शनिवार, 17 मार्च 2012

घट घट मेँ जो बसता ,वह मेरे अंदर भी बसता !

घट घट मेँ जो बसता ,वह मेरे अंदर भी बसता ,
जब मेरे अंदर भी बसता
तो क्योँ फिर क्योँ घूमना फिरना ?


क्योँ पूजूँ मैँ पाथरोँ को ?
क्योँ पूजूँ मैँ इमारतोँ को ?
क्योँ भटकूँ कस्तूरीमृग भाँति
जब वो घट घट पाती पाती .

यदि घट घट मेँ ईश्वर रहता
हममेँ भी तो वह रहता ,
सजीव मूरत इक मूरत जहाँ

तो क्योँ पूजूँ निर्जीव मूर्त यहाँ ?
पंथोँ बीच भीड़ ,धर्म बीच इन्सान अकेला .


मेरे तनअंदर भी जब वह बसता
तो उसके सिवा मेँ किसमेँ रमता ?
किसकी जय आत्मबल आत्मज्ञान के सिवा ?
घट घट जो बसता ............


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