम भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान में नहीं जुड़ते तब तक हम भावी पीढियों के लिए प्रेरणा स्रोत व मार्ग दर्शक नहीं बन सकते.इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग होना आवश्यक है.




ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



A.B.V.INTER COLLDGE,


MIRANPUR KATRA,


SHAHJAHANPUR,

U.P.

23मार्च 'शहीदी दिवस 'पर भ्रष्टाचार व काले धन ��े खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान !

बताया जा रहा है कि 400लाख करोड़ रुपये काला धन के रुप मे विदेश मे जमा है. यदि यह धन भारत आ जाए तो देश की स्थिति क्या होगी ?



देश के अन्दर 6लाख38हजार 365 गाँव हैँ .यदि कैस भी यह काला धन भारत आ जाए और प्रत्येक गाँव को एक एक करोड़ ही रुपया दे दिया जाए तो गाँव का विकास सम्भव हो जाएगा.वापस आये इस काले धन से प्रत्येक गरीब परिवार के नाम पर अर्द्धसरकारी उपक्रम,कुटीर लघु उद्योग,आदि स्थापित कर भारत को पुन:सोने की चिड़िया बनाया जा सकता है.



स्वामी रामदेव व उनके सहयोगियों के इस अभियान मे यदि देश के नागरिक सहयोग नही करते है तो यह भविष्य मे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए सवसे बड़ा अफसोस होगा.


प्रत्येक नागरिक को इस अभियान प्रति समर्पित होना ही चाहिए.एक बार जय गुरुदेव व उनके शिष्य राजनीति मे कोशिस कर चुके हैं लेकिन क्या हुआ?जब मैं स्वामी रामदेव के अभियान की बात करता हूँ तो लोग कहते है कि देश के कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई मे कोई रुचि न रख कर अब भी गुलामी मानसिकता पर चोट करनी होगी लेकिन वह चोट ऐसी हो कि आम आदमी उल्टा हमारे खिलाफ ही न हो जाए.



देश की जनता जाति,मजहब,क्षेत्रवाद व अन्य संकीर्णताओं मे अब भी उलझी है. अब भी वह चन्द् लोभ मे आ कर अपने वोट का सौदा कर बैठती है. इस पर स्वामी रामदेव बाबा को विचार करना चाहिए.बिना त्याग समर्पण के अभियान तेज होने वाला नहीँ. मै लोगो से स्वामी रामदेव बाबा के अभियान मे सहयोग की बात करता हूँ तो वे अपनी मजबूरियाँ गिना देते हैं.अपनी मजबूरियाँ गिनाने वाला कभी भी देश ,धर्म व कर्त्तव्य प्रति सजग नहीं हो सकता है.उसको झकझोरने के लिए काफी ओज चाहिए.जो विभिन्न संकीर्णताओं को बहा ले जाए .


हर कोई देश मे भगत सिह तो चाहता है लेकिन अपने घर मे नही . सभी गाण्डीव रखे अर्जुन की तरह माया मोह मे फँसे हुए है.



समाचार पत्रों ने आज प्रकाशित किया-'आज से शुरु होगा जाटों का गुरिल्ला आन्दोलन . 'देश का प्रजातन्त्र अब भी भीड़तन्त्र व स्वार्थतन्त्र के रुप में
विराजमान है.जिसका वोट की राजनीति पक्ष लेती दिखती है.ऐसे मे देश के हित मे कठोर निर्णयों के लिए जनता को एक मत करना बड़ा मुश्किल काम है.



आज 23मार्च !


आज के ही दिन सन 1931 ई0 में भगत सिंह ,राजगुरु व सुखदेव,आदि जैसे क्रान्तिकारियों की लड़ाई भी कुप्रबन्धन के खिलाफ थी न कि सिर्फ ब्रिटिश शासन के खिलाफ ही.देश मेँ अब भी कुप्रबन्धन के खिलाफ अनेक शहादतों की आवश्यकता है.इस नजरिये के साथ जब तक हम भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान में नहीं जुड़ते तब तक हम भावी पीढियों के लिए प्रेरणा स्रोत व मार्ग दर्शक नहीं बन सकते.इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग होना आवश्यक है.




ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



A.B.V.INTER COLLDGE,


MIRANPUR KATRA,


SHAHJAHANPUR,

U.P.

मंगलवार, 22 मार्च 2011

अपना कर्त्तव्य क्यों निभाएं ?

जानते नही कलियुग है? ईमानदारी पर उतर आये तो रोटी मिलना भी मुश्किल हो जाएगी.हम कर्त्तव्य का पालन क्यो करे?आज कल तो सुविधाजनक व अवसरवादिता है वही ठीक है. धन्य ,आज के व्यक्ति की सोच!!




सुप्रीम कोर्ट दो बार कह चुका है कि कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के लिए हर व्यक्ति दोषी है ?इसका मतलब मेरी दृष्टि मे यह है कि हर व्यक्ति के जागरुक हुए बिना देश मे दीर्घ कालीन परिवर्तन सम्भव नहीं .हर समस्या की जड़ है-मन .

