शनिवार, 26 मार्च 2011

सनातन यात्रा का एक पड़��व-मुसलमान !

धर्म व अध्यात्म प्राणियों के बीच द्वेष व मतभेद नहीं रखता.हम हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य,सेवा व दया भाव का जिक्र सभी जगह पर मिलता है.मन्दिर, मस्जिद, आदि धर्मस्थल व सम्प्रदाय ,आदि तो सनातन यात्रा के विभिन्न स्तरोँ ,चक्र,लतीफ,system,आदि के आधार पर पड़ाव है,हमारे अन्तस्थ धर्म के.


जन्म के बाद
इस संसार मे अन्तस्थ यात्रा का पहला पड़ाव है-स्थूल,मूलाधार चक्र अर्थात reproductory.हमे लगता है अधिकतर लोग इसी स्तर पर आकर रुक गये हैँ.शहद के बर्तन मेँ चिपकी मधुमक्खी की तरह हो गये हैं,जो चिपक मे ही आनन्दित हो भूत व नरकीय योनि की सम्भावनाओं मेँ जी रहे है.'लतीफा-ए-उम्मुद-दिमाग 'अर्थात सहस्राधार चक्र तक की यात्रा का ख्वाब तक नहीं रखते .इनमे से कुछ यल्ह अर्थात अल्हा का अपने भौतिक दुखों व भौतिक लालसाओं के कारण स्मरण संसार की निर्जीव वस्तुओं से निर्मित चित्रों, मूर्तियों, मजारों ,मजहब- स्थलों ,आदि में उलझ कर रह जाते है. वे यह नहीं जानते कि आत्मसाक्षात्कार के बिना हम यल्ह तक नहीं पहुंच सकते.




इससे हट कर अपने ईमान पर पक्का होना क्या गलत है?मुसलमान का अर्थ क्या है ?अपने ईमान पर पक्का होना न ! क्षेत्रीयता(हिन्दू शब्द की शाब्दिक परिभाषा में जायें) ,जाति,छुआ छूत,मजहब स्थलों,सम्प्रदाय,मूर्तियां,आदि से ऊपर उठ कर इन्सानियत,दया,सेवा,आत्म साक्षात्कार,अपने पराये भाव से मुक्ति,नमाज (सूर्य नमस्कार) ,दान,हज,आदि के माध्यम से यल्ह अर्थात ईश्वर तक पहुंच सकते हैं.



सऊदी अरब की मक्का मस्जिद के इमाम ए हरम शेख अब्दुर रहमान बिन अब्दुल अजीज अल सुदेस ने कहा कि दुनिया को इस वक्त अमन की सर्वाधिक दरकार है.इसी रास्ते पर चल कर इंसानियत महफूज रह सकती है.अमन की पहल मुसलमान करें.



वास्तव में जो अपने ईमान पर पक्का है ,वही दुनिया में अमन चैन व बसुधैव कुटुम्बकम की बात कर सकता है.तमाम मुल्कों के शरहदों को नकारते हुए दुनिया के इन्सान की हिफाजत की बात वही सोंच सकता है जो अपने ईमान पर पक्का है.हमे इस पर चिन्तन करना चाहिए कि तमाम मुल्कों की शरहदें आम आदमी के लिए खोल देनी चाहिए.शरहदें सिर्फ प्रशासनिक हों.



सच्चे मुसलमान थे मोहम्मद साहब लेकिन उनके गुजर जाने बाद सनातन यात्रा मेँ रुकावट आ गयी .इसके बाद मुस्लिम सम्प्राय तो बढ़ा लेकिन सनातन धर्म के यात्रा में रुकावट आ गयी.समूर्ण इंसानिय त के स्थान गुट,मस्जिद ,मजारों,आदि पर इनके अनुयायी भी आ टिके.अन्तर्यात्रा में रुकावट आ गयी.




दुनिया मे हमे एक ऐसा मंच चाहिए जहाँ गैरमुसलमानों का भी अपना दर्जा हो.हम आगे बढ़ गये है,अगले पड़ावों की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम निचले पड़ाव पर खड़े व्यक्तियों को वक्त न देँ. जो अ, आ ,इ ,ई,......ध्वनियां सीखने के लिए अमरुद,आम,इमली,ईख,.......आदि में उलझे हैं ,उनका हम विरोध भी नहीं कर सकते.




बरेली,उप्र में प्रस्तावित श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी) से 20 दिसम्बर 2010ई0 को मुलाकात हुई,सब कुछ ठीक था.ईमान पर पक्के होने की बात उनमें थी ,वहां ओम तत् सत् की बात थी.लेकिन हम चित्रों ,मूर्तियोँ ,धर्म स्थलों ,आदि मेँ क्यों उलझें ?लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि बच्चों को काफिर कह उनसे द्वेष रखें.हाँ,वे अभी बच्चे ही हैं जो कि चित्रों ,मूर्तियों, मजारोँ ,धर्म स्थलों ,आदि में उलझे हैं,उनसे मुख मोड़ लें. उन्हें भी प्रेम व स्नेह दो .इसका फायदा भविष्य में हो सकता हैँ.चलो ,यह तो है कि वे ईश्वर को याद तो कर रहे है.शायद भविष्य मेँ वे शेष अगली यात्रा तय कर सकें?



