गुरुवार, 17 मार्च 2011

जापान त्रासदी: ऐ मनुज ���ब भी वक्त है सुधरने क��.

वैज्ञानिको का कहना है कि दुनिया छठे प्रलय काल मे जी रही है जिसके लिए मनुष्य को दोषी माना जाएगा.17-18वीं सदी से पूर्व यह धारणा थी कि प्रकृति को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए.अपनी स्थूल हरकतोँ से प्रकृति में अतिदखल असहज व प्राकृतिकाहितकारक है.प्रकृति पर हावी न होकर तटस्थ रहना आवश्यक है हालांकि सभी प्राचीन सभ्य ताएं प्राकृतिक शक्तियों के सम्मान को निर्देशित करती है.हमारा शरीर पांच तत्वोँ-पृथ्वी,अग्नि,जल,वायु व आकाश से बना है,जिसके साथ दखलनदाजी का मतलब है विभिन्न शरीरों को प्रभावित करना.प्रकृति के प्रति उदारहीन व भोगवादी भाव ने आज पृथ्वी को यहां तक ला कर खड़ा कर दिया है.प्रकृति को देख कर भोग की दृष्टि पैदा होना या मन गीला कर उदारता व सम्मान मिटा प्रभावित हो जाना या कामुकार्षण पैदा कर लेना प्रेत व नर्क योनि की सम्भावनाएं है.



प्रकृति पर कृत्रिम ताएं थोपने का परिणाम तुरन्त या कुछ पीड़ियों तक के लिए तो मानव के लिए आरामदायक व बिलासतापूर्ण जरुर हो सकता है लेकिन प्रकृति में दूरगामी परिणाम घातक हुए हैँ.वास्तव में देखा जाए तो पश्चिम का कोरा भौतिकवाद युक्त विज्ञान दुनिया का भला नहीं कर सकता,हमे वैज्ञानिक अध्यात्मवाद से अपना व प्रकृति का भला मिल सकता है.दुनिया के पर्यावरणविद् न जाने क्या क्या कहते रहे हैं लेकिन उनकी बातों को अपनी भोगवादी सोंच के सामने दुत्कार देना
सत्ताओं ,पूंजीपतियों व भोगवादियों के लिए गरिमामय लगता रहा. अब भी वक्त है सुधर जाओ , अन्यथा धरती पर जीवन का जीवन ही खतरे मे पड़ जाएगा.लेकिन वास्तव मे मानव काफी गिर चुका है वह भय या दबाव मे तो अनुशासित व संयमित जीवन जीने के लिए तैयार है लेकिन रोजमर्रे की जिन्दगी मे जिन्दा लाश मेँ प्रेत योनि मे ही जी कर वह देवयोनि के व्यक्ति की खामोशी ,सादगी, न्यूनतम भोगी ,आदि को देख कर सिर्फ नुक्ताचीनी ,मजाक उपेक्षा ,आदि का व्यवहार करता है व भौतिकवाद तथा कृत्रिमताओं को सभ्यता का पर्याय मानता है. वास्तव मे यह सनातन धर्म से भटके लोग होते हैं.यह विकास के नाम पर प्रकृति व भूमि की सहजता मिटा कंकरीट, पत्थर आदि से मन्दिर मस्जिद ,मकान आदि खड़े कर सकते है लेकिन ... ..सनातन संस्कृति में जिस प्रकृतिसहचर्य की बात की गयी है व आश्रम व्यवस्था की गयी है,वह ही निरन्तर होनी चाहिए थी.वैदिकता मे हर समस्या का निदान था .भोगवाद ने हमे आज यहां आ पटका,तो दुख काहे का?धरती पर होगा वही,जिसके कारण पहले से उपस्थित हैं.उस पर दुखी होना मूर्खता है.जापान मे जो हो रहा है उसे कौन करणीय सीख लेना चाहेगा?दुनिया का वैदिकता ही भला कर सकती है,अफसोस उससे आज हिन्दू ही काफी दूर जा चुका है.दुनिया का भविष्य क्या किसी मुसलमान(ईमान जिसका मजबूत हो व निर्गुण हो) के हाथ होगा...?


ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



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