शनिवार, 3 सितंबर 2011

पुष्प पर चोट!

उन दिनों की बात है जब मैं पुवायां स्थित शिशु मंदिर मेँ शिक्षण
कार्य करता था.उन दिनों प्रधानाचार्य थे-राजेन्द्रनगर बरेली के निवासी
क्रान्तिगिरि गोस्वामी.कक्षा दो मेँ एक छात्र था-पुष्प.मुझे ध्यान है एक
बार जब वह तीन दिन लगातार विद्यालय नहीं आया तो मैं उसके घर पहुंचा.
ज्ञात हुआ कि वह बीमार है .उसकी माँ से पता चला कि इसने तो रात के दो बजे
सबको परेशान कर दिया .ड्रम मेँ जा कर छिप गया था.लोगों ने काफी ढूंढा .दो
दिन बाद पुष्प विद्यालय पुन: आ गया था.वह झूलों के पास खड़ा अन्य बच्चों
को झूलते देख रहा था.वह मात्र देख रहा था...?!कुछ बालक बालिकाएं एक दूसरे
से जिद्द कर रहे थे कि हम पहले झूलेँगे हम पहले झूलेंगे.जब मैं वहां
पहुंचा बच्चों ने मुझे घेर लिया और मुझसे झुलवाने के लिए कहने लगे.मेरी
निगाह कुछ दूरी पर खड़े पुष्प पर थी."पुष्प को देखो तुम लोग.कैसा खड़ा है
शान्त?और तुम लोग हो कि जिद्द किए जा रहे हो."एक बालिका बोली-"वह तो पागल
है." "अच्छा,सब पुष्प के पीछे एक पंक्ति मेँ आओ.एक एक कर सबको झुलवाया
जाएगा.."
एक झूले पर मैने पुष्प को बैठा दिया.वह झूलता रहा.मैँ बस,उसे मुस्कुराते
हुए देखता रहा.तब वह भी मुस्कुरा देता,हालांकि उसके चेहरे पर हल्का आ
टपका था.उस दिन के बाद पुष्प मेरे से खुला और मुझसे बातचीत करना शुरु कर
दिया.एक दिन अवकाश के बाद उसे मैं एक खाली पड़े रुम मेँ ले गया और उससे
बातचीत करने लगा.फिर धीरे धीरे गीत कहानियों की चर्चा के बाद हल्के
हल्के उस पर मुटठी से वार करने के अभिनय के साथ ढिशुम ढिशुम कहने लगा.मैँ
बोला-"अरे हीरो तो पिट रहा,हीरो तो पिट रहा." तब वह फिर मुस्कराकर
बोला-"पिटा थोड़े ही हूँ.हीरो तो बाद मेँ मारता है."वह अपने नन्हें हाथों
की मुटठी बना कर मुझपे वार करने लगा.मैं मन ही मन मुस्कुराया....
समाज मेँ शिक्षा शिक्षण शिक्षक का क्षेत्र एक दायरे तक सीमित हो सकता है
लेकिन बालक के बालक के सर्वांगीण विकासार्थ ऐसा नहीं.बालकों के अन्दर जो
दायरे पनप रहे,दबाव जो पनप रहे वे टूटने ही चाहिये.चाहें वे कैसे भी
टूटें सिर्फ नैतिकता बनी रहे,बस.उस रात्रि ड्रम ......?!
चौथे दिन बालक ने उस रात का जो जिक्र किया,वह प्रस्तुत है-उन दिनों बरसात
के दिन थे.वह छत पर अपनी माँ के साथ सोया हुआ था.लेकिन ...?!
वह जो स्वपन देख रहा था,वह भयावह था और जब तेज बादलों की गरज एवं बिजली
की चमक हुई तो वह चौँक कर जाग गया.अंधेरी रात में वह अपने की अकेला पा कर
और डर गया.हल्की हल्की बूंदे पड़ने लगी थी.वह छत पर एक कोने मेँ जाकर
दीवार से सट कर खड़ा हो गया.जब उसका भींगना तेज हो गया तो वह फिर छत पर
पड़े एक ड्रम मेँ जा कर बैठ गया और ड्रम का ढक्कन नीचे कर ड्रम को बंद
करलिया.उस समय उसे इतनी सुधि न थी कि वह नीचे चला जाए.लेकिन नीचे कैसे
चला जाता?अकेले बांस की सीढ़ी चढ़ते ओर उतरते डर जो लगता था उसे.मैने पुष्प
को सीने से लगा लिया और बालक ध्रुव की कहानी का मैने यहाँ उपयोग किया.एक
दिन पुष्प बोला-"मोहल्ले मेँ मुझे एक बालक बहुत चिढ़ाता है."उसकी शिकायत
नहीं की? " "डर लगता है." "वह क्या कहता है?" "कभी पागल कहता है.कभी