मन मे सृजनात्मक सोच पैदा हुए बिना दूरगामी परिवर्तन सम्भव नही है.न जान कितनी क्रान्तियां हुईं लेकिन उसका प्रभाव कब तक पड़ा?अंगुलिमानों को बुद्ध ही बदल सकते हैं सेना व पब्लिक नहीं.क्रान्ति की तो हर पल आवश्यकता होती है .



* हम क्यो न निभाए अपना कर्त्तव्य ? *



अपने कर्त्तव्योँ का क्रान्ति से घनिष्ट सम्बन्ध होता है.शास्त्रों ने व्यक्ति के तीन कर्त्तव्य कहे हैं - अपने , परिवार व समाज प्रति कर्त्तव्य . आखिर हम अपने कर्त्तव्य क्यों न निभाएं?दुनिया मे सभी एक जैसे नही हो सकते . हम अपना कर्त्तव्य न निभा कर भावी पीढी के मार्गदर्शक व प्रेरणास्रोत तभी हो सकते हैं जब हम ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का पालन करेंगे . इसके लिए हमे संघर्ष व त्याग करना ही पड़ेगा.


यहाँ पर मुझे श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ , नाथ नगरी , बरेली (उ प्र) के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी)के कहे शब्द याद आ जाते है कि एक रोज मेरे जाने का वक्त आयेगा और चला जाऊंगा छोड़कर तुम्हारी दुनिया,जिसमे तुम अपने अहंकार के वजूद को जीवित रखना चाहते हो.मगर फिर भी मुझे किसी से कोई शिकवा या गिला नहीं है,और न ही नफरत है लेकिन अहंकार मेरा परमशत्रु है............. परन्तु यह परिवर्तन की विचारधारा गंगा की निर्मल धारा की तरह अनवरत बहती रहेगी और मनुष्य युगों युगोँ तक परिवर्तन के इन प्रयासों को सफल बनाने के लिए कार्य करते रहेंगे.वर्तमान युग ने जहां हमें ओशो जैसा श्रेष्ठ व्याख्याकार दिया है वहीं दूसरी ओर आचार्य श्रीराम शर्मा जैसा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद व यज्ञपेथी का श्रीगणेशकर्ता , श्री श्रीरविशंकर जैसा आर्ट आफ लीविंग का विस्तार जयगुरुदेव जैसा सन्त , अन्ना हजारे जैसा परिवर्तनकर्ता ,डा ए पी जे अब्दुल कलाम जैसा आदर्श पुरुष .....और भी न जाने कितने नाम.इन सब से हट कर इन तेरह साल मेँ एक और हस्ती उभर कर आ रही है ,जिस हस्ती का नाम है - योगगुरु स्वामी रामदेव. कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी को बिगुल बजाना ही था.


हमारा एक ख्वाब था -विभिन्न जातियोँ सम्प्दायोँ के देशभक्त व समाजसेवियों,सन्तोँ को एक मंच पर लाना.क्या यह कार्य योगगुरु स्वामी रामदेव के द्वारा सम्भव नहीं है?आप को इस सम्बन्द्ध मे जयगुरुदेव ,आदि से भी बात करनी चाहिए .वैसे हमे उम्मीद है कि वक्त आने पर वह भी स्वामी रामदेव के मिशन के साथ आयेंगे.श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ, नाथ नगरी ,बरेली (उप्र )के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह(भैया जी) से भी निवेदन है कि वे स्वामी रामदेव जी के मिशन मे सहयोग करने की कृपा करें.आपका यह मिशन हर देश भक्त का मिशन होना चाहिए.




*स्वामी रामदेव जी जरा मेरी भी सुनिए*


अपने मिशन में इण्डिया के स्थान पर भारत नामकरण,नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु सम्बन्धी दस्तावेज,अमेरीका मेँ ओशो को दिया गया थेलियम जहर व व्यवहार,मुसलमानो को साथ ले कर भारत ,पाकिस्तान बांग्ला देश व अन्य सार्क देशों को लेकर एक मुद्रा ,एक सेना ,एक संघीय सरकार,भावी विश्व सरकार ,आदि पर भावी योजना को अपने मिशन मे प्रतीक्षा सूची मे डालने की कृपा करें.


ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



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गुरुवार, 17 मार्च 2011

जापान त्रासदी: ऐ मनुज ���ब भी वक्त है सुधरने क��.

