रविवार, 23 अक्तूबर 2011

अपना दर्द जो उसका इन अपनों को एहसास न होता है!

अपनों के बीच में बेगानापन महसूस होता है

अपना दर्द जो उसका इन अपनों को एहसास न होता है.

इन अपनों के बीच यदि घुट घुट जीना है

तो इससे अच्छा तो दुश्मन से गले लगाना है..


अपने दर्द को किसने दी सहानुभूतियोँ की हबा

कौन अपना कौन पराया समझ न आया

तब अन्जानों के प्यार को
सहजना चाहा है

अन्जानों को अपना बना बना दूर जाता रहा है..


भटकते रहे सुकून की तलाश मेँ
कब मिट सके दर्द मेरे इस जहाँ मेँ

दर्दोँ को दिल समेटे मुस्कुराते रहे

मेरे छिपे दर्द को जानने की फुर्सत किसे..


एक वो हादसा ख्वाब मेँ आता है रोज रे

मौत को बुलाता हर रात रोज मैँ

एक हैं वो जो जिएं औरों के प्यार मेँ

और एक हम हैँ लगे जो खुद को संवारने मेँ...


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मेरें Nokia फ़ोन से भेजा गया

स्थूल मरता है!

जन्म हुआ तो मौत होगी ही,
उम्र तो ढलेगी ही .

तश्वीर तो उसी की ही होगी-
स्थूल तन है जिसका.

स्थूल तन होगा उसका ही-

जो जन्मा और जिसकी

मौत होगी ही.


बहुत से भगवान हैं जमाने मेँ,
जिनकी तश्वीरें हैं जमाने मेँ.

तश्वीरे तो उसी की होती हैँ-

जो जन्मेँ हैं इस जमाने मेँ.

जो जन्मेँ हैं तो फिर वो मरेंगे भी

स्थूल तन तो मरेंगे ही,उम्र तो.....

राम नाम किसका ?

कृष्ण नाम किसका?

तन का. सिर्फ तन का.

शक्ल होती है स्थूल की

जो मरेगा ही ढलेगा ही.

ब्रह्मा विष्णु महेश की शक्ल...?

शक्ल तो स्थूल की ही,

स्थूल कौन?जो जन्मा और मरा भी..?!

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मेरें Nokia फ़ोन से भेजा गया

मन पाए विश्राम जहाँ: दादी ! प्यारी दादी

मन पाए विश्राम जहाँ: दादी ! प्यारी दादी

मतदाता जागृति कैसे :जनता का अनुशासन?

जनता गुटों, भीड़ों. समूहों,जातियों,मजहबों,आदि में विभक्त हैं.वह
अपने छोटे छोट परम्परागत अर्द्धसत्यों मेँ जीती हैं उससे इससे मतलब नहीं
कि सारी मनुष्यता के लिए क्या मान्यताएं हैँ?संविधान की क्या मान्यताएं
हैँ?विभिन्न गुट, समूह,जाति,मजहब, एवं परस्पर व्यक्तियों के स्वार्थ,
मानसिकताएं,मतमतान्तर टकराते हैँ,मतभेद पैदा होते हैं और अनुशासन भंग
होता है.शान्ति भंग होती है.व्यवस्थाएं भंग होती हैं.


जनता कैसे अनुशासित हो?
इस प्रति सजग होना हर बुद्धिजीवी व्यक्ति,शासन प्रशासन, मेँ बैठे
व्यक्तियों,धर्म व समाज के ठेंकेदारों का दायित्व है.लेकिन हो भी कैसे
अनुशासित जब हम अपने निजी कूपमण्डूक अर्धसत्यों को जी रहे
हैँ.शान्ति,अनुशासन,मनुष्यता,जीवन के सत्यों से हमेँ कोई मतलब नहीँ....?!

जब मातापिता,शिक्षक,पुलिस, मिलेट्री,वकील,आदि ही यदि
अनुशासित,शान्तिप्रिय,संविधानप्रिय.आदि नहीं तो आम जनता क्या
करे?स्वार्थ,स्नेह,लाड़प्यार,आदि का प्रदर्शन न हो तटस्थता का व्यवहार
होना चाहिए.शख्त अनुशासन मातापिता शिक्षक पुलिस वकील आदि मेँ नजर आयें तो
जनता मेँ अनुशासन बन सकता है.
डर कर ईमानदारी प्रति साहस का प्रदर्शन न कर पाना ही जनता की अनुशासन
हीनता का कारण है.

संविधान का समाजीकरण:-

हिन्दुस्तान का नागरिक संविधान को पंद्रह प्रतिशत तक भी अपने आचरण मेँ
नहीं उतार पाया है तो काहे की नागरिकता,काहे की देशभक्ति...?आम आदमी के
द्वारा संविधान का इस्तेमाल भी अब सिर्फ अपने विपक्ष को नीचा दिखाने के
लिए किया जाता है. रोजमर्रे की जिन्दगी मेँ संविधान का प्रयोग करना तो
दूर संविधान की एबीसी तक नहीं जानते.यहां के जनप्रतिनिधि संविधान की शपथ
तो खाते हैं लेकिन वे भी संविधान की एबीसी नहीं जानते.ऊपर से संविधान की
धज्जियां उड़ाते हैँ.