बुधवार, 17 अगस्त 2011

ASHOK BINDU : THAT IS...

मैं कालेज के आफिस मेँ बड़े बाबू के पास बैठा था.
"सात्विक हो जाना मानव के जीवन मेँ एक क्रान्तिकारी घटना है लेकिन है
कौन?"मैं खामोश हो मन ही मन सोंच रहा था.
"खानपान कैसा है?यह हमारे नजरिया पर निर्भर है."-बड़े बाबू बोले.
मैं सोंचने लगा था -"व्यक्ति के सात्विकता की पहचान क्या है?सिर्फ
शाकाहारी व दूध उत्पाद का सेवन करने वाला?यदि कोई शाकाहारी नहीं है लेकिन
वह मधुरता,उदारता,ईमानदारी,दया,सेवा,सत,आदि भाव में जीकर आचरण करता है वह
क्या सात्विक नहीं है?जो शाकाहारी भोजन करता है क्यों न वह
असत्य,अन्याय,शोषण,कष्ट,अपराध,आदि के लिए जीता हो?गायों ,बकरियों,आदि के
दूध पर उनके बच्चों का हक मार स्वयं इस्तेमाल करना क्या सात्विकता है?"
तीन व्यक्ति जब बड़े बाबू से मिलने आ गये ,जिनमेँ से एक थे-मुनीष पाल सिंह
;मैं आफिस से निकल कर बाहर आ गया.

मैं अब भी विचारों मेँ था-"हिंसा ,जबरदस्ती ,दूसरे के कर्त्तव्यों में
अवरोध ,आदि क्या सात्विक कर्म है?"

मैं फिजिक्स लैब में आकर बैठ गया था.जब अंग्रेजी प्रवक्ता पाण्डेय जी
साईकिल पर सवार होकर लैब के अन्दर ही आ पहुंचे तो मैने उनसे नमस्ते कर
दैनिक जागरण अखबार मांगा तो -"पहले बड़े गुरुजी के सामने रख दूँ फिर चाहें
वहां से उठा लेना."
कह कर वे अखबार लेकर प्रधानाचार्य कक्ष की ओर चल दिए तो मैं भी उनके
पीछे पीछे हो लिया.प्रधानाचार्य कक्ष मेँ प्रवेश से पहले ही शर्मा जी
अध्यापक ने उनसे अखबार ले लिया.

पाण्डेय जी मेरा चेहरा देखने लगे.


* * *
मै अपने कालेज जीवन की एक घटना में खो गया.
मेरे मकान पर कुछ वर्षों से तीन विद्यार्थी किराये पर रह रहे थे,जिनमेँ
से दो बहिने व एक दोनों का भाई था.मकान परिवर्तित करते वक्त वे एक थैली
मेँ रखा सामान भूल गये थे.तीन चार घण्टे बाद भाई मकान पर आ पहुंचा.दरबाजा
मैने ही खोला था.वह बोला था-"भैया,एक थैली यहीं भूल गया हूँ." मैँ बोला
था-"हां,है तो."

लेकिन-
जब वह अन्दर मेरे परिजनों के बीच गया तो -"कैसी थैली?कौन सी थैली?देख लो
कमरे मेँ....हमेँ तो कोई थैली नहीं मिली.."

"भैया भी कह रहे हैँ कि हाँ,है तो."

"तो देख ले जाकर कमरे मेँ.हम लोगों ने तो देखा नहीं.भाई तो पागल
है.हाँ,कूड़े भरी थैली जरुर कमरे मेँ एक कोने पर पड़ी थी."


मैं कक्षा पांच में था तभी से सोचना प्रारम्भ कर दिया था.यह दुनिया
मुझे भ्रम लगने लगी थी.कक्षा सात तक मेरे टीचर रहे थे-ठाकुर हरिपाल
सिंह.जिनकी बोध कथाएं हमेँ प्रेरणा देती रहीं थीं लेकिन दुनिया को सोचना
नहीं चाहिए यह मैं इण्टर क्लास के दौरान ओशो साहित्य से जाना.खैर सोंचना
मेरे जीवन का एक खास गुण हो गया.


मैं छत पर जा कर मेडिटेशन करने लगा था.