वैज्ञानिको का कहना है कि दुनिया छठे प्रलय काल मे जी रही है जिसके लिए मनुष्य को दोषी माना जाएगा.17-18वीं सदी से पूर्व यह धारणा थी कि प्रकृति को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए.अपनी स्थूल हरकतोँ से प्रकृति में अतिदखल असहज व प्राकृतिकाहितकारक है.प्रकृति पर हावी न होकर तटस्थ रहना आवश्यक है हालांकि सभी प्राचीन सभ्य ताएं प्राकृतिक शक्तियों के सम्मान को निर्देशित करती है.हमारा शरीर पांच तत्वोँ-पृथ्वी,अग्नि,जल,वायु व आकाश से बना है,जिसके साथ दखलनदाजी का मतलब है विभिन्न शरीरों को प्रभावित करना.प्रकृति के प्रति उदारहीन व भोगवादी भाव ने आज पृथ्वी को यहां तक ला कर खड़ा कर दिया है.प्रकृति को देख कर भोग की दृष्टि पैदा होना या मन गीला कर उदारता व सम्मान मिटा प्रभावित हो जाना या कामुकार्षण पैदा कर लेना प्रेत व नर्क योनि की सम्भावनाएं है.



प्रकृति पर कृत्रिम ताएं थोपने का परिणाम तुरन्त या कुछ पीड़ियों तक के लिए तो मानव के लिए आरामदायक व बिलासतापूर्ण जरुर हो सकता है लेकिन प्रकृति में दूरगामी परिणाम घातक हुए हैँ.वास्तव में देखा जाए तो पश्चिम का कोरा भौतिकवाद युक्त विज्ञान दुनिया का भला नहीं कर सकता,हमे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद से अपना व प्रकृति का भला मिल सकता है.दुनिया के पर्यावरणविद् न जाने क्या क्या कहते रहे हैं लेकिन उनकी बातों को अपनी भोगवादी सोंच के सामने दुत्कार देना
सत्ताओं ,पूंजीपतियों व भोगवादियों के लिए गरिमामय लगता रहा. अब भी वक्त है सुधर जाओ , अन्यथा धरती पर जीवन का जीवन ही खतरे मे पड़ जाएगा.लेकिन वास्तव मे मानव काफी गिर चुका है वह भय या दबाव मे तो अनुशासित व संयमित जीवन जीने के लिए तैयार है लेकिन रोजमर्रे की जिन्दगी मे जिन्दा लाश मेँ प्रेत योनि मे ही जी कर वह देवयोनि के व्यक्ति की खामोशी ,सादगी, न्यूनतम भोगी ,आदि को देख कर सिर्फ नुक्ताचीनी ,मजाक उपेक्षा ,आदि का व्यवहार करता है व भौतिकवाद तथा कृत्रिमताओं को सभ्यता का पर्याय मानता है. वास्तव मे यह सनातन धर्म से भटके लोग होते हैं.यह विकास के नाम पर प्रकृति व भूमि की सहजता मिटा कंकरीट, पत्थर आदि से मन्दिर मस्जिद ,मकान आदि खड़े कर सकते है लेकिन ... ..सनातन संस्कृति में जिस प्रकृतिसहचर्य की बात की गयी है व आश्रम व्यवस्था की गयी है,वह ही निरन्तर होनी चाहिए थी.वैदिकता मे हर समस्या का निदान था .भोगवाद ने हमे आज यहां आ पटका,तो दुख काहे का?धरती पर होगा वही,जिसके कारण पहले से उपस्थित हैं.उस पर दुखी होना मूर्खता है.जापान मे जो हो रहा है उसे कौन करणीय सीख लेना चाहेगा?दुनिया का वैदिकता ही भला कर सकती है,अफसोस उससे आज हिन्दू ही काफी दूर जा चुका है.दुनिया का भविष्य क्या किसी मुसलमान(ईमान जिसका मजबूत हो व निर्गुण हो) के हाथ होगा...?


ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



बुधवार, 16 मार्च 2011

शाम भयो श्याम न आयो

शाम भयो श्याम न आयो ,श्याम न आयो


यमुना किनारे यमुना किनारे


अँखिया रे प्यासी दर्शन को

श्याम न आयो

श्याम भयो श्याम न आयो........


बड़ी भक्तन की पंक्ति

हृदयाँगन मे लो है जलती.


यमुना भयी रे फिर से कलुषित


श्याम न आयो मगर श्याम न आयो.



गोपियों से खेलन की मति कौन समझायो


मेरो बासुरी वालो कन्हेया

कभी गाय भी चरायो,


कायर जमाने को भी तू रे जगायो


शाम भयो अब फिर तू रे आयो.



रिश्तो को भी त्यागन की बात कह डारो


महानताओ के सामने रिश्तो को का विचारो.

गुरु तेगबहादुर गोविन्द ने घर ही लुटायो


तेरे सिवा इसका राज कौन समझायो.


लाशो पे रोने वाले है कायर


ये तो तू ही तो अर्जुन को समझायो.

फिर से कन्हैया तू आ जायो



शाम भयो श्याम न आयो......

खामोशी मे जीते रहे थे.....

मेरी मईयत पे वो फूल चढ़ाने न आये


और तो आये मगर वो न आये.



ये जिन्दगी जीती रही थी हर पल उनके लिए


उन्हे क्या पता हम जीते रहे उनके लिए.