इन दिनों यहां मीरानपुर कटरा में महान प्रसिद्ध सूफी संत हजरत सैय्यद दूल्हा मियां कलीमी व हजरत सैय्यद मसरुर मियां कलीमी का 23मार्च से सालाना उर्स चल रहा है.जहां बंगाल ,बिहार ,कलकत्ता ,मुम्बई ,दिल्ली सहित तमाम प्रान्तों से हजारों की संख्या में जायरीनों का आना चालू है.जिसके इन्तजाम में कुछ गैरमुस्लिम भी लगे हैं.सम्पूर्ण व्यवस्था प्रमुख रूप से दरगाह मुतावल्ली हजरत सैय्यद मसूद अहमद कलीमी देख रहे हैं.बंगाल के कुछ जायरीन से मैने मुलाकात की ,उन्होने माना कि दुनिया के तमाम मजहब तो रास्ता हैं जो इंसान को सनातन धर्म की यात्रा पर डालते हैं.दोष तो इंसान में होते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार को न पकड़ संसार की निर्जीव वस्तुओं के सहारे आगे की यात्रा न तय कर निर्जीव वस्तुओं या संसार में उलझ कर रह जाते हैं और आगे की यात्रा तय न कर खुदा से सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते.



ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



miranpur katra,

shahjahanpur,U.P.

गुरुवार, 24 मार्च 2011

गांधीवादी के जुबान पर शिवाजी ....?

गांधीवादी के मुँह से यह बात कि गांधी नहीं शिवा जी के रास्ते से दूर होगा भ्रष्टाचार !



लोगों को आश्चर्य है कि जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने कहा भ्रष्टाचार का समूल नाश करने का उनका उद्देश्य महात्मा गांधी के विचारो के रास्ते पर चल कर पूरा नही होगा बल्कि इसके लिए मराठा राजा शिवा जी के मार्ग का अनुसरण करना पड़ेगा.




'भय बिन होय न प्रीति' पर मै विश्वास नहीं रखता , लेकिन यह भी सत्य है कि कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ हर समय ऐसा भय आवश्यक है जो कि व्यक्ति को अनुशासन व मानवता मे बाँधे रखे.इसके साथ ही हर वक्त व्यक्ति को सत्संग मे रखना भी अनिवार्य है.हर व्यक्ति के अन्दर हर वक्त सत्संग चलता रहना चाहिए न कि तम्संग.मन का आदर्श होना आवश्यक है.इस लिए देश मे हर वक्त वार्ड स्तर पर ऐसी समितियों का गठन होना चाहिए जिसके सदस्यों के एक हाथ मे तलवार व दूसरे हाथ दर्शन शास्त्र हों.प्रबन्धन व व्यवस्थाओं के प्रति हर वक्त वर्तमान मे शिवा जी व गुरु गोविन्द सिँह जैसे व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है. क्योकि व्यक्ति या तो भय मे अनुशासित रहना चाहता है या भयहीनता मे मनमानी आदि व ईमानदार व सीधे साधों को सनकी दीवाना आदि कह कर उनको उपेक्षित रखता है.व्यक्ति या तो शोषित होता है या शोषण करता है ,तटस्थ रहने वालो से शोषणहीन व न्यायवादी प्रबन्धन व व्यवस्था नहीं बनती.बुद्ध व गांधी जैसे कौन हो सकते हैं?आज के बुद्धों से अंगुलिमान शान्त नहीं होते वरन भड़कते हैं. और फिर अकेला बुद्ध या गांधी एक साथ पूरे तन्त्र में सुधार नहीं कर सकता.इसके लिए उनके साथ एक तन्त्र ही हो.एक एक कर बुद्ध कितने अंगुलिमानों को बदल सकता है?यदि पचास साल उसकी सक्रियता मानी जाए तो 36500 व्यक्तियों को शायद अपने जीवन मे सुधार पाये.व्यक्ति को तो सुधार सकता है,पूरी की पूरी भीड़ को सुधारने के लिए भीड़ ही चाहिए.उस भीड़ को सुधारने के लिए जिस पर सिर्फ बातों का असर नहीं पड़ता.हमारे यहां एक कहावत है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते.हमने देखा है कि दबाव मे आकर ही लोग अच्छा कार्य करने के लिए तैयार होते हैं ,ऐसे लोग वास्तव मे असभ्य होते ही है.हाँ,अभी अस्सी प्रतिशत लोग असभ्य है.जो कि कायर, मूर्ख व अज्ञानी है.जिनके बीच मे वे बेहतर होते है जो कि इनके ऊपर धन बल आदि से अपना दबाव बनाए रखते हैं.शेष के सामने यही मनमानी दिखाते फिरते हैं और इन शेष व्यक्तियों को असफल कायर सनकी आदि कहते फिरते है.हालांकि यह शेष व्यक्ति अपने स्थान(ईमानदार, अनुशासित, सौम्य,आदि वातावरण में)सम्मानित होते है. ऐसे मे निन्यानवे प्रतिशत असभ्य समाज मे हर वक्त शिवा जी की आवश्यकता होती है.अन्ना हजारे का कहना ठीक है,गांधी नहीं शिवा जी के रास्ते की आवश्यकता है.वर्तमान प्रबन्धन व न्याय व्यवस्था मेँ गांधी असफल हो जाते है. वे व्यक्ति मेँ उदारता व मानवता लाने के ही कुशल प्रशिक्षक हो सकते है सिर्फ.वे राम रहीम के बटवारे के बीच जिद्दी रहीम को राम के हिस्से का भी टुकड़ा देकर रहीम को सिर्फ शान्त कर सकते है लेकिन त्याग व संयम का पाठ सिर्फ राम को सिखा सकते है लेकिन रहीम को नहीँ.

