सोमवार, 10 जनवरी 2011

सर्व शिक्षा मेँ दंश : छुआ छूत




                                        नई पीढ़ी को दोष दिए जा रहे हैँ लेकिन नई पीढ़ी को मिलता क्या है विरासत मेँ?

पुरानी पीढ़ी से जो मिलता है वह सब ठीक ही नहीँ है.उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद,कानपुर देहात,औरेया और शाहजहाँपुर मेँ एक के बाद एक प्रथमिक विद्यालयोँ मेँ दलित रसोईयोँ द्वारा भोजन बनाने का बहिष्कार किया जा रहा है.मासूम बच्चोँ को यह सिखाने का काम कौन कर रहा है कि दलित रसोईयोँ के द्वारा बनाये भोजन को न खायेँ.दलित रसोईया तो पहले से ही खाना पकाते आये थे लेकिन अब विरोध क्योँ?समाज व धर्म के ठेकेदार कहाँ सो रहे हैँ?विहिप,बजरंगदल,संघ आदि जैसे संगठन कहाँ सो रहे हैँ?क्या वे भी इस बहिष्कार के समर्थन मेँ हैँ या फिर तटस्थ हैँ तो क्योँ?


विद्यालय तो ज्ञान केन्द्र हैँ. ज्ञान केन्द्र का मतलब यह नहीँ कि वहाँ समाज के परम्परागत अन्धविश्वास,कूपमण्डूकता ,आदि को बढ़ावा दिया जाये.वहाँ से तो सार्वभौमिक ज्ञान की ओर दिशा दशा मिलनी चाहिए.शिक्षा जगत से जुड़े मुझे अनेक वर्ष हो चुके हैँ. अत: हर जाति वर्ग के बच्चोँ के सम्पर्क मेँ रहा हूँ.बच्चे तो बच्चे होते हैँ, कोरे कागज के समान होता है उनका मन लेकिन....?!मत मेँ जीना कोई दोष नही लेकिन मतभेदोँ मेँ जीना ठीक नहीँ और न ही बच्चोँ को मत भेदोँ के लिए बातावरण बनाना उचित है.


समाज मेँ सब अच्छा ही नहीँ है.समाज मेँ हर व्यक्ति विकारोँ से भरा है.अनुसूचित जाति के अन्तर्गत तक विभिन्न जातियोँ के अन्तर्गत भेद व छुआ छूत है.अनुसूचित जाति के कितने लोग वाल्मिकियोँ के सामाजिक कार्योँ मेँ शामिल होते हैँ?जाति व छुआ छूत की भावना के लिए अब सिर्फ सवर्ण वर्ग ही दोषी नहीँ हैँ.हालाँकि यह सत्य है कि सवर्ण वर्ग गैर हिन्दुओँ के सामाजिक कार्योँ अब शामिल होते देखे जा रहे हैँ लेकिन हिन्दू समाज मेँ ही आने वाले जाटव व वाल्मीकि भाईयोँ के यहाँ पानी छूना तक पसन्द नहीँ करते.


अपने परिवार या समाज मेँ हम जिस अवधारणा मेँ जीते आये हैँ.जरुरी नहीँ वे अवधारणाएँ ठीक होँ.




अवैज्ञानिक व असंवैधानिक नीतियोँ का चलो बहिष्कार करो,चलता हैँ.भाई यह नहीँ चलना चाहिए.आखिर कब खुलेँगे दिमाग व हृदय के दरबाजे?मात्र स्कूली शिक्षा काफी नहीँ है और फिर स्कूली शिक्षा का उद्देश्य मात्र भौतिक कैरियर रह गया है.कुरीतियोँ के खिलाफ मुहिम न चला पाने के लिए तो अभिभावक व अध्यापक दोषी हैँ,जो स्वयं अभी कूपमण्डूक ज्ञान से भरे हैँ. मैँ तो सर्व शिक्षा अभियान को असफल मान रहा हूँ.इसका उद्देश्य मात्र मुझे व्यवहारिक रुप मेँ इतना दिख रहा है कि विश्वबैँक की नजर मेँ कागजी आंकड़े ठीक हो रहे हैं और बम्पर अध्यापकोँ की आवश्यकताओँ से कुछ घरोँ की आर्थिक समस्या खत्म हो रही है.हाँ ,यह सत्य है कि सामाजिक सुधार आन्दोलन के लिए शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है लेकिन वर्तमान शिक्षा का माडल व आम आदमी के शिक्षित होने के उद्देश्य को बहुद्देश्यीय होना आवश्यक है.सिर्फ भौतिक सोँच से भला होने वाला नहीँ.17वीँ सदी को पैदा हुई विकास की सोंच दूरगामी घातक परिणाम लाने वाली है.


ऐरे- गैरे सभी के हाथोँ मेँ अंक तालिकाएँ पकड़ा देने से विश्व बैंक की नजर मैँ आप साक्षरता के आंकड़े तो ठीक कर लेँगे लेकिन शिक्षित बेरोजगारी से आप कैसे निपटेँगे?आज की तारीख मेँ प्रति वर्ष महाविद्यालयोँ से लाखोँ लोग स्नातक- स्नातकोत्तर की डिग्री ले कर सड़क पर आ जाते हैँ. जिनमेँ से 90 प्रतिशत से ज्यादा युवक युवतियाँ सामाजिक सुधार आन्दोलन मेँ निर्रथक होते ही हैँ .शारीरिक परिश्रम व परम्परागत व्यवसाय की आदत /रुचि न होने कारण मजदूर/चाट खोँचे वालोँ/किसान/आदि से भी बदतर स्थिति मेँ पहुँच जाते हैँ और कम्पटीशन निकाल नहीँ पाते,मैरिट मेँ भी आ नहीँ पाते.हाँ,कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार का हिस्सा जरूर बन जाते हैँ.


बुरा न मानना,मैँ जाति व्यवस्था का तो विरोधी हूँ लेकिन वर्ण व्यवस्था का नहीँ.मैँ अब भी इस बात का समर्थक हूँ कि शिक्षा का हकदार ब्राह्मण ही है.बात है प्राथमिक विद्यालयोँ मेँ दलित रसोईयोँ के द्वार पकाए भोजन के बहिष्कार की,बहिष्कार करने वालोँ तटस्थ किया जाए या फिर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाए.जिन्हेँ संवैधानिक कार्यो से आपत्ति है ,उनको नागरिकता व अन्य सरकारी योजनाओँ से वंचित करने का कानून आना चाहिए.नागरिकता की परिभाषा मेँ संशोधन किया जाये.वोट की राजनीति के खिलाफ कार्यवाही किए बिना देश मेँ कुप्रन्धन से नहीँ लड़ा जा सकता. मात्र भौतिक विकास के लिए योजनाएँ बना लेने से क्या है?हमारे सामने चीन देश है तो ,उसने 50 सालोँ मेँ अपनी समस्यायोँ का निदान कर लिया है और अब भ्रष्टाचार के खिलाफ भी मुहिम चला दी है.यहाँ कागजी आंकड़े ही ठीक करने मेँ लगे हैँ

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