शनिवार, 26 मार्च 2011

सनातन यात्रा का एक पड़��व-मुसलमान !

धर्म व अध्यात्म प्राणियों के बीच द्वेष व मतभेद नहीं रखता.हम हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य,सेवा व दया भाव का जिक्र सभी जगह पर मिलता है.मन्दिर, मस्जिद, आदि धर्मस्थल व सम्प्रदाय ,आदि तो सनातन यात्रा के विभिन्न स्तरोँ ,चक्र,लतीफ,system,आदि के आधार पर पड़ाव है,हमारे अन्तस्थ धर्म के.


जन्म के बाद
इस संसार मे अन्तस्थ यात्रा का पहला पड़ाव है-स्थूल,मूलाधार चक्र अर्थात reproductory.हमे लगता है अधिकतर लोग इसी स्तर पर आकर रुक गये हैँ.शहद के बर्तन मेँ चिपकी मधुमक्खी की तरह हो गये हैं,जो चिपक मे ही आनन्दित हो भूत व नरकीय योनि की सम्भावनाओं मेँ जी रहे है.'लतीफा-ए-उम्मुद-दिमाग 'अर्थात सहस्राधार चक्र तक की यात्रा का ख्वाब तक नहीं रखते .इनमे से कुछ यल्ह अर्थात अल्हा का अपने भौतिक दुखों व भौतिक लालसाओं के कारण स्मरण संसार की निर्जीव वस्तुओं से निर्मित चित्रों, मूर्तियों, मजारों ,मजहब- स्थलों ,आदि में उलझ कर रह जाते है. वे यह नहीं जानते कि आत्मसाक्षात्कार के बिना हम यल्ह तक नहीं पहुंच सकते.




इससे हट कर अपने ईमान पर पक्का होना क्या गलत है?मुसलमान का अर्थ क्या है ?अपने ईमान पर पक्का होना न ! क्षेत्रीयता(हिन्दू शब्द की शाब्दिक परिभाषा में जायें) ,जाति,छुआ छूत,मजहब स्थलों,सम्प्रदाय,मूर्तियां,आदि से ऊपर उठ कर इन्सानियत,दया,सेवा,आत्म साक्षात्कार,अपने पराये भाव से मुक्ति,नमाज (सूर्य नमस्कार) ,दान,हज,आदि के माध्यम से यल्ह अर्थात ईश्वर तक पहुंच सकते हैं.



सऊदी अरब की मक्का मस्जिद के इमाम ए हरम शेख अब्दुर रहमान बिन अब्दुल अजीज अल सुदेस ने कहा कि दुनिया को इस वक्त अमन की सर्वाधिक दरकार है.इसी रास्ते पर चल कर इंसानियत महफूज रह सकती है.अमन की पहल मुसलमान करें.



वास्तव में जो अपने ईमान पर पक्का है ,वही दुनिया में अमन चैन व बसुधैव कुटुम्बकम की बात कर सकता है.तमाम मुल्कों के शरहदों को नकारते हुए दुनिया के इन्सान की हिफाजत की बात वही सोंच सकता है जो अपने ईमान पर पक्का है.हमे इस पर चिन्तन करना चाहिए कि तमाम मुल्कों की शरहदें आम आदमी के लिए खोल देनी चाहिए.शरहदें सिर्फ प्रशासनिक हों.



सच्चे मुसलमान थे मोहम्मद साहब लेकिन उनके गुजर जाने बाद सनातन यात्रा मेँ रुकावट आ गयी .इसके बाद मुस्लिम सम्प्राय तो बढ़ा लेकिन सनातन धर्म के यात्रा में रुकावट आ गयी.समूर्ण इंसानिय त के स्थान गुट,मस्जिद ,मजारों,आदि पर इनके अनुयायी भी आ टिके.अन्तर्यात्रा में रुकावट आ गयी.