बुधवार, 23 मार्च 2011

23मार्च 'शहीदी दिवस 'पर भ्रष्टाचार व काले धन ��े खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान !

बताया जा रहा है कि 400लाख करोड़ रुपये काला धन के रुप मे विदेश मे जमा है. यदि यह धन भारत आ जाए तो देश की स्थिति क्या होगी ?



देश के अन्दर 6लाख38हजार 365 गाँव हैँ .यदि कैस भी यह काला धन भारत आ जाए और प्रत्येक गाँव को एक एक करोड़ ही रुपया दे दिया जाए तो गाँव का विकास सम्भव हो जाएगा.वापस आये इस काले धन से प्रत्येक गरीब परिवार के नाम पर अर्द्धसरकारी उपक्रम,कुटीर लघु उद्योग,आदि स्थापित कर भारत को पुन:सोने की चिड़िया बनाया जा सकता है.



स्वामी रामदेव व उनके सहयोगियों के इस अभियान मे यदि देश के नागरिक सहयोग नही करते है तो यह भविष्य मे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए सवसे बड़ा अफसोस होगा.


प्रत्येक नागरिक को इस अभियान प्रति समर्पित होना ही चाहिए.एक बार जय गुरुदेव व उनके शिष्य राजनीति मे कोशिस कर चुके हैं लेकिन क्या हुआ?जब मैं स्वामी रामदेव के अभियान की बात करता हूँ तो लोग कहते है कि देश के कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई मे कोई रुचि न रख कर अब भी गुलामी मानसिकता पर चोट करनी होगी लेकिन वह चोट ऐसी हो कि आम आदमी उल्टा हमारे खिलाफ ही न हो जाए.



देश की जनता जाति,मजहब,क्षेत्रवाद व अन्य संकीर्णताओं मे अब भी उलझी है. अब भी वह चन्द् लोभ मे आ कर अपने वोट का सौदा कर बैठती है. इस पर स्वामी रामदेव बाबा को विचार करना चाहिए.बिना त्याग समर्पण के अभियान तेज होने वाला नहीँ. मै लोगो से स्वामी रामदेव बाबा के अभियान मे सहयोग की बात करता हूँ तो वे अपनी मजबूरियाँ गिना देते हैं.अपनी मजबूरियाँ गिनाने वाला कभी भी देश ,धर्म व कर्त्तव्य प्रति सजग नहीं हो सकता है.उसको झकझोरने के लिए काफी ओज चाहिए.जो विभिन्न संकीर्णताओं को बहा ले जाए .


हर कोई देश मे भगत सिह तो चाहता है लेकिन अपने घर मे नही . सभी गाण्डीव रखे अर्जुन की तरह माया मोह मे फँसे हुए है.



समाचार पत्रों ने आज प्रकाशित किया-'आज से शुरु होगा जाटों का गुरिल्ला आन्दोलन . 'देश का प्रजातन्त्र अब भी भीड़तन्त्र व स्वार्थतन्त्र के रुप में
विराजमान है.जिसका वोट की राजनीति पक्ष लेती दिखती है.ऐसे मे देश के हित मे कठोर निर्णयों के लिए जनता को एक मत करना बड़ा मुश्किल काम है.



आज 23मार्च !


आज के ही दिन सन 1931 ई0 में भगत सिंह ,राजगुरु व सुखदेव,आदि जैसे क्रान्तिकारियों की लड़ाई भी कुप्रबन्धन के खिलाफ थी न कि सिर्फ ब्रिटिश शासन के खिलाफ ही.देश मेँ अब भी कुप्रबन्धन के खिलाफ अनेक शहादतों की आवश्यकता है.इस नजरिये के साथ जब तक हम भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान में नहीं जुड़ते तब तक हम भावी पीढियों के लिए प्रेरणा स्रोत व मार्ग दर्शक नहीं बन सकते.इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग होना आवश्यक है.




ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



A.B.V.INTER COLLDGE,


MIRANPUR KATRA,


SHAHJAHANPUR,

U.P.

23मार्च 'शहीदी दिवस 'पर भ्रष्टाचार व काले धन ��े खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान !

बताया जा रहा है कि 400लाख करोड़ रुपये काला धन के रुप मे विदेश मे जमा है. यदि यह धन भारत आ जाए तो देश की स्थिति क्या होगी ?



देश के अन्दर 6लाख38हजार 365 गाँव हैँ .यदि कैस भी यह काला धन भारत आ जाए और प्रत्येक गाँव को एक एक करोड़ ही रुपया दे दिया जाए तो गाँव का विकास सम्भव हो जाएगा.वापस आये इस काले धन से प्रत्येक गरीब परिवार के नाम पर अर्द्धसरकारी उपक्रम,कुटीर लघु उद्योग,आदि स्थापित कर भारत को पुन:सोने की चिड़िया बनाया जा सकता है.



स्वामी रामदेव व उनके सहयोगियों के इस अभियान मे यदि देश के नागरिक सहयोग नही करते है तो यह भविष्य मे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए सवसे बड़ा अफसोस होगा.


प्रत्येक नागरिक को इस अभियान प्रति समर्पित होना ही चाहिए.एक बार जय गुरुदेव व उनके शिष्य राजनीति मे कोशिस कर चुके हैं लेकिन क्या हुआ?जब मैं स्वामी रामदेव के अभियान की बात करता हूँ तो लोग कहते है कि देश के कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई मे कोई रुचि न रख कर अब भी गुलामी मानसिकता पर चोट करनी होगी लेकिन वह चोट ऐसी हो कि आम आदमी उल्टा हमारे खिलाफ ही न हो जाए.



