बुधवार, 16 मार्च 2011

खामोशी मे जीते रहे थे.....

मेरी मईयत पे वो फूल चढ़ाने न आये


और तो आये मगर वो न आये.



ये जिन्दगी जीती रही थी हर पल उनके लिए


उन्हे क्या पता हम जीते रहे उनके लिए.


मेरी हर श्वासो मेरी हर धड़कन वो बसने लगे थे


मगर थे खामोश तुम चुपचाप जीते रहे उनके लिए.



वो खोजते रहे थे कौन वो शख्स है जो


मेरी मददगार है पर्दे के पीछे से.


खामोश अब भी हूँ मगर दिल मे तूफां लिए


मेरी मईयत पे......



देखो मेरी अर्थी उठी जिसे ले चले यार मेरे


उनके मकां के सामने से ही देखो मेरी अर्थी गुजरे.



इक पल देखा उन्होने झरोखे से


हवा का जो झोका आया उसे वे क्या समझे.



न समझा था जताना सिर्फ महसूस करते थे


न समझा था पाना खोते रहे थे.


उनकी ख्वाईशों के लिए खामोशी मे जीते रहे थे



खामोशी मे जीते रहे थे खामोशी मे जीते रहे थे.



( bindusar kautily ki dayari se)


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