मेरी हर श्वासो मेरी हर धड़कन वो बसने लगे थे


मगर थे खामोश तुम चुपचाप जीते रहे उनके लिए.



वो खोजते रहे थे कौन वो शख्स है जो


मेरी मददगार है पर्दे के पीछे से.


खामोश अब भी हूँ मगर दिल मे तूफां लिए


मेरी मईयत पे......



देखो मेरी अर्थी उठी जिसे ले चले यार मेरे


उनके मकां के सामने से ही देखो मेरी अर्थी गुजरे.



इक पल देखा उन्होने झरोखे से


हवा का जो झोका आया उसे वे क्या समझे.



न समझा था जताना सिर्फ महसूस करते थे


न समझा था पाना खोते रहे थे.


उनकी ख्वाईशों के लिए खामोशी मे जीते रहे थे



खामोशी मे जीते रहे थे खामोशी मे जीते रहे थे.



( bindusar kautily ki dayari se)


मंगलवार, 15 मार्च 2011

जिसपे न कोई पथिक अब यह���ँ

सुकुन खो रहा,बेचैन हो रहा



दिलो दिमाग से परेशान हुआ.



है ठिकाना नही,कही यहां



भागता फिर रहा सारे जहाँ .



आबोदाना सब हुआ मर्ज माफिक



सफर ये दिल से दिमाग तक का.



मुश्किल हुआ सफर यहाँ


दिलोदिमाग से परेशान हुआ.




हिन्दोस्ताँ का ख्वाब खो गया



पश्चिमी हवाओ मे खो गया.



ऋषियों मुनियों का दिया रास्ता



जिसपे न कोई पथिक अब यहाँ.


(bindusar ki dayari se)

26जनवरी2009ई0

सोमवार,

मौनी अमावस्या !


26जनवरी !


राष्ट्र से जुड़ा दिन है.



गणतन्त्र हमारा कैसे गुणतन्त्र बने ?


इस पर हमे विचार करना है,

उस पर चलना है.


26जनवरी!


26जनवरी,मेरे ख्वाब से जुड़ा दिन है.


उस ख्वाब के लिए


उस स्वपन के लिए


जिसके लिए मैने 12 वर्ष जमाने की नजर से बर्बाद किए

लेकिन


मेरा कुछ भी बर्बाद नहीं हुआ है.



जो बर्बाद होने के योग्य है


वही बर्बाद होता है.


यह शरीर तभी तक ही सजीव है


जब तक इसमे श्वास चल रही है.


इन 12 वर्षों......?!

खैर छोड़ो !


आज गणतन्त्र दिवस!



कालेज पहुंच कर मैने श्यामपट पर दो वाक्य लिख दिए-


"व्यक्ति के धर्म संस्कार एवं सभ्यता की पहचान उसकी स्वतन्त्रता मे ही होती है दबाव या मजबूरी मे नहीं "


और-


"आओ संकल्प लें गणतन्त्र को गुणतन्त्र बनाने का."


* * *


23 नवम्बर 2008से मै तनाव मे जी रहा हूँ,लगातार तनाव मे जी रहा हूँ.मैं एक षड़यन्त्र मे फँसता खुद को महसूस करने लगा था.अपने को नितान्त अकेला महसूस कर रहा था.मेरे माता पिता भी मेरे मदद मे नहीं थे.जिसके स्मरण मात्र से मैँ अपनोँ
को पराया समझने लगा था.दुनिया मेँ किसे कहूँ अपना ?उन्हेँ जो कहने को तो अपने हैं लेकिन वे हमें समझ न सके?
हमारे हित के नाम पर हमेँ उनसे घुटन बेचैनी ही मिली है
लेकिन....



दुख क्यों ?

इच्छाओं के कारण.


उम्मीदों के कारण.


चैन तभी मिलता है जब न ही किसी को अपना न ही पराया समझूँ.


स्वयं की समस्याओँ का निदान स्वयं ही खोजना होगा अन्य तो समस्याओं को उलझने के लिए ही हैं.


आज 26जनवरी!


शहीदों को मेरा नमन !

सोमवार, 14 मार्च 2011

*नहीं तो हम भी तुम्हारी पसन्द होते*

तड़फते रहे हम तुम्हारे करीब आने को



मगर थे तुम ऐसे,मुझे देखना भी न गँवारा .



मेरी तड़फ का तुम क्या एहसास करते



हर पल तुम ही तुम,तुम ही ख्वाब थे.



काश तुम भी करते किसी से मोहब्बत



जिनकी नफरत का तुम एहसास करते.



हम थे कि कितने तड़फे कितने तड़फे



काश तुमको भी ऐसे एहसास होते.



तुम्हारा दिल है कि है पत्थर



मोहब्बत का तुम क्या एहसास करते.



चलो ठीक है,खुश हो तुम जिन्दगी मे



खुदा से दुआ कि तुम मिलो अगले जन्म मे.



इस जन्म तो लायक न हम तुम्हारे



नहीं तो हम भी तुम्हारी पसन्द होते..