देश की जनता जाति,मजहब,क्षेत्रवाद व अन्य संकीर्णताओं मे अब भी उलझी है. अब भी वह चन्द् लोभ मे आ कर अपने वोट का सौदा कर बैठती है. इस पर स्वामी रामदेव बाबा को विचार करना चाहिए.बिना त्याग समर्पण के अभियान तेज होने वाला नहीँ. मै लोगो से स्वामी रामदेव बाबा के अभियान मे सहयोग की बात करता हूँ तो वे अपनी मजबूरियाँ गिना देते हैं.अपनी मजबूरियाँ गिनाने वाला कभी भी देश ,धर्म व कर्त्तव्य प्रति सजग नहीं हो सकता है.उसको झकझोरने के लिए काफी ओज चाहिए.जो विभिन्न संकीर्णताओं को बहा ले जाए .


हर कोई देश मे भगत सिह तो चाहता है लेकिन अपने घर मे नही . सभी गाण्डीव रखे अर्जुन की तरह माया मोह मे फँसे हुए है.



समाचार पत्रों ने आज प्रकाशित किया-'आज से शुरु होगा जाटों का गुरिल्ला आन्दोलन . 'देश का प्रजातन्त्र अब भी भीड़तन्त्र व स्वार्थतन्त्र के रुप में
विराजमान है.जिसका वोट की राजनीति पक्ष लेती दिखती है.ऐसे मे देश के हित मे कठोर निर्णयों के लिए जनता को एक मत करना बड़ा मुश्किल काम है.



आज 23मार्च !


आज के ही दिन सन 1931 ई0 में भगत सिंह ,राजगुरु व सुखदेव,आदि जैसे क्रान्तिकारियों की लड़ाई भी कुप्रबन्धन के खिलाफ थी न कि सिर्फ ब्रिटिश शासन के खिलाफ ही.देश मेँ अब भी कुप्रबन्धन के खिलाफ अनेक शहादतों की आवश्यकता है.इस नजरिये के साथ जब तक हम भ्रष्टाचार व काले धन के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान में नहीं जुड़ते तब तक हम भावी पीढियों के लिए प्रेरणा स्रोत व मार्ग दर्शक नहीं बन सकते.इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग होना आवश्यक है.




ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



A.B.V.INTER COLLDGE,


MIRANPUR KATRA,


SHAHJAHANPUR,

U.P.

मंगलवार, 22 मार्च 2011

अपना कर्त्तव्य क्यों निभाएं ?

जानते नही कलियुग है? ईमानदारी पर उतर आये तो रोटी मिलना भी मुश्किल हो जाएगी.हम कर्त्तव्य का पालन क्यो करे?आज कल तो सुविधाजनक व अवसरवादिता है वही ठीक है. धन्य ,आज के व्यक्ति की सोच!!




सुप्रीम कोर्ट दो बार कह चुका है कि कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के लिए हर व्यक्ति दोषी है ?इसका मतलब मेरी दृष्टि मे यह है कि हर व्यक्ति के जागरुक हुए बिना देश मे दीर्घ कालीन परिवर्तन सम्भव नहीं .हर समस्या की जड़ है-मन .

मन मे सृजनात्मक सोच पैदा हुए बिना दूरगामी परिवर्तन सम्भव नही है.न जान कितनी क्रान्तियां हुईं लेकिन उसका प्रभाव कब तक पड़ा?अंगुलिमानों को बुद्ध ही बदल सकते हैं सेना व पब्लिक नहीं.क्रान्ति की तो हर पल आवश्यकता होती है .



* हम क्यो न निभाए अपना कर्त्तव्य ? *



अपने कर्त्तव्योँ का क्रान्ति से घनिष्ट सम्बन्ध होता है.शास्त्रों ने व्यक्ति के तीन कर्त्तव्य कहे हैं - अपने , परिवार व समाज प्रति कर्त्तव्य . आखिर हम अपने कर्त्तव्य क्यों न निभाएं?दुनिया मे सभी एक जैसे नही हो सकते . हम अपना कर्त्तव्य न निभा कर भावी पीढी के मार्गदर्शक व प्रेरणास्रोत तभी हो सकते हैं जब हम ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का पालन करेंगे . इसके लिए हमे संघर्ष व त्याग करना ही पड़ेगा.


यहाँ पर मुझे श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ , नाथ नगरी , बरेली (उ प्र) के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी)के कहे शब्द याद आ जाते है कि एक रोज मेरे जाने का वक्त आयेगा और चला जाऊंगा छोड़कर तुम्हारी दुनिया,जिसमे तुम अपने अहंकार के वजूद को जीवित रखना चाहते हो.मगर फिर भी मुझे किसी से कोई शिकवा या गिला नहीं है,और न ही नफरत है लेकिन अहंकार मेरा परमशत्रु है............. परन्तु यह परिवर्तन की विचारधारा गंगा की निर्मल धारा की तरह अनवरत बहती रहेगी और मनुष्य युगों युगोँ तक परिवर्तन के इन प्रयासों को सफल बनाने के लिए कार्य करते रहेंगे.वर्तमान युग ने जहां हमें ओशो जैसा श्रेष्ठ व्याख्याकार दिया है वहीं दूसरी ओर आचार्य श्रीराम शर्मा जैसा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद व यज्ञपेथी का श्रीगणेशकर्ता , श्री श्रीरविशंकर जैसा आर्ट आफ लीविंग का विस्तार जयगुरुदेव जैसा सन्त , अन्ना हजारे जैसा परिवर्तनकर्ता ,डा ए पी जे अब्दुल कलाम जैसा आदर्श पुरुष .....और भी न जाने कितने नाम.इन सब से हट कर इन तेरह साल मेँ एक और हस्ती उभर कर आ रही है ,जिस हस्ती का नाम है - योगगुरु स्वामी रामदेव. कुप्रबन्धन व भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी को बिगुल बजाना ही था.


