रविवार, 9 जनवरी 2011

गुरु ग्रन्थोत्सव :आओ सिक्ख बनेँ




                    सिक्ख यानि कि शिष्य परम्परा मेँ जीना हर व्यक्ति को आवश्यक है अर्थात हर व्यक्ति को निरन्तर प्रशिक्षण मेँ रहना आवश्यक है.स्वाध्याय , सत्संग ,विचार गोष्ठी,सेमीनार,आदि आवश्यक है.हम भगत सिँह की इस प्रसंग से सीख नहीँ ले सकते कि उन्हेँ जिस दिन फांसी पर चढ़ाया जाने वाला था उस दिन भी वे पुस्तकोँ का अध्ययन कर रहे थे.



मन को ऋणात्मक सोँच व विभिन्न विक्रतियोँ से बचाने के लिए निरन्तर स्वाध्याय व सत्संग आवश्यक है.



खैर......


मध्यकालीन परिस्थितियोँ से हमेँ गुरु गोविन्द सिँह जैसा व्यक्तित्व प्राप्त हुआ . मिशन किस के पक्ष मेँ है या विपक्ष मेँ है,यह अलग बात है.हमेँ मिशन के प्रति कैसा होना चाहिए इस की सीख हमेँ गुरु गोविन्द सिँह से मिलती है.



जिन्ना ने कहा था कि जिस दिन प्रथम हिन्दुस्तानी मुसलमान बना था उस दिन पाकिस्तान की नीँव पड़ चुकी थी.सिक्ख पन्थ की स्थापना कोई गैरभारतीयता का उदय न थी बल्कि इन हजार वर्षोँ मेँ प्रथम बार किसी ने भारतीय राष्ट्रीयता को समग्र शक्ति देने का कार्य किया था.धर्मान्तरण मेँ लगी ईसाई मिशनरियोँ के देश मेँ ही धर्मान्तरण को करारा जबाव देने वाले ओशो का नाम छोँड़ देँ तो हम कह सकते हैँ कि मजबूरन धर्मान्तरण के विरोध मेँ इन तीन हजार वर्षों मेँ कोई सच्चे मायने मेँ खड़ा हुआ था , वह था सिक्ख समाज.



हर कोई सिक्ख हो,मतलब सिक्ख पन्थ को स्वीकार करने से नहीँ है सिर्फ.निरन्तर साधना व प्रशिक्षण मेँ लगे रहते हुए बहुयामी जीवन को जीना है.



जरा अनुभव तो कीजिए , गुरु अपने अन्दर भी बैठा है जिस पर पकड़ बनाए बिना स्थूल सांसारिक मत मतान्तरोँ मेँ उलझे रहने से कोई कल्याण नहीँ होने वाला.गुरु प्रथा को समाप्त करना और गुरुस्थान पर 'गुरुग्रन्थ साहिब' को विराजमान करना भारतीयता के जीवन मेँ महत्वपूर्ण कदम है.इसे गहराई से सोँचना होगा.



गुरुग्रन्थ साहिब मेँ कबीर रैदास मीरा आदि सन्तोँ को स्थान दिया गया .मेरा विचार है कि इस तरह विश्व स्तर पर भी एक ग्रन्थ का निर्माण होना चाहिए जिसमेँ विश्व के सभी मतोँ की समान बातेँ शामिल की जाएं.

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