शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

अकेला खड़ा भीड़ मेँ !

धर्म की पताकाएं लिए खड़ी भीड़ ,

फिर भी धर्म खड़ा अकेला भीड़ बीच ।


माया ,मोह ,लोभ व काम मेँ जीती ये भीड़

इस भीड़ बीच 'कबीर' को उपाधि अनीश्वरवादी

खुद को ईश्वरवादी व धार्मिक हमझे ये भीड़
क्योँ की निर्जीव व मानवनिर्मित की पूजक ये भीड़ ।

ईमान नहीं ,सत नहीं ,कहीँ भी परोपकार नहीँ

चंद कीमत पर धूप जल व पुष्प समर्पण कर


सांसारिकता को पाने की लालसा मेँ भीड़ का धर्म ।

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