हमारा एक ख्वाब था -विभिन्न जातियोँ सम्प्दायोँ के देशभक्त व समाजसेवियों,सन्तोँ को एक मंच पर लाना.क्या यह कार्य योगगुरु स्वामी रामदेव के द्वारा सम्भव नहीं है?आप को इस सम्बन्द्ध मे जयगुरुदेव ,आदि से भी बात करनी चाहिए .वैसे हमे उम्मीद है कि वक्त आने पर वह भी स्वामी रामदेव के मिशन के साथ आयेंगे.श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ, नाथ नगरी ,बरेली (उप्र )के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह(भैया जी) से भी निवेदन है कि वे स्वामी रामदेव जी के मिशन मे सहयोग करने की कृपा करें.आपका यह मिशन हर देश भक्त का मिशन होना चाहिए.




*स्वामी रामदेव जी जरा मेरी भी सुनिए*


अपने मिशन में इण्डिया के स्थान पर भारत नामकरण,नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु सम्बन्धी दस्तावेज,अमेरीका मेँ ओशो को दिया गया थेलियम जहर व व्यवहार,मुसलमानो को साथ ले कर भारत ,पाकिस्तान बांग्ला देश व अन्य सार्क देशों को लेकर एक मुद्रा ,एक सेना ,एक संघीय सरकार,भावी विश्व सरकार ,आदि पर भावी योजना को अपने मिशन मे प्रतीक्षा सूची मे डालने की कृपा करें.


ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



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गुरुवार, 17 मार्च 2011

जापान त्रासदी: ऐ मनुज ���ब भी वक्त है सुधरने क��.

वैज्ञानिको का कहना है कि दुनिया छठे प्रलय काल मे जी रही है जिसके लिए मनुष्य को दोषी माना जाएगा.17-18वीं सदी से पूर्व यह धारणा थी कि प्रकृति को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए.अपनी स्थूल हरकतोँ से प्रकृति में अतिदखल असहज व प्राकृतिकाहितकारक है.प्रकृति पर हावी न होकर तटस्थ रहना आवश्यक है हालांकि सभी प्राचीन सभ्य ताएं प्राकृतिक शक्तियों के सम्मान को निर्देशित करती है.हमारा शरीर पांच तत्वोँ-पृथ्वी,अग्नि,जल,वायु व आकाश से बना है,जिसके साथ दखलनदाजी का मतलब है विभिन्न शरीरों को प्रभावित करना.प्रकृति के प्रति उदारहीन व भोगवादी भाव ने आज पृथ्वी को यहां तक ला कर खड़ा कर दिया है.प्रकृति को देख कर भोग की दृष्टि पैदा होना या मन गीला कर उदारता व सम्मान मिटा प्रभावित हो जाना या कामुकार्षण पैदा कर लेना प्रेत व नर्क योनि की सम्भावनाएं है.



प्रकृति पर कृत्रिम ताएं थोपने का परिणाम तुरन्त या कुछ पीड़ियों तक के लिए तो मानव के लिए आरामदायक व बिलासतापूर्ण जरुर हो सकता है लेकिन प्रकृति में दूरगामी परिणाम घातक हुए हैँ.वास्तव में देखा जाए तो पश्चिम का कोरा भौतिकवाद युक्त विज्ञान दुनिया का भला नहीं कर सकता,हमे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद से अपना व प्रकृति का भला मिल सकता है.दुनिया के पर्यावरणविद् न जाने क्या क्या कहते रहे हैं लेकिन उनकी बातों को अपनी भोगवादी सोंच के सामने दुत्कार देना
सत्ताओं ,पूंजीपतियों व भोगवादियों के लिए गरिमामय लगता रहा. अब भी वक्त है सुधर जाओ , अन्यथा धरती पर जीवन का जीवन ही खतरे मे पड़ जाएगा.लेकिन वास्तव मे मानव काफी गिर चुका है वह भय या दबाव मे तो अनुशासित व संयमित जीवन जीने के लिए तैयार है लेकिन रोजमर्रे की जिन्दगी मे जिन्दा लाश मेँ प्रेत योनि मे ही जी कर वह देवयोनि के व्यक्ति की खामोशी ,सादगी, न्यूनतम भोगी ,आदि को देख कर सिर्फ नुक्ताचीनी ,मजाक उपेक्षा ,आदि का व्यवहार करता है व भौतिकवाद तथा कृत्रिमताओं को सभ्यता का पर्याय मानता है. वास्तव मे यह सनातन धर्म से भटके लोग होते हैं.यह विकास के नाम पर प्रकृति व भूमि की सहजता मिटा कंकरीट, पत्थर आदि से मन्दिर मस्जिद ,मकान आदि खड़े कर सकते है लेकिन ... ..सनातन संस्कृति में जिस प्रकृतिसहचर्य की बात की गयी है व आश्रम व्यवस्था की गयी है,वह ही निरन्तर होनी चाहिए थी.वैदिकता मे हर समस्या का निदान था .भोगवाद ने हमे आज यहां आ पटका,तो दुख काहे का?धरती पर होगा वही,जिसके कारण पहले से उपस्थित हैं.उस पर दुखी होना मूर्खता है.जापान मे जो हो रहा है उसे कौन करणीय सीख लेना चाहेगा?दुनिया का वैदिकता ही भला कर सकती है,अफसोस उससे आज हिन्दू ही काफी दूर जा चुका है.दुनिया का भविष्य क्या किसी मुसलमान(ईमान जिसका मजबूत हो व निर्गुण हो) के हाथ होगा...?


ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



बुधवार, 16 मार्च 2011

शाम भयो श्याम न आयो

शाम भयो श्याम न आयो ,श्याम न आयो


यमुना किनारे यमुना किनारे


अँखिया रे प्यासी दर्शन को

श्याम न आयो

श्याम भयो श्याम न आयो........


बड़ी भक्तन की पंक्ति

हृदयाँगन मे लो है जलती.


यमुना भयी रे फिर से कलुषित


श्याम न आयो मगर श्याम न आयो.



गोपियों से खेलन की मति कौन समझायो


मेरो बासुरी वालो कन्हेया

कभी गाय भी चरायो,


कायर जमाने को भी तू रे जगायो


शाम भयो अब फिर तू रे आयो.



रिश्तो को भी त्यागन की बात कह डारो


महानताओ के सामने रिश्तो को का विचारो.

गुरु तेगबहादुर गोविन्द ने घर ही लुटायो


तेरे सिवा इसका राज कौन समझायो.


लाशो पे रोने वाले है कायर


ये तो तू ही तो अर्जुन को समझायो.

फिर से कन्हैया तू आ जायो



शाम भयो श्याम न आयो......

खामोशी मे जीते रहे थे.....

मेरी मईयत पे वो फूल चढ़ाने न आये


और तो आये मगर वो न आये.



ये जिन्दगी जीती रही थी हर पल उनके लिए


उन्हे क्या पता हम जीते रहे उनके लिए.


मेरी हर श्वासो मेरी हर धड़कन वो बसने लगे थे


मगर थे खामोश तुम चुपचाप जीते रहे उनके लिए.



वो खोजते रहे थे कौन वो शख्स है जो


मेरी मददगार है पर्दे के पीछे से.


खामोश अब भी हूँ मगर दिल मे तूफां लिए


मेरी मईयत पे......



देखो मेरी अर्थी उठी जिसे ले चले यार मेरे


उनके मकां के सामने से ही देखो मेरी अर्थी गुजरे.



इक पल देखा उन्होने झरोखे से


हवा का जो झोका आया उसे वे क्या समझे.



न समझा था जताना सिर्फ महसूस करते थे


न समझा था पाना खोते रहे थे.


उनकी ख्वाईशों के लिए खामोशी मे जीते रहे थे



खामोशी मे जीते रहे थे खामोशी मे जीते रहे थे.



( bindusar kautily ki dayari se)


मंगलवार, 15 मार्च 2011

जिसपे न कोई पथिक अब यह���ँ

सुकुन खो रहा,बेचैन हो रहा



दिलो दिमाग से परेशान हुआ.



है ठिकाना नही,कही यहां



भागता फिर रहा सारे जहाँ .



आबोदाना सब हुआ मर्ज माफिक



सफर ये दिल से दिमाग तक का.



मुश्किल हुआ सफर यहाँ


दिलोदिमाग से परेशान हुआ.




हिन्दोस्ताँ का ख्वाब खो गया



पश्चिमी हवाओ मे खो गया.



ऋषियों मुनियों का दिया रास्ता



जिसपे न कोई पथिक अब यहाँ.


(bindusar ki dayari se)

26जनवरी2009ई0

सोमवार,

मौनी अमावस्या !


26जनवरी !


राष्ट्र से जुड़ा दिन है.



गणतन्त्र हमारा कैसे गुणतन्त्र बने ?


इस पर हमे विचार करना है,

उस पर चलना है.


26जनवरी!


26जनवरी,मेरे ख्वाब से जुड़ा दिन है.


उस ख्वाब के लिए


उस स्वपन के लिए


जिसके लिए मैने 12 वर्ष जमाने की नजर से बर्बाद किए

लेकिन


मेरा कुछ भी बर्बाद नहीं हुआ है.



जो बर्बाद होने के योग्य है


वही बर्बाद होता है.


यह शरीर तभी तक ही सजीव है


जब तक इसमे श्वास चल रही है.


इन 12 वर्षों......?!

खैर छोड़ो !


आज गणतन्त्र दिवस!



कालेज पहुंच कर मैने श्यामपट पर दो वाक्य लिख दिए-


"व्यक्ति के धर्म संस्कार एवं सभ्यता की पहचान उसकी स्वतन्त्रता मे ही होती है दबाव या मजबूरी मे नहीं "


और-


"आओ संकल्प लें गणतन्त्र को गुणतन्त्र बनाने का."


* * *


23 नवम्बर 2008से मै तनाव मे जी रहा हूँ,लगातार तनाव मे जी रहा हूँ.मैं एक षड़यन्त्र मे फँसता खुद को महसूस करने लगा था.अपने को नितान्त अकेला महसूस कर रहा था.मेरे माता पिता भी मेरे मदद मे नहीं थे.जिसके स्मरण मात्र से मैँ अपनोँ
को पराया समझने लगा था.दुनिया मेँ किसे कहूँ अपना ?उन्हेँ जो कहने को तो अपने हैं लेकिन वे हमें समझ न सके?
हमारे हित के नाम पर हमेँ उनसे घुटन बेचैनी ही मिली है
लेकिन....