* * *

देश में आपातकाल लागू था.इस दौरान मेरा मुण्डन संस्कार हुआ.मुण्डन
संस्कार के दौरान हवन और बकरे की बलि...?!गांव मेँ रह रहे एक साधु जो कि
मेरे मुण्डन संस्कार के दौरान उपस्थित थे,को मैं भूल चुका था.अचानक एक
दिन जब मैं कक्षा सात का विद्यार्थी था,गांव में गांवपूजा के दौरान वे
मिल गये.
"बेटा,मैने तेरे मुण्डन संस्कार के दौरान बकरा बलि कारण पैदा हुई तेरी
परेशानी मेँ तुझे समझाया था कि तू जिन लोगों के बीच है उनसे काफी ऊपर उठ
कर है.मैं देख रहा हूँ तेरे खानदानी भक्ति से निकल कर संसारी हो रहे
हैं.तेरे रास्ते के रोढ़े ये तेरे खानदानी ही होगे और फिर इस दुनिया से
क्या उम्मीद रखना?तुझे अकेला नितान्त अकेला चलना पड़ेगा जीवन मेँ.तू सिर्फ
सेहत भजन व पढ़ाई पर ध्यान लगा आगे बढ़ सकता है.संसार में माया मोह लोभ से
नही. "

"बलि की परम्परा गलत है इसके खिलाफ मेरे पिता जी आये और भाई अनूप के
मुण्डन संस्कार मेँ बकरे की बलि नहीं चढ़ने दी लेकिन ये खानदानी अब कहते
है कि भाई अनूप फिर एक साल के अन्दर इस लिए मर गया कि......."


"जो कह रहे हैं कि बलि नहीं दी गयी इस लिए तेरा भाई मर गया वे धार्मिक
लोग नहीं हैं.हां जिन्दा भूतयोनि के हो सकते हैँ.देव योनि व इससे ऊपर की
शक्तियों को समर्पित व्यक्ति ऐसा नहीं कह सकते."


अशोक बिन्दु : यानि कि......

सन 1993ई के नवम्वर ! एस एस कालेज,शाहजहांपुर में साहित्यकार आकुल जी व
बाल साहित्यकार नागेश पाण्डेय 'संजय' से मुलाकात हुई.यहीं मेरा उप नाम
रखा गया -अशोक बिन्दु.इसके साथ जुड़ चुका था एक स्वपन.
सन 2008ई के आते आते वह स्वपन चकनाचूर.उस स्वपन के अनुकूल परिस्थितियां
बनी थीं लेकिन फायदा न उठा पाया.अबसर को पकड़ न पाया.

मैं लिखता क्यों हूँ?


कुछ लोगों को मेरे लिखने से शिकायत रही है.जब मैं पूछता हूं लोग क्यों
लिखते है?तो इसका उत्तर उनके पास नहीं होता.


मैं कौन हूँ ....?

हम क्या अपने से परिचित हैं?हम क्या हडडी मांस का बना शरीर हैं?मनुष्य
अपने अनेक जन्म अपने स्थूल शरीर के लिए गंवा देता है.मनुष्य के शरीर को
चार भागों मेँ बांट सकते हैं-स्थूल,भाव,सूक्ष्म,मनस.आत्मा इन चारों के
ऊपर है.मनुष्य जिन्दगी भर सिर्फ स्थूल शरीर में गंवा देता है.रोटी,कपड़ा,
मकान,सेक्स,आदि का सम्बन्ध स्थूल शरीर से है.इलाज भी कर रहे हैं तो
सिर्फ अपने शरीर का,जो हमारे सम्पूर्ण ब्यक्तित्व का सिर्फ सातवां भाग
है.हमारा ब्यक्तित्व मन ,बुद्धि ,भावनाएं, आत्मा ,देवत्व,ब्रह्म,आदि से
मिल कर बनता है.हमारे दुख व रोगों का कारण यह है कि हमने नगेटिव व पाजटिव
में साम्य स्थापित नहीं किया.हमने अपने अन्दर स्व इच्छाएं तो पाल लीं
लेकिन पर इच्छाएं नहीं पालीं,हमने अपने अन्दर द्वेष तो पाल लिया लेकिन
प्रेम न पाला,हमने अपने अन्दर खिन्नता तो पाल ली लेकिन नम्रता न
पाली.....हम जिन्दगी जीते जी मौत के करीब आ जाते हैं लेकिन माया मोह लोभ
से मुक्त नहीं हो पाते.मिठाई पर चिपकी मक्खियों की तरह हो जाते हैं
हम.हमारी कोई मानसिक तैयारी नहीं होती संसार से जाने की.शरीर कष्टों व
नगेटिव मन के शिकार हुए ही प्राण त्याग देते हैँ .शान्ति व सुकून मेँ
मरने की कला से हम अन्जान होते है क्योंकि हम खुद को न जाने.

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