(Bindusar ki dayari se)

रविवार, 13 मार्च 2011

मेरा जीवन मेरे सपने:ब��न्दुसार कौटिल्य

कुण्डलिनी व योग विज्ञान में प्रथम चार अवस्थाओं का अपने निज(प्राण)तक पहुचने मे बड़ा महत्व होता है.यह प्रथम चार अवस्थाएं है-स्थूल,भाव,सूक्ष्म और मनस.जिनको साधना आवश्यक है जो कि योग के प्रथम पांच अंग-यम,नियम,आसन,प्राणायाम व प्रत्याहार के बिना असम्भव है.कुछ को साधना मे विशेष मेहनत नही करनी पड़ती इसका कारण उनका नजरिया व अन्तर्प्रवृत्ति होती है तब मेण्टल शरीर की प्राकृतिक सम्भावनाएं कल्पना व स्वपन क्रमश:संकल्प व अतीन्द्रिय दर्शन मेँ परिणित होने मे देर नहीं लगती ,एस्ट्रल बाडी की प्रकृति सम्भावनाएं सन्देह व विचार क्रमश:ऋद्धा व विवेक मे परिणित हो जाता है.जो अपने को अन्तर्मुखी व वहिर्मुखी दोनो स्थितियों में लाने की कला से परिचित होता है वही वास्तव मे सफलता पा सकता है. मैँ उसे स्वपन कहूं या अतीन्द्रिय दर्शन...?मेरे कुछ स्वपन यथार्थ से जुड़े दिखे हैँ.वे हमे दिशा निर्देशित भी करते रहे हैं. लेकिन उन पर पूर्ण विश्वास व जग चमक प्रभाव कारण अपने जीवन मेँ उन पर अमल नही कर पाते.





श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ ,नाथ नगरी,बरेली(उ प्र) के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी) का मानना है कि अपने अन्दर उपस्थित नारी शक्ति को जब हम जगा लेते है, नगेटिव व पाजटिव शक्ति अर्थात निष्क्रिय व सक्रिय शक्ति का अपने शरीर के अन्दर सम्भोग करा लेते हैं तो चारो स्तरोँ को पार कर स्व तन्त्र पर आ जाते हैं.


हमने अनेक सम्भावनाओं को मन मे जिया है,ऐसे मे हमसे लोग कहते है कि तुम तो कहते थे कि अमुख काम पहले बार किया है लेकिन लगता है कि ऐसा पहले भी कर चुके हो.विभिन्न सम्भावनाओ को मन मे जीने से हम बुरी आदतों से भी मुक्त हो सकते है.मानो हमने सोसायटी मेँ पड़ कर एक बार शराब पी,एक बार ही शराब पीने की घटना से हमने जीवन भर के लिए मानसिक स्थितियां जी लीं कि अरे,यही दारु का मजा है ? चलो एक बार पी ली सारे जीवन के लिए काफी है.अब हम दारु से मुक्त हुए.इस की लत से क्या फायदा?इसी तरह सांसारिक अन्य विषयों के लिए भी.



*मेरे सपने....?*


(1)पांच साल पहले तक मै एक मकान स्वपन मे देखा करता था. चार साल पहले उस मकान मे एक फैमिली आकर रहने लगी ,जिसके मेम्बरस मे एक युवती भी शामिल थी.उस फैमिली के आने के बाद मैने फिर वही मकान स्वपन मे देखा,स्वपन मेँ उस युवती के साथ सम्भोग किया.इस स्वपन को देखने के बाद फिर कभी स्वपन मेँ इस मकान को नहीं देखा.



(2)किशोरावस्था से ही मैँ एक स्वपन मेँ एक अन्य मकान देखता था जिसमे मै एक लड़की की तलाश मेँ रहता था लेकिन लड़की जीप को ड्राइव कर मकान से बाहर निकल जाती थी.जब मै01जुलाई2004ई0 को कटरा (KATRA)आया तो मेरे साथ कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनका मुझे पूर्व एहसास हो जाता था.एक मैँ दिन एक गली मे पहुचा ही कि मुझे लगा कि मै यहां आ चुका हूँ .फिर आगे बढ़कर मै जिस मकान को देखा तो आश्चर्य,यह सब तो मै स्वपन मेँ देखता रहा हूँ.इसके मै जो जो पूर्व अनुमान लगाता गया ,वह जीवन में घटता चला गया .

(3)इसी तरह एक रात मैने स्वपन मे एक जीप को सड़क पर पलटा देखा ,साथ ही दो लाशें भी देखी.सुवह मै तैयार हो शाहजहाँपुर जाने के उद्देश्य से घर से बाहर निकला.सड़क पर आते ही मुझे एक जीप मिल गयी लेकिन मै उससे उतर पड़ा.एक बालक आकर हमसे बोला "पापा बुला रहे है हम लोग साथ साथ ही चलेगे."
जब बाद मेँ हम उस बालक व उसके पिता जी के साथ दूसरी जीप से शाहजहापुर जा रहे थे तो आगे मध्य रास्ते पर देखा पहली जीप दुर्घटनाग्रस्त हुई पड़ी थी.