दुख क्यों ?

इच्छाओं के कारण.


उम्मीदों के कारण.


चैन तभी मिलता है जब न ही किसी को अपना न ही पराया समझूँ.


स्वयं की समस्याओँ का निदान स्वयं ही खोजना होगा अन्य तो समस्याओं को उलझने के लिए ही हैं.


आज 26जनवरी!


शहीदों को मेरा नमन !

सोमवार, 14 मार्च 2011

*नहीं तो हम भी तुम्हारी पसन्द होते*

तड़फते रहे हम तुम्हारे करीब आने को



मगर थे तुम ऐसे,मुझे देखना भी न गँवारा .



मेरी तड़फ का तुम क्या एहसास करते



हर पल तुम ही तुम,तुम ही ख्वाब थे.



काश तुम भी करते किसी से मोहब्बत



जिनकी नफरत का तुम एहसास करते.



हम थे कि कितने तड़फे कितने तड़फे



काश तुमको भी ऐसे एहसास होते.



तुम्हारा दिल है कि है पत्थर



मोहब्बत का तुम क्या एहसास करते.



चलो ठीक है,खुश हो तुम जिन्दगी मे



खुदा से दुआ कि तुम मिलो अगले जन्म मे.



इस जन्म तो लायक न हम तुम्हारे



नहीं तो हम भी तुम्हारी पसन्द होते..


(Bindusar ki dayari se)

रविवार, 13 मार्च 2011

मेरा जीवन मेरे सपने:ब��न्दुसार कौटिल्य

कुण्डलिनी व योग विज्ञान में प्रथम चार अवस्थाओं का अपने निज(प्राण)तक पहुचने मे बड़ा महत्व होता है.यह प्रथम चार अवस्थाएं है-स्थूल,भाव,सूक्ष्म और मनस.जिनको साधना आवश्यक है जो कि योग के प्रथम पांच अंग-यम,नियम,आसन,प्राणायाम व प्रत्याहार के बिना असम्भव है.कुछ को साधना मे विशेष मेहनत नही करनी पड़ती इसका कारण उनका नजरिया व अन्तर्प्रवृत्ति होती है तब मेण्टल शरीर की प्राकृतिक सम्भावनाएं कल्पना व स्वपन क्रमश:संकल्प व अतीन्द्रिय दर्शन मेँ परिणित होने मे देर नहीं लगती ,एस्ट्रल बाडी की प्रकृति सम्भावनाएं सन्देह व विचार क्रमश:ऋद्धा व विवेक मे परिणित हो जाता है.जो अपने को अन्तर्मुखी व वहिर्मुखी दोनो स्थितियों में लाने की कला से परिचित होता है वही वास्तव मे सफलता पा सकता है. मैँ उसे स्वपन कहूं या अतीन्द्रिय दर्शन...?मेरे कुछ स्वपन यथार्थ से जुड़े दिखे हैँ.वे हमे दिशा निर्देशित भी करते रहे हैं. लेकिन उन पर पूर्ण विश्वास व जग चमक प्रभाव कारण अपने जीवन मेँ उन पर अमल नही कर पाते.





श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ ,नाथ नगरी,बरेली(उ प्र) के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी) का मानना है कि अपने अन्दर उपस्थित नारी शक्ति को जब हम जगा लेते है, नगेटिव व पाजटिव शक्ति अर्थात निष्क्रिय व सक्रिय शक्ति का अपने शरीर के अन्दर सम्भोग करा लेते हैं तो चारो स्तरोँ को पार कर स्व तन्त्र पर आ जाते हैं.


हमने अनेक सम्भावनाओं को मन मे जिया है,ऐसे मे हमसे लोग कहते है कि तुम तो कहते थे कि अमुख काम पहले बार किया है लेकिन लगता है कि ऐसा पहले भी कर चुके हो.विभिन्न सम्भावनाओ को मन मे जीने से हम बुरी आदतों से भी मुक्त हो सकते है.मानो हमने सोसायटी मेँ पड़ कर एक बार शराब पी,एक बार ही शराब पीने की घटना से हमने जीवन भर के लिए मानसिक स्थितियां जी लीं कि अरे,यही दारु का मजा है ? चलो एक बार पी ली सारे जीवन के लिए काफी है.अब हम दारु से मुक्त हुए.इस की लत से क्या फायदा?इसी तरह सांसारिक अन्य विषयों के लिए भी.



*मेरे सपने....?*


(1)पांच साल पहले तक मै एक मकान स्वपन मे देखा करता था. चार साल पहले उस मकान मे एक फैमिली आकर रहने लगी ,जिसके मेम्बरस मे एक युवती भी शामिल थी.उस फैमिली के आने के बाद मैने फिर वही मकान स्वपन मे देखा,स्वपन मेँ उस युवती के साथ सम्भोग किया.इस स्वपन को देखने के बाद फिर कभी स्वपन मेँ इस मकान को नहीं देखा.



(2)किशोरावस्था से ही मैँ एक स्वपन मेँ एक अन्य मकान देखता था जिसमे मै एक लड़की की तलाश मेँ रहता था लेकिन लड़की जीप को ड्राइव कर मकान से बाहर निकल जाती थी.जब मै01जुलाई2004ई0 को कटरा (KATRA)आया तो मेरे साथ कुछ ऐसी घटनाएं घटीं जिनका मुझे पूर्व एहसास हो जाता था.एक मैँ दिन एक गली मे पहुचा ही कि मुझे लगा कि मै यहां आ चुका हूँ .फिर आगे बढ़कर मै जिस मकान को देखा तो आश्चर्य,यह सब तो मै स्वपन मेँ देखता रहा हूँ.इसके मै जो जो पूर्व अनुमान लगाता गया ,वह जीवन में घटता चला गया .