दुनिया मे हमे एक ऐसा मंच चाहिए जहाँ गैरमुसलमानों का भी अपना दर्जा हो.हम आगे बढ़ गये है,अगले पड़ावों की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम निचले पड़ाव पर खड़े व्यक्तियों को वक्त न देँ. जो अ, आ ,इ ,ई,......ध्वनियां सीखने के लिए अमरुद,आम,इमली,ईख,.......आदि में उलझे हैं ,उनका हम विरोध भी नहीं कर सकते.




बरेली,उप्र में प्रस्तावित श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी) से 20 दिसम्बर 2010ई0 को मुलाकात हुई,सब कुछ ठीक था.ईमान पर पक्के होने की बात उनमें थी ,वहां ओम तत् सत् की बात थी.लेकिन हम चित्रों ,मूर्तियोँ ,धर्म स्थलों ,आदि मेँ क्यों उलझें ?लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि बच्चों को काफिर कह उनसे द्वेष रखें.हाँ,वे अभी बच्चे ही हैं जो कि चित्रों ,मूर्तियों, मजारोँ ,धर्म स्थलों ,आदि में उलझे हैं,उनसे मुख मोड़ लें. उन्हें भी प्रेम व स्नेह दो .इसका फायदा भविष्य में हो सकता हैँ.चलो ,यह तो है कि वे ईश्वर को याद तो कर रहे है.शायद भविष्य मेँ वे शेष अगली यात्रा तय कर सकें?



इन दिनों यहां मीरानपुर कटरा में महान प्रसिद्ध सूफी संत हजरत सैय्यद दूल्हा मियां कलीमी व हजरत सैय्यद मसरुर मियां कलीमी का 23मार्च से सालाना उर्स चल रहा है.जहां बंगाल ,बिहार ,कलकत्ता ,मुम्बई ,दिल्ली सहित तमाम प्रान्तों से हजारों की संख्या में जायरीनों का आना चालू है.जिसके इन्तजाम में कुछ गैरमुस्लिम भी लगे हैं.सम्पूर्ण व्यवस्था प्रमुख रूप से दरगाह मुतावल्ली हजरत सैय्यद मसूद अहमद कलीमी देख रहे हैं.बंगाल के कुछ जायरीन से मैने मुलाकात की ,उन्होने माना कि दुनिया के तमाम मजहब तो रास्ता हैं जो इंसान को सनातन धर्म की यात्रा पर डालते हैं.दोष तो इंसान में होते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार को न पकड़ संसार की निर्जीव वस्तुओं के सहारे आगे की यात्रा न तय कर निर्जीव वस्तुओं या संसार में उलझ कर रह जाते हैं और आगे की यात्रा तय न कर खुदा से सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते.



ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



miranpur katra,

shahjahanpur,U.P.

3 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

sarthak v sundar aalekh .badhai .
aapke blog ka ullekh maine ''ye blog achchha laga ''par kiya hai .jiska URL''http://yeblogachchhalaga.blogspot.com''hai .aap aayen v apne vicharon se avgat karayen .

शालिनी कौशिक ने कहा…

वास्तव में जो अपने ईमान पर पक्का है ,वही दुनिया में अमन चैन व बसुधैव कुटुम्बकम की बात कर सकता है.तमाम मुल्कों के शरहदों को नकारते हुए दुनिया के इन्सान की हिफाजत की बात वही सोंच सकता है जो अपने ईमान पर पक्का है.हमे इस पर चिन्तन करना चाहिए कि तमाम मुल्कों की शरहदें आम आदमी के लिए खोल देनी चाहिए.शरहदें सिर्फ प्रशासनिक हों.
bahut achchha sandesh v gyan deti post.

आकाश सिंह ने कहा…

हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई सब आपस में भाई भाई -- कविता को आपने चरितार्थ कर दिया|
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आपके ब्लॉग पे आया
बहुत ही बढ़िया पोस्ट है
बहुत बहुत धन्यवाद|
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