(4)मुझे अपने आस पड़ोस मे एक दो आत्माओ का एहसास होता रहा है लेकिन दो वर्षो से ऐसा नही है.दो वरस पहले एक मैने एक स्वपन देखा कि हमसे एक युवक कह रहा है कि यह सफेद कपड़ा हटाओ.एक सफेद कपड़ा मै एक पेड़ पर टंगा देख रहा था.
सुबह उठ कर मै मंजन करते करते मकान से बाहर आ गया.अचानक मेरी निगाह फाटक मे बँधे एक सफेद कपड़े पर गयी तो मुझे रात को देखा स्वपन याद आ गया.मै तुरन्त अन्दर आ कर मकानमालिकिन के पास पहुंचा

" चाची,बाहर फाटक पर सफेद कपड़ा कैसा बँधा है?"



"उसको हटाना नहीँ,एक बाबा जी ने बाँधते हुए कहा है कि अब कोई भूत बाधा नहीं आयेगी. "



इस तरह की घटनाओ को क्या कहा जाए?

हाँ,मै इतना जानता हूँ कि दुनिया से प्रभावित हुए बिना यदि धैर्य व संयम रखते हुए अन्तर्मुखी जीवन भी जिया जाए तो हम अपने आस पास घटने वाली घटनाओ का पूर्व एहसास कर सकते है.



शेष फिर .....



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गुरुवार, 10 मार्च 2011

बिन्दुसार कौटिल्य की डायरी से

*चुनौती*


यदि दम है उनमे ,

निकल कर दिखायें मेरे दिल से

चुकने का नाम नही मोहब्बत,

बढ़ती ही जाए मोहब्बत.


खत्म हो जाए जो,

वो भी क्या है यारो मोहब्बत

वो न करे हमसे मोहब्बत तो क्या,

हमे तो है मोहब्बत.


मेरे दिल से जुदा करके तो

दिखाये वे मोहब्बत


यदि दम है उनमे ,

निकल कर दिखाये मेरे दिल से.




*.....क्या है दम ?! *


मेरा प्यार क्या प्यार नही,

कूड़ा करकट है

जी रहा तेरी याद ले

मर भी जाऊँ तेरे याद मे.


तू है कितने दमखम मे

मै भी जरा देख लूँ

खुद को निकाल कर तो

दिखा मेरे दिल से.

......क्या है दम ?!




* किसकी जरूरत थे हम*


किसकी पसन्द मे थे हम,

किसकी नजर मे थे हम

किसकी जरुरत थे हम,
किसके दिल थे हम.



*निशानियाँ....*


जिनके दिल मेँ हम नही है

वो हमे क्या याद करेगे ;


जो हमारे दिल मे है

उनके लिए निशानिया छोड़ जाएंगे.



*यादों के साये....*


मेरी जिन्दगी मे लोग आ आ के चले गये

मगर हम अब भी यादों के साये मे जी रहे.



*जताना न आया*


हमने याद किया जग को

किसने याद किया हमको;

अफसोस यही सिर्फ है यारो

जताना न आया हमको.



* सौदेबाजी न की*


बहुत आये मगर मैने

सौदेबाजी न की


बिकने को तैयार था

नहीं मै;


किसी के आँखो मे चमक वो न देखी

मोहब्बत मेँ दीवानी जिन्दगी न देखी.



*सपने सच नही*


कोई हमे स्वीकारता तो तारे भी तोड़ लाते


कोई हमसे मोहब्बत करता तो उसपे मरते.


क्या क्या ख्वाब थे
उन्हे सहज रखने के

हम उन्हे रखते हर वक्त पलकों पे.




*मिलना अगले जन्म*



चलो कोई बात नही पूरी हो चाहतें तुम्हारी


मेरी न कोई चाहत है मोहब्बत के सिवा.


चाहे मोहब्बत मेरी

खुश रहो तुम सदा


हम तो अब चल दिये

मिलना अगले जन्म.



ख्वाब थे नसीब मे

वे भी मिट रहे


मौत अब करीब है

मगर बेचैन है.


अगले जन्म मे जरुर तुम संग होगे

पा तो लिया ही मन
से हमने तुम्हे.




*चलते चलते फिर....*



यदि दम है उनमे

निकल कर दिखाये मेरे दिल से





बिन्दुसार कौटिल्य कौन?


जानेगे भविष्य में.



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सोमवार, 10 जनवरी 2011

सर्व शिक्षा मेँ दंश : छुआ छूत




                                        नई पीढ़ी को दोष दिए जा रहे हैँ लेकिन नई पीढ़ी को मिलता क्या है विरासत मेँ?