डरपोक कहता है." "और क्या कहता है?" "जी,....."- वह चुप हो गया.
"जिसका जो कार्य है,वह करेगा.तुम्हारा क्या कार्य है?डरना!"
"न....ह.....! " "तो क्यो डरते हो?तुमको तो अच्छा बनना है.जो बुरा बनना
चाहे वही तो बुरा करेगा." "जी....! " "उससे कहना,मेरे सर हैं
न,वे.....!नहीँ(रुककर)उससे कहना मेरा ईश्वर है न वह सब जानता है.तू क्या
जाने कौन पागल है कौन डरपोंक?तू गलत कहेगा तो क्या ईश्वर खुश होगा?"
मुझे पुष्प से यही कहना चाहिए था कि कुछ और...? मैँ नहीं समझ पाया.मैं
अनेक प्रश्नों का जबाब शून्य में जा कर देता हूँ .मैं पुष्प को विचार
देना चहता था.एक दिन मैं विद्यालय नहीं गया.दूसरे दिन जब विद्यालय पहुंचा
तो पुष्प बोला-"आप कल नहीं आये थे.कल मेरे सिर में दर्द था.इंटरवेल मेँ
घर भी जाना था क्योंकि पापा के साथ शाहजहांपुर से दवायी लानी थी.""तो
मेरे न आने से क्या हो गया?""मैं इंटरवेल में पूछता किससे?छठी वेला में
पापा जी आकर ले गये.(रुक कर)घर पर पापा जी ने डांटा.कहा कि क्या आ नहीं
सकता था?"
एक दिन वह मुझसे बोला-"मेरे घर बड़ी बड़ी मूंछों वाले आते हैं,दाड़ी वाले
सरदार आते हैँ और पापा के संग शराब पीते हैं.रात में जाग जात हूँ तो मुजे
डर लगता है." "डर तो तब भागेगा जब तुम निडर बनोगे." "कैसे बनूँ?" "कैसे
बनो?"- और फिर मैं रुक गये.जमाने के प्रश्नों के सटीक उत्तर नहीं होते,जो
उत्तर होते हैं आवश्यक नहीं सामने के व्यक्ति को संतुष्ट कर सकेँ?
"देखो,ध्रुव की कहानी पता है.वह कहीं डरा.वह तो जंगल में तपस्या कर रहा
था.ईश्वर और प्रेम से बढ़कर इस जगत मेँ कुछ नही.जमाने की वस्तुओं से क्या
डरना?गुरु गोविन्द सिंह के पुत्रों की कहानी सुनी है,उन्हें तो मृत्यु से
भी डर नहीं लगा.किसके लिए डरें?यह शरीर हमारा थोड़े ही है,ईश्वर का
है,ईश्वर जाने.इसका मतलब यह नहीं कि हमेँ शरीर का ख्याल नहीं रखना."
मुझे नहीं पता था कि पुष्प ये सब समझ रहा है कि नहीं लेकिन मैं बोलता जा
रहा था.स्टाप के अन्य व्यक्तियों के साथ मैं पुष्प के घर जाता रहता
था.डायरेक्ट इनडायरेक्ट रुप मेँ मेरी बातों की ब्याख्या को पुष्प के माता
पिता को स्टाप के समझाते रहते थे.मेरा विचार रहा है कि बालकों पर बात बात
मेँ गुस्सा दिखाना बालकों के आत्मबल कमजोर करता है और बालक निरुत्साहित
होता है.तीन साल बाद मेरा पुवायां से नवाबगंज ट्रांसफर हो गया.जिस कारण
अब पुष्प हमसे दूर था.नवाबगंज पहुंचने के एक वर्ष बाद पुष्प की मां का
मेरे पास एक पत्र आया-"आप थे तो अच्छा लगता था.आप घर पर आते थे तो और
अच्छा लगता था.यह तो दुनिया है अब भी अच्छा लगता है,अन्यथा फिर आपका
शिष्य कैसे कहलाऊँगा?आपने कहा था कि सिर्फ ईश्वर अपना.आत्मा अपनी
है..पुष्प के कथन अपने शब्दों मेँ लिख रही हूँ.बचपन से अपने खिन्न पिता
की कठोर निर्दयी बातों को झेलझेल व पिट पिट...ऐसे में उसके अस्तित्व पर
बार बार चोटें .."

1 टिप्पणी:

शालिनी कौशिक ने कहा…

.एक शिक्षक के रूप में आपकी पुष्प के साथ की सभी शिक्षाएं सराहनीय हैं आज के शिक्षक में इसी धैर्य की आवश्यकता है.
बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई.
श्रमजीवी महिलाओं को लेकर कानूनी जागरूकता.
पहेली संख्या -४४ का परिणाम और विजेता सत्यम शिवम् जी