(3)इसी तरह एक रात मैने स्वपन मे एक जीप को सड़क पर पलटा देखा ,साथ ही दो लाशें भी देखी.सुवह मै तैयार हो शाहजहाँपुर जाने के उद्देश्य से घर से बाहर निकला.सड़क पर आते ही मुझे एक जीप मिल गयी लेकिन मै उससे उतर पड़ा.एक बालक आकर हमसे बोला "पापा बुला रहे है हम लोग साथ साथ ही चलेगे."
जब बाद मेँ हम उस बालक व उसके पिता जी के साथ दूसरी जीप से शाहजहापुर जा रहे थे तो आगे मध्य रास्ते पर देखा पहली जीप दुर्घटनाग्रस्त हुई पड़ी थी.

(4)मुझे अपने आस पड़ोस मे एक दो आत्माओ का एहसास होता रहा है लेकिन दो वर्षो से ऐसा नही है.दो वरस पहले एक मैने एक स्वपन देखा कि हमसे एक युवक कह रहा है कि यह सफेद कपड़ा हटाओ.एक सफेद कपड़ा मै एक पेड़ पर टंगा देख रहा था.
सुबह उठ कर मै मंजन करते करते मकान से बाहर आ गया.अचानक मेरी निगाह फाटक मे बँधे एक सफेद कपड़े पर गयी तो मुझे रात को देखा स्वपन याद आ गया.मै तुरन्त अन्दर आ कर मकानमालिकिन के पास पहुंचा

" चाची,बाहर फाटक पर सफेद कपड़ा कैसा बँधा है?"



"उसको हटाना नहीँ,एक बाबा जी ने बाँधते हुए कहा है कि अब कोई भूत बाधा नहीं आयेगी. "



इस तरह की घटनाओ को क्या कहा जाए?

हाँ,मै इतना जानता हूँ कि दुनिया से प्रभावित हुए बिना यदि धैर्य व संयम रखते हुए अन्तर्मुखी जीवन भी जिया जाए तो हम अपने आस पास घटने वाली घटनाओ का पूर्व एहसास कर सकते है.



शेष फिर .....



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गुरुवार, 10 मार्च 2011

बिन्दुसार कौटिल्य की डायरी से

*चुनौती*


यदि दम है उनमे ,

निकल कर दिखायें मेरे दिल से

चुकने का नाम नही मोहब्बत,

बढ़ती ही जाए मोहब्बत.


खत्म हो जाए जो,

वो भी क्या है यारो मोहब्बत

वो न करे हमसे मोहब्बत तो क्या,

हमे तो है मोहब्बत.


मेरे दिल से जुदा करके तो

दिखाये वे मोहब्बत


यदि दम है उनमे ,

निकल कर दिखाये मेरे दिल से.




*.....क्या है दम ?! *


मेरा प्यार क्या प्यार नही,

कूड़ा करकट है

जी रहा तेरी याद ले

मर भी जाऊँ तेरे याद मे.


तू है कितने दमखम मे

मै भी जरा देख लूँ

खुद को निकाल कर तो

दिखा मेरे दिल से.

......क्या है दम ?!




* किसकी जरूरत थे हम*


किसकी पसन्द मे थे हम,

किसकी नजर मे थे हम

किसकी जरुरत थे हम,
किसके दिल थे हम.



*निशानियाँ....*


जिनके दिल मेँ हम नही है

वो हमे क्या याद करेगे ;


जो हमारे दिल मे है

उनके लिए निशानिया छोड़ जाएंगे.



*यादों के साये....*


मेरी जिन्दगी मे लोग आ आ के चले गये

मगर हम अब भी यादों के साये मे जी रहे.



*जताना न आया*


हमने याद किया जग को

किसने याद किया हमको;

अफसोस यही सिर्फ है यारो

जताना न आया हमको.



* सौदेबाजी न की*


बहुत आये मगर मैने

सौदेबाजी न की


बिकने को तैयार था

नहीं मै;


किसी के आँखो मे चमक वो न देखी

मोहब्बत मेँ दीवानी जिन्दगी न देखी.



*सपने सच नही*


कोई हमे स्वीकारता तो तारे भी तोड़ लाते


कोई हमसे मोहब्बत करता तो उसपे मरते.


क्या क्या ख्वाब थे
उन्हे सहज रखने के

हम उन्हे रखते हर वक्त पलकों पे.




*मिलना अगले जन्म*



चलो कोई बात नही पूरी हो चाहतें तुम्हारी


मेरी न कोई चाहत है मोहब्बत के सिवा.


चाहे मोहब्बत मेरी

खुश रहो तुम सदा


हम तो अब चल दिये

मिलना अगले जन्म.



ख्वाब थे नसीब मे

वे भी मिट रहे


मौत अब करीब है

मगर बेचैन है.


अगले जन्म मे जरुर तुम संग होगे

पा तो लिया ही मन
से हमने तुम्हे.




*चलते चलते फिर....*



यदि दम है उनमे

निकल कर दिखाये मेरे दिल से





बिन्दुसार कौटिल्य कौन?


जानेगे भविष्य में.



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