पुरानी पीढ़ी से जो मिलता है वह सब ठीक ही नहीँ है.उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद,कानपुर देहात,औरेया और शाहजहाँपुर मेँ एक के बाद एक प्रथमिक विद्यालयोँ मेँ दलित रसोईयोँ द्वारा भोजन बनाने का बहिष्कार किया जा रहा है.मासूम बच्चोँ को यह सिखाने का काम कौन कर रहा है कि दलित रसोईयोँ के द्वारा बनाये भोजन को न खायेँ.दलित रसोईया तो पहले से ही खाना पकाते आये थे लेकिन अब विरोध क्योँ?समाज व धर्म के ठेकेदार कहाँ सो रहे हैँ?विहिप,बजरंगदल,संघ आदि जैसे संगठन कहाँ सो रहे हैँ?क्या वे भी इस बहिष्कार के समर्थन मेँ हैँ या फिर तटस्थ हैँ तो क्योँ?


विद्यालय तो ज्ञान केन्द्र हैँ. ज्ञान केन्द्र का मतलब यह नहीँ कि वहाँ समाज के परम्परागत अन्धविश्वास,कूपमण्डूकता ,आदि को बढ़ावा दिया जाये.वहाँ से तो सार्वभौमिक ज्ञान की ओर दिशा दशा मिलनी चाहिए.शिक्षा जगत से जुड़े मुझे अनेक वर्ष हो चुके हैँ. अत: हर जाति वर्ग के बच्चोँ के सम्पर्क मेँ रहा हूँ.बच्चे तो बच्चे होते हैँ, कोरे कागज के समान होता है उनका मन लेकिन....?!मत मेँ जीना कोई दोष नही लेकिन मतभेदोँ मेँ जीना ठीक नहीँ और न ही बच्चोँ को मत भेदोँ के लिए बातावरण बनाना उचित है.


समाज मेँ सब अच्छा ही नहीँ है.समाज मेँ हर व्यक्ति विकारोँ से भरा है.अनुसूचित जाति के अन्तर्गत तक विभिन्न जातियोँ के अन्तर्गत भेद व छुआ छूत है.अनुसूचित जाति के कितने लोग वाल्मिकियोँ के सामाजिक कार्योँ मेँ शामिल होते हैँ?जाति व छुआ छूत की भावना के लिए अब सिर्फ सवर्ण वर्ग ही दोषी नहीँ हैँ.हालाँकि यह सत्य है कि सवर्ण वर्ग गैर हिन्दुओँ के सामाजिक कार्योँ अब शामिल होते देखे जा रहे हैँ लेकिन हिन्दू समाज मेँ ही आने वाले जाटव व वाल्मीकि भाईयोँ के यहाँ पानी छूना तक पसन्द नहीँ करते.


अपने परिवार या समाज मेँ हम जिस अवधारणा मेँ जीते आये हैँ.जरुरी नहीँ वे अवधारणाएँ ठीक होँ.




अवैज्ञानिक व असंवैधानिक नीतियोँ का चलो बहिष्कार करो,चलता हैँ.भाई यह नहीँ चलना चाहिए.आखिर कब खुलेँगे दिमाग व हृदय के दरबाजे?मात्र स्कूली शिक्षा काफी नहीँ है और फिर स्कूली शिक्षा का उद्देश्य मात्र भौतिक कैरियर रह गया है.कुरीतियोँ के खिलाफ मुहिम न चला पाने के लिए तो अभिभावक व अध्यापक दोषी हैँ,जो स्वयं अभी कूपमण्डूक ज्ञान से भरे हैँ. मैँ तो सर्व शिक्षा अभियान को असफल मान रहा हूँ.इसका उद्देश्य मात्र मुझे व्यवहारिक रुप मेँ इतना दिख रहा है कि विश्वबैँक की नजर मेँ कागजी आंकड़े ठीक हो रहे हैं और बम्पर अध्यापकोँ की आवश्यकताओँ से कुछ घरोँ की आर्थिक समस्या खत्म हो रही है.हाँ ,यह सत्य है कि सामाजिक सुधार आन्दोलन के लिए शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है लेकिन वर्तमान शिक्षा का माडल व आम आदमी के शिक्षित होने के उद्देश्य को बहुद्देश्यीय होना आवश्यक है.सिर्फ भौतिक सोँच से भला होने वाला नहीँ.17वीँ सदी को पैदा हुई विकास की सोंच दूरगामी घातक परिणाम लाने वाली है.


ऐरे- गैरे सभी के हाथोँ मेँ अंक तालिकाएँ पकड़ा देने से विश्व बैंक की नजर मैँ आप साक्षरता के आंकड़े तो ठीक कर लेँगे लेकिन शिक्षित बेरोजगारी से आप कैसे निपटेँगे?आज की तारीख मेँ प्रति वर्ष महाविद्यालयोँ से लाखोँ लोग स्नातक- स्नातकोत्तर की डिग्री ले कर सड़क पर आ जाते हैँ. जिनमेँ से 90 प्रतिशत से ज्यादा युवक युवतियाँ सामाजिक सुधार आन्दोलन मेँ निर्रथक होते ही हैँ .शारीरिक परिश्रम व परम्परागत व्यवसाय की आदत /रुचि न होने कारण मजदूर/चाट खोँचे वालोँ/किसान/आदि से भी बदतर स्थिति मेँ पहुँच जाते हैँ और कम्पटीशन निकाल नहीँ पाते,मैरिट मेँ भी आ नहीँ पाते.हाँ,कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार का हिस्सा जरूर बन जाते हैँ.


बुरा न मानना,मैँ जाति व्यवस्था का तो विरोधी हूँ लेकिन वर्ण व्यवस्था का नहीँ.मैँ अब भी इस बात का समर्थक हूँ कि शिक्षा का हकदार ब्राह्मण ही है.बात है प्राथमिक विद्यालयोँ मेँ दलित रसोईयोँ के द्वार पकाए भोजन के बहिष्कार की,बहिष्कार करने वालोँ तटस्थ किया जाए या फिर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाए.जिन्हेँ संवैधानिक कार्यो से आपत्ति है ,उनको नागरिकता व अन्य सरकारी योजनाओँ से वंचित करने का कानून आना चाहिए.नागरिकता की परिभाषा मेँ संशोधन किया जाये.वोट की राजनीति के खिलाफ कार्यवाही किए बिना देश मेँ कुप्रन्धन से नहीँ लड़ा जा सकता. मात्र भौतिक विकास के लिए योजनाएँ बना लेने से क्या है?हमारे सामने चीन देश है तो ,उसने 50 सालोँ मेँ अपनी समस्यायोँ का निदान कर लिया है और अब भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुहिम चला दी है.यहाँ कागजी आंकड़े ही ठीक करने मेँ लगे हैँ

रविवार, 9 जनवरी 2011

गुरु ग्रन्थोत्सव :आओ सिक्ख बनेँ




                    सिक्ख यानि कि शिष्य परम्परा मेँ जीना हर व्यक्ति को आवश्यक है अर्थात हर व्यक्ति को निरन्तर प्रशिक्षण मेँ रहना आवश्यक है.स्वाध्याय , सत्संग ,विचार गोष्ठी,सेमीनार,आदि आवश्यक है.हम भगत सिँह की इस प्रसंग से सीख नहीँ ले सकते कि उन्हेँ जिस दिन फांसी पर चढ़ाया जाने वाला था उस दिन भी वे पुस्तकोँ का अध्ययन कर रहे थे.



मन को ऋणात्मक सोँच व विभिन्न विक्रतियोँ से बचाने के लिए निरन्तर स्वाध्याय व सत्संग आवश्यक है.



खैर......


मध्यकालीन परिस्थितियोँ से हमेँ गुरु गोविन्द सिँह जैसा व्यक्तित्व प्राप्त हुआ . मिशन किस के पक्ष मेँ है या विपक्ष मेँ है,यह अलग बात है.हमेँ मिशन के प्रति कैसा होना चाहिए इस की सीख हमेँ गुरु गोविन्द सिँह से मिलती है.



जिन्ना ने कहा था कि जिस दिन प्रथम हिन्दुस्तानी मुसलमान बना था उस दिन पाकिस्तान की नीँव पड़ चुकी थी.सिक्ख पन्थ की स्थापना कोई गैरभारतीयता का उदय न थी बल्कि इन हजार वर्षोँ मेँ प्रथम बार किसी ने भारतीय राष्ट्रीयता को समग्र शक्ति देने का कार्य किया था.धर्मान्तरण मेँ लगी ईसाई मिशनरियोँ के देश मेँ ही धर्मान्तरण को करारा जबाव देने वाले ओशो का नाम छोँड़ देँ तो हम कह सकते हैँ कि मजबूरन धर्मान्तरण के विरोध मेँ इन तीन हजार वर्षों मेँ कोई सच्चे मायने मेँ खड़ा हुआ था , वह था सिक्ख समाज.



हर कोई सिक्ख हो,मतलब सिक्ख पन्थ को स्वीकार करने से नहीँ है सिर्फ.निरन्तर साधना व प्रशिक्षण मेँ लगे रहते हुए बहुयामी जीवन को जीना है.



जरा अनुभव तो कीजिए , गुरु अपने अन्दर भी बैठा है जिस पर पकड़ बनाए बिना स्थूल सांसारिक मत मतान्तरोँ मेँ उलझे रहने से कोई कल्याण नहीँ होने वाला.गुरु प्रथा को समाप्त करना और गुरुस्थान पर 'गुरुग्रन्थ साहिब' को विराजमान करना भारतीयता के जीवन मेँ महत्वपूर्ण कदम है.इसे गहराई से सोँचना होगा.



गुरुग्रन्थ साहिब मेँ कबीर रैदास मीरा आदि सन्तोँ को स्थान दिया गया .मेरा विचार है कि इस तरह विश्व स्तर पर भी एक ग्रन्थ का निर्माण होना चाहिए जिसमेँ विश्व के सभी मतोँ की समान बातेँ शामिल